
प्रतीकात्मक तस्वीर | Gemini
सरकारी स्कूलों पर लगते ताले और प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती संख्या सरकार के शिक्षा को लेकर पोल खोल रहे हैं। ऐसे में सरकार की राष्ट्रीय शिक्षा नीति और स्मार्ट स्कूल का कोई मतलब रह जाता है क्या?
एक तरफ सरकारी स्कूलों पर लगातार ताले लटक रहे हैं, तो दूसरी तरफ प्राइवेट स्कूलों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। सवाल यह है कि जिस शिक्षा व्यवस्था को मुफ्त और सबके लिए सुलभ बनाने का वादा किया गया था, वह आखिर किसके इशारे पर सिमटती जा रही है?
नीति आयोग की रिपोर्ट "School Education System in India: Temporal Analysis and Policy Roadmap for Quality Enhancement" के मुताबिक, साल 2014 से 2024 के बीच देश में करीब 1 लाख सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं। इस दौरान सरकारी स्कूलों की संख्या 11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख रह गई। हैरानी की बात यह है कि सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों की हालत भी कुछ अलग नहीं रही - इनकी संख्या 83,000 से घटकर महज 79,000 रह गई।
अगर सिर्फ पिछले एक साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और भी डरावनी हो जाती है। यूडीआईएसई+ (UDISE+) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 से 2025-26 के बीच महज एक साल में देशभर में 9,900 सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूल बंद हो गए। 2024-25 में जहां ऐसे स्कूलों की संख्या 8.89 लाख से अधिक थी, वहीं 2025-26 में यह घटकर 8.80 लाख रह गई।
राज्यवार आंकड़े देखें तो स्थिति की गंभीरता और साफ हो जाती है:
| राज्य | स्थिति | आंकड़े का समय |
|---|---|---|
| उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश | दोनों राज्यों में मिलाकर करीब 40,000 स्कूलों का विलय | 2014-2024 (नीति आयोग) |
| मेघालय | सबसे ज्यादा गिरावट, 2,000 से अधिक स्कूल कम हुए | 2024-25 से 2025-26 (UDISE+) |
| तेलंगाना और आंध्र प्रदेश | हजारों सरकारी स्कूल बंद | 2024-25 से 2025-26 (UDISE+) |
| बिहार और छत्तीसगढ़ | इकलौता अपवाद — यहां स्कूलों की संख्या बढ़ी | 2024-25 से 2025-26 (UDISE+) |
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जब संसद में यह सवाल उठाया गया कि क्या छात्रों की घटती संख्या के चलते इतने बड़े पैमाने पर स्कूल बंद किए गए, तो शिक्षा मंत्रालय इसका साफ जवाब नहीं दे सका। मंत्रालय यह स्पष्ट नहीं कर पाया कि कुल बंद हुए स्कूलों में से कितने वाकई कम छात्र संख्या की वजह से बंद हुए। यानी आंकड़े तो सरकार के पास हैं, लेकिन जवाबदेही नदारद है।
नीति आयोग की रिपोर्ट में स्कूलों के बंद होने की इस प्रक्रिया को "स्कूल कंसोलिडेशन" यानी कम छात्र संख्या वाले पास-पड़ोस के स्कूलों को आपस में मिलाना बताया गया है। रिपोर्ट में इसके पीछे घटती जन्म दर के चलते स्कूल जाने योग्य बच्चों की घटती आबादी, स्कूलों का सुदृढ़ीकरण और ऊंची कक्षाओं में बच्चों को टिकाए रखने की चुनौतियों को वजह बताया गया है।
केंद्र और नीति आयोग लगातार राज्यों से संसाधनों के "बेहतर उपयोग" के नाम पर कम नामांकन वाले स्कूलों को मिलाने की सलाह देते रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह नीति असल में बच्चों के हित में है, या सिर्फ खर्च घटाने की एक चाल?
शिक्षा कार्यकर्ता और राइट टू एजुकेशन फोरम के समन्वयक मित्र रंजन ने नीति आयोग की इस विलय नीति पर सीधा सवाल खड़ा किया है। उनका कहना है कि कंसोलिडेशन के नाम पर हो रहा यह विलय ही बच्चों के नामांकन में भारी गिरावट की असली वजह है। उनके मुताबिक जब आसपास के स्कूल बंद हो जाते हैं, तो कई बच्चे पढ़ाई ही छोड़ देते हैं, जिससे नामांकन दर और गिरती जाती है।
रंजन आगे कहते हैं कि स्कूलों का विलय सार्वभौमिक स्कूल शिक्षा के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देता है। उन्होंने याद दिलाया कि भारत सरकार ने खुद सतत विकास लक्ष्य (SDG) के तहत 2030 तक स्कूली शिक्षा को सबके लिए सुलभ बनाने का संकल्प लिया है, लेकिन स्कूलों को बंद करने की मौजूदा नीति के साथ यह लक्ष्य हासिल कर पाना नामुमकिन जैसा है।
अब सबसे दिलचस्प और चिंताजनक हिस्सा - जब सरकारी स्कूल बंद हो रहे थे, ठीक उसी दौर में प्राइवेट स्कूलों का कारोबार खूब फल-फूल रहा था। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 2014 से 2024 के इसी दशक में देश में प्राइवेट स्कूलों की संख्या 2.88 लाख से बढ़कर 3.39 लाख हो गई - यानी दस साल में कुल 51,000 प्राइवेट स्कूलों का इजाफा।
यह आंकड़े खुद-ब-खुद एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं - क्या सरकारी शिक्षा व्यवस्था को जानबूझकर कमजोर कर प्राइवेट स्कूलों के लिए जमीन तैयार की जा रही है? गरीब और मध्यम वर्ग के उन बच्चों का क्या होगा, जिनके परिवार महंगी प्राइवेट फीस चुका पाने की स्थिति में नहीं हैं?
Updated on:
11 Aug 2026 04:37 pm
Published on:
11 Aug 2026 04:37 pm
