
भारतीय