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राजस्थान की लाडो पर तस्करों की काली नजर! नाबालिग लड़कियों की तस्करी ने बढ़ाई चिंता, जानिए क्यों

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार मानव तस्करी के अधिकतम मामले ओडिशा, बिहार, तेलंगाना और महाराष्ट्र में दर्ज किए गए हैं। नाबालिग लड़कों की तस्करी के मामलों में ओडिशा सबसे आगे है और बिहार दूसरे स्थान पर है। नाबालिग लड़कियों की तस्करी के सबसे अधिक मामले राजस्थान में दर्ज किए गए हैं।
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भारत

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Ravi Gupta

Aug 04, 2026

rajasthan girls not safe

प्रतीकात्मक तस्वीर | Credit- ChatGPT

अगर राजस्थान में नाबालिगों की तस्करी ऐसे ही बढ़ती रही तो यह कहना गलत नहीं होगा कि "ना आना इस देश लाडो"। पीआईबी मार्च 2026 के रिपोर्ट में ये बात सामने आई कि राजस्थान इस मामले में टॉप पर है।

राजस्थान में मानव तस्करी की घटनाओं पर हालिया आंकड़े और पुलिस कार्रवाई दोनों ही चिंता का संकेत दे रहे हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने मार्च 2026 में स्वतः संज्ञान लेते हुए बताया कि राजस्थान में नाबालिग लड़कियों की तस्करी के मामले सबसे अधिक दर्ज किए गए हैं।

साथ ही, 2024 में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार वर्ष 2024 में राजस्थान में मानव तस्करी के कुल 75 मामले दर्ज किए गए, जो पिछले वर्षों की तुलना में कम बताए गए। पर, इस साल के अब तक के आंकड़ों ने फिर से सवाल खड़े कर दिए।

अब तक 90 मानव तस्करी के मामले

वहीं, जुलाई–अगस्त 2026 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, 2025–26 में राजस्थान में कुल 90 मानव तस्करी के मामले दर्ज हुए। यह स्थिति बताती है कि राज्य में यह समस्या गंभीर है और अन्य राज्यों की तुलना में भी उच्च स्तर पर बनी हुई है।

पुलिस की सफल कार्रवाई

पुलिस की कार्रवाई में भी हालिया महीनों में तेजी आई है। जून 2026 में झालावाड़ पुलिस ने एक गिरोह को पकड़ते हुए 15 लड़कियों को बचाया और 11 आरोपियों को गिरफ्तार किया, जिनमें मुंबई के तीन दलाल भी शामिल थे।

इसी दौरान, एक अन्य संयुक्त अभियान में जालसाजी और वेश्यावृत्ति के लिए लड़कियों को मुंबई, नागपुर जैसे शहरों में भेजने वाले गिरोह का पर्दाफाश हुआ, जिसमें 10 लड़कियों को बचाया गया और पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया गया।

राज्य में पुलिस का विशेष अभियान

राज्य पुलिस ने जून 2026 में “उमंग‑VII” नामक विशेष अभियान भी चलाया, जिसमें बालश्रम और बाल तस्करी के खिलाफ पूरे प्रदेश में सघन कार्रवाई की गई। यह अभियान यह दर्शाता है कि प्रशासन इस समस्या को गंभीरता से ले रहा है और रोकथाम के प्रयास तेज कर रहा है।

न्यायिक प्रक्रिया में देरी!

इसके अलावा, न्यायिक प्रक्रिया में देरी भी एक बड़ी समस्या है। सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, देश में लगभग 2,846 बाल तस्करी के मामले अभी भी अदालतों में लंबित हैं, जिनमें से 256 मामले राजस्थान से संबंधित हैं।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2018 से 2022 के बीच राजस्थान में बाल मानव तस्करी (चाइल्ड ट्रैफिकिंग) के 2,711 मामलों में चार्जशीट दाखिल की गई थी। यह देश में इस अवधि के दौरान बाल तस्करी के मामलों में सबसे अधिक चार्जशीट दाखिल होने वाले राज्यों में शामिल है।

यह लंबित मामलों की संख्या बताती है कि पीड़ितों को न्याय मिलने में कितना समय लगता है और कितनी मुश्किलें झेलनी पड़ती हैं।

सामाजिक असमानता का परिणाम

समाज के कमजोर तबकों गरीब, कर्ज़ में डूबे परिवार, आदिवासी या पिछड़े समुदाय को अक्सर नौकरी, शिक्षा या बेहतर जीवन का झांसा देकर फंसाया जाता है। कई बार दलाल नकली वादों के साथ लड़कियों को शहरों में भेजते हैं, जहां उन्हें जबरन श्रम, यौन शोषण या शादी के नाम पर फंसा दिया जाता है। यह एक गहरी मानवीय त्रासदी है, जो सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता और अवसरों की कमी का परिणाम भी है।

इस बात को वाकई दिल से समझने की जरूरत है।

पीड़ितों को बचाने के बाद सशक्त करना जरूरी

पीड़ितों के लिए बचाव के साथ-साथ पुनर्वास की व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए - जैसे कि शिक्षा, रोजगार और सुरक्षित जीवन सुनिश्चित करना। पुलिस और प्रशासन को सिर्फ गिरोहों को पकड़ने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि दलाल नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने के लिए इंटेलिजेंस और अंतर-राज्यीय समन्वय बढ़ाना होगा। न्यायिक प्रक्रिया को तेज़ करना भी जरूरी है, ताकि पीड़ितों को शीघ्र न्याय मिल सके।

समाज, प्रशासन और न्याय व्यवस्था को मिलकर काम करना होगा ताकि पीड़ितों को सिर्फ बचाया ही नहीं जाए, बल्कि उन्हें सम्मान और सुरक्षित भविष्य भी मिल सके। राजस्थान में मानव तस्करी की यह समस्या सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि एक मानवीय संकट है। इसे रोकने के लिए सभी को मिलकर प्रयास करना होगा।