
'ट्यूरिन के पवित्र कफ़न' पर सदियों पुराना डीएनए मिला, जीनोमिक्स रिसर्च में हुआ खुलासा। (विजुअल: Google Gemini)
ईसा मसीह के कफ़न के रूप में दुनिया भर में मशहूर 'ट्यूरिन के कफ़न' (Shroud of Turin) के बारे में एक नया और ऐतिहासिक खुलासा हुआ है। हालिया वैज्ञानिक जांच में इस वस्त्र पर इंसान, सूक्ष्मजीव, पौधे, जानवर और यहां तक कि लाल मूंगे (Red Coral) तक के डीएनए के अंश पाए गए हैं। इंटरनेशनल रिसर्चर्स की एक संयुक्त वैज्ञानिक टीम ने रिसर्च कर यह खुलासा किया है,जिसमें 'यूनिवर्सिटी ऑफ लैंकाशायर' की फोरेंसिक वैज्ञानिक प्रोफेसर नोएमी प्रोकोपियो और प्रोफेसर गियानी बारकेशिया शामिल हैं।
वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि इस रिसर्च का मकसद कपड़े की असली उम्र या इसके ईसा मसीह का होने का दावा साबित करना नहीं है। सदियों से अलग-अलग देशों, वातावरण और अनगिनत इंसानों के हाथों से गुजरने के कारण इस पर डीएनए का एक विशाल 'जैविक इतिहास' (Biological History) जमा हो चुका है। ऐसे में कफ़न के मूल डीएनए को अलग करना लगभग नामुमकिन है, लेकिन यह स्टडी बताती है कि आधुनिक फोरेंसिक जीनोमिक्स ऐतिहासिक कलाकृतियों की अनकही कहानियों को कैसे सामने ला सकता है।
इस रिसर्च की सबसे खास बात यह है कि वैज्ञानिकों ने इसके लिए कोई नया सैम्पल नहीं लिया। टीम ने 1978 में आधिकारिक तौर पर एकत्र किए गए कफ़न के लिनन रेशों का इस्तेमाल किया। पहली बार इस ऐतिहासिक वस्त्र पर 'पीसीआर-मुक्त अगली पीढ़ी के मेटाजेनोमिक अनुक्रमण' (PCR-free Next-Generation Metagenomic Sequencing) जैसी अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग किया गया।
ट्यूरिन के कफ़न पर मिले सदियों पुराने डीएनए से उजागर हुआ अनकहा जैविक इतिहास। ( विजुअल: Google Gemini AI)
विविध वातावरण का प्रभाव: पाए गए पौधे, जानवर और सूक्ष्मजीव बताते हैं कि कपड़े को अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में रखा और संग्रहित किया गया था।
संक्रमण और इतिहास: यह वस्त्र जहां-जहां ले जाया गया और जिन-जिन लोगों ने इसे छुआ, उन सभी ने इस पर अपनी आनुवंशिक छाप (Genetic Footprint) छोड़ी है।
'ट्यूरिन का कफ़न सदियों के मानव संपर्क और पर्यावरणीय प्रभावों के कारण आनुवंशिक जानकारी का एक समृद्ध खजाना बन चुका है। हालांकि डीएनए साक्ष्य कपड़े की प्रामाणिकता या उम्र के सभी सवालों का जवाब नहीं दे सकता, लेकिन यह इसके यात्रा इतिहास और फोरेंसिक विज्ञान की नई क्षमताओं को बखूबी दर्शाता है।'
-प्रोफेसर नोएमी प्रोकोपियो (फोरेंसिक विशेषज्ञ, यूनिवर्सिटी ऑफ लैंकाशायर)।
Updated on:
04 Aug 2026 05:15 pm
Published on:
04 Aug 2026 05:13 pm
