
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह (Photo: ChatGpt)
काली धूप वाली ऐनक, सोशल मीडिया की भाषा और राजनीति में Gen Z की ताकत अब नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की पहचान सिर्फ काठमांडू की सड़कों तक सीमित नहीं है। 36 साल के पूर्व रैपर और काठमांडू के पूर्व मेयर शाह अब संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच पर अपने देश की सबसे बड़ी त्रासदी को दुनिया के सामने रखने जा रहे हैं। लेकिन इस बार मुद्दा सिर्फ नेपाल की राजनीति नहीं, बल्कि हिमालय में बदलती जलवायु और उसके बढ़ते विनाश की कीमत है।
26 अगस्त को ग्लेशियर ढहने के बाद आई विनाशकारी बाढ़ ने नेपाल के कई इलाकों को तबाह कर दिया। 24 सितंबर तक नेपाल के आंकड़ों के अनुसार कम से कम 1,436 लोगों की मौत हो चुकी थी और 5,644 लोग अब भी लापता थे। पुलों, बिजली परियोजनाओं, स्कूलों, स्वास्थ्य केंद्रों और हजारों घरों को भारी नुकसान पहुंचा। पुनर्निर्माण की लागत अरबों डॉलर में पहुंचने का अनुमान है। इसी पृष्ठभूमि में शाह संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र में नेपाल का मामला रखेंगे। उनका संदेश यह होगा कि जलवायु संकट का असर उन देशों पर भी असमान रूप से पड़ रहा है, जिनका वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान बेहद कम है। नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र के Loss and Damage Fund से 2 करोड़ डॉलर की सहायता की मांग की है और इसे सामान्य विदेशी सहायता या चैरिटी के बजाय ‘क्लाइमेट जस्टिस’ के नजरिए से देखने की अपील की है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर नेपाल की आवाज प्रधानमंत्री बालेन शाह 24 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में UNGA के 81वें सत्र को संबोधित करेंगे, जहां वे हाल की भीषण बाढ़ और हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने से उत्पन्न आपदाओं का मुद्दा उठाएंगे। नेपाल ने चीन, अमेरिका और भारत को दुनिया के सबसे बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक देशों में शामिल करते हुए उनसे जलवायु क्षतिपूर्ति की मांग की है। विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने स्पष्ट किया है कि यह सहायता नहीं, बल्कि “कानूनी और नैतिक दायित्व” है।
नेपाल का तर्क सीधा है। देश वैश्विक उत्सर्जन में बहुत छोटा योगदान देता है, लेकिन हिमालयी भौगोलिक स्थिति के कारण ग्लेशियरों के पिघलने, अचानक बाढ़, भूस्खलन और बदलते मौसम के खतरों से बेहद प्रभावित है। संयुक्त राष्ट्र के नेपाल कार्यालय के अनुसार अगस्त की बाढ़ से करीब 84,270 लोग प्रभावित हुए और सड़क, स्कूल, बिजली तथा जल व्यवस्था जैसे महत्वपूर्ण ढांचे को व्यापक नुकसान पहुंचा।
वैज्ञानिक अध्ययनों ने भी इस आपदा को व्यापक जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में देखा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, World Weather Attribution के शोधकर्ताओं ने बताया है कि बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों तथा पर्माफ्रॉस्ट में बदलाव ने इस तरह की आपदा के लिए परिस्थितियां अधिक अनुकूल बनाई हो सकती हैं।
यही वह आधार है जिस पर नेपाल ‘क्लाइमेट रिपेरेशंस’ और ‘लॉस एंड डैमेज’ की बहस को आगे बढ़ा रहा है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कानून में जलवायु क्षति के लिए सीधे मुआवजे की व्यवस्था जटिल है। 2025 में International Court of Justice की जलवायु संबंधी सलाहकारी राय ने राज्यों की जलवायु जिम्मेदारियों को लेकर महत्वपूर्ण बातें कहीं थीं, लेकिन वह राय अपने आप में बाध्यकारी फैसला नहीं है।
