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Monsoon: कम बारिश के बावजूद क्यों बढ़ रहा है बाढ़ का खतरा?

Climate: हिमालयी क्षेत्र में बाढ़, भूस्खलन, ग्लेशियल झीलों के फटने और अचानक तेज बारिश की घटनाएं अब अलग-अलग आपदाएं नहीं रह गई हैं। Climate बदलाव, तेजी से पिघलते ग्लेशियर, घटती बर्फ और अनियमित मानसून मिलकर हिमालय के जोखिम को लगातार जटिल बना रहे हैं।
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भारत

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MI Zahir

Aug 30, 2026

Glacier and Monsoon News.

ग्लेशियरों तेजी से पिघलने और मानसून के बदलते स्वरूप से हिमालयी क्षेत्रों में बाढ़, भूस्खलन और अचानक आपदाओं का खतरा बढ़ गया है। (फोटो: AI.)

हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के सिकुड़ने की रफ्तार अब गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट (ICIMOD) की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, 1990 से 2020 के बीच इस क्षेत्र के ग्लेशियरों के कुल क्षेत्रफल में करीब 12 प्रतिशत की कमी आई। वर्ष 2000 के बाद बर्फ के नुकसान की गति भी पहले की तुलना में लगभग दोगुनी हुई है।

हिमालयी आपदा का बदलता पैटर्न: तीन बड़े कारण

भागक्या बदल रहा है?बड़ा असर
1. Glacierग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैंGLOF और जल-संकट का खतरा
2. Monsoonकम अवधि में तेज बारिशफ्लैश फ्लड और भूस्खलन
3. Futureबहु-आपदा जोखिम बढ़ रहा हैEarly Warning और वैज्ञानिक योजना जरूरी

ग्लेशियरों के पीछे हटने से केवल भविष्य में पानी की कमी का खतरा नहीं है। पिघलती बर्फ से ग्लेशियल झीलों का विस्तार हो सकता है। यदि इन झीलों के प्राकृतिक बांध टूटते हैं तो Glacial Lake Outburst Flood यानी GLOF अचानक नीचे की घाटियों में भारी तबाही ला सकता है।

ICIMOD के मुताबिक हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में 63,700 से अधिक ग्लेशियर हैं और यहां से निकलने वाली प्रमुख नदी प्रणालियां करीब दो अरब लोगों की जल, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी हैं।

उत्तराखंड, हिमाचल और नेपाल में एक जैसा जोखिम

हिमालय की भौगोलिक बनावट पहले से ही संवेदनशील है। ढलान, कमजोर चट्टानें, सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र और संकरी नदी घाटियां भारी बारिश के असर को कई गुना बढ़ा देती हैं।

उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और नेपाल में बीते वर्षों में अचानक बाढ़, भूस्खलन, बादल फटने और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं ने दिखाया है कि एक आपदा दूसरी आपदा को जन्म दे सकती है। भारी बारिश से ढलान कमजोर हो सकती है, भूस्खलन नदी को रोक सकता है और बाद में पानी का अचानक दबाव नई बाढ़ पैदा कर सकता है।

ICIMOD के 2026 के विश्लेषण के अनुसार, 2025 में हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र के चार देशों में 10 से अधिक बड़ी आपदाएं दर्ज हुईं। वर्ष के दौरान क्षेत्र में करीब 12 लाख लोग आपदाओं से प्रभावित या विस्थापित हुए।

यानी समस्या केवल किसी एक राज्य या देश तक सीमित नहीं है। हिमालय एक साझा पारिस्थितिक और जल तंत्र है, इसलिए नेपाल में हुई घटना का असर भारत की नदी घाटियों और आपदा प्रबंधन पर भी पड़ सकता है।

कम बारिश भी क्यों बन सकती है बड़ा खतरा?

मानसून का बदलता स्वरूप इस संकट को और पेचीदा बना रहा है। 2026 के लिए ICIMOD ने हिंदूकुश-हिमालय के कई हिस्सों में सामान्य से कम मानसूनी बारिश का अनुमान लगाया था, लेकिन इसके साथ ही कम अवधि में अत्यधिक तेज बारिश के खतरे को रेखांकित किया।

इसका अर्थ है कि बारिश के कुल दिनों या पूरे मौसम की औसत वर्षा कम होने के बावजूद किसी एक दिन या कुछ घंटों में बहुत ज्यादा पानी गिर सकता है। लंबे सूखे दौर के बाद अचानक तेज बारिश मिट्टी की जलधारण क्षमता और पहाड़ी ढलानों की स्थिरता को प्रभावित करती है। यही स्थिति फ्लैश फ्लड और भूस्खलन का खतरा बढ़ा सकती है।

इसके साथ तापमान बढ़ने से बर्फ और ग्लेशियरों का पिघलना तेज होता है। परिणामस्वरूप हिमालय में बाढ़, सूखा, भूस्खलन और ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं को अलग-अलग समझना अब पर्याप्त नहीं है।

भविष्य की तैयारी: राहत से पहले चेतावनी

हिमालयी आपदाओं से निपटने के लिए अब केवल राहत और बचाव व्यवस्था मजबूत करना पर्याप्त नहीं होगा। ग्लेशियरों, बर्फ, पर्माफ्रॉस्ट और ग्लेशियल झीलों की नियमित निगरानी जरूरी है।

जोखिम वाले क्षेत्रों में Early Warning System को गांव स्तर तक पहुंचाना होगा। उपग्रह निगरानी, मौसम पूर्वानुमान, नदी जलस्तर सेंसर और स्थानीय चेतावनी तंत्र को एक साथ जोड़ना होगा।

साथ ही सड़क, सुरंग, बांध, जलविद्युत परियोजनाओं और पर्यटन केंद्रों की योजना बनाते समय भविष्य के जलवायु जोखिम को शामिल करना जरूरी है। ICIMOD ने भी क्षेत्र में ग्लेशियर, बर्फ और पर्माफ्रॉस्ट की मानकीकृत निगरानी तथा क्षेत्रीय सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया है।

अनियमित मानसून और बढ़ता निर्माण जोखिम बढ़ा रहे

बहरहाल,हिमालय में आपदाएं “नई सामान्य स्थिति” इसलिए दिखाई दे रही हैं क्योंकि खतरे अब अकेले नहीं आते। गर्म होती जलवायु, तेजी से बदलता क्रायोस्फियर, अनियमित मानसून और बढ़ता निर्माण मिलकर जोखिम बढ़ा रहे हैं। आने वाले वर्षों में हिमालय की सुरक्षा का रास्ता आपदा के बाद की कार्रवाई से ज्यादा आपदा से पहले की तैयारी से होकर जाएगा।