बालेन शाह के लिए यह यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण है। मार्च 2026 में प्रधानमंत्री बनने के बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा में उनका भाषण उनकी पहली बड़ी विदेश यात्रा का हिस्सा है। काठमांडु पोस्ट अखबार के अनुसार, वह अपने लगभग 15 मिनट के संबोधन में जलवायु परिवर्तन से होने वाली जान-माल और बुनियादी ढांचे की क्षति, पुनर्निर्माण और जलवायु संकट से उबरने के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन की मांग करेंगे।
उनका राजनीतिक सफर भी पारंपरिक नेपाली राजनीति से अलग रहा है। इंजीनियर और पूर्व हिप-हॉप कलाकार शाह ने 2022 में काठमांडू के मेयर के रूप में राष्ट्रीय पहचान बनाई थी। बाद में उनकी राजनीति युवा मतदाताओं के बीच मजबूत हुई और वह Gen Z की राजनीतिक ऊर्जा के प्रमुख चेहरों में गिने जाने लगे। उनकी काली ऐनक भी उनकी सार्वजनिक छवि का हिस्सा बन चुकी है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर जलवायु न्याय की मांग करने से पहले शाह सरकार को घरेलू सवालों का भी सामना करना पड़ रहा है। बाढ़ के बाद सरकार की आपदा प्रतिक्रिया को लेकर विपक्षी नेताओं, नागरिक समूहों और कुछ विश्लेषकों ने सवाल उठाए हैं।
शाह को संसद में सरकार की बाढ़ से हुई तबाही पर कई बार प्रतिक्रिया दी। चेतावनी व्यवस्था, विदेशी सहायता, सुरंगों में फंसे लोगों के बचाव, शवों के प्रबंधन और केंद्र तथा स्थानीय सरकारों के बीच समन्वय जैसे मुद्दों पर सवाल उठ रहे हैं। शाह ने संसद में सरकार के कदमों का बचाव करते हुए कहा कि अधिकारियों ने सूचना मिलते ही कार्रवाई शुरू की थी।
कुछ नागरिक समूहों ने राहत और बचाव में स्थानीय निकायों तथा नागरिक समाज की भूमिका सीमित किए जाने का आरोप भी लगाया। कार्यकर्ताओं ने केंद्रित और समन्वित प्रतिक्रिया की कमी को लेकर सरकार की आलोचना की। ये आरोप सरकार की ओर से स्वीकार किए गए निष्कर्ष नहीं हैं।
शाह की कार्यशैली को लेकर पहले से भी बहस चलती रही है। उनकी सरकार के शुरुआती महीनों में शासन शैली, संस्थागत प्रक्रिया और निर्णय लेने के तरीके को लेकर उठे सवालों का मीडिया रिपोर्टों में जिक्र होते रहे हैं। दूसरी ओर, शाह समर्थक उन्हें तेज फैसलों और पुरानी राजनीतिक संस्कृति से अलग काम करने वाले नेता के रूप में देखते हैं।
शाह की पहचान का एक दिलचस्प पहलू उनकी सार्वजनिक शैली भी है। संसद में काली ऐनक पहनने को लेकर भी चर्चा हुई और अगस्त में काठमांडु पोस्ट ने बताया कि डॉक्टरों की सलाह के कारण उन्हें विशेष अनुमति मिली थी। यानी जो ऐनक कभी उनकी राजनीतिक ब्रांडिंग का हिस्सा मानी जाती थी, उसके पीछे चिकित्सकीय कारण भी बताए गए हैं।
लेकिन UN में असली परीक्षा उनके पहनावे या सोशल मीडिया लोकप्रियता की नहीं होगी। सवाल यह होगा कि क्या नेपाल की त्रासदी को वह अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त, तकनीक और आपदा-पूर्व चेतावनी व्यवस्था के लिए ठोस समर्थन में बदल पाते हैं।
नेपाल का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमालय सिर्फ नेपाल का पर्यावरणीय क्षेत्र नहीं है। यहां होने वाले बदलाव भारत, चीन, भूटान और पूरे दक्षिण एशिया की जल सुरक्षा और आपदा जोखिम से जुड़े हैं। इसी कारण नेपाल क्षेत्रीय स्तर पर बेहतर डेटा साझाकरण, शुरुआती चेतावनी प्रणालियों और अधिक मजबूत बुनियादी ढांचे की मांग भी उठा रहा है।
बालेन शाह के सामने इसलिए दो समानांतर मोर्चे हैं- न्यूयॉर्क में दुनिया को यह समझाना कि जलवायु संकट की कीमत केवल उत्सर्जन करने वालों की नहीं, बल्कि कम उत्सर्जन वाले संवेदनशील देशों की आबादी भी चुका रही है और काठमांडू में यह दिखाना कि नेपाल खुद अपने नागरिकों की सुरक्षा, राहत और पुनर्निर्माण के लिए कितनी प्रभावी व्यवस्था खड़ी कर सकता है।
Updated on:
24 Sept 2026 12:00 pm
Published on:
24 Sept 2026 11:58 am
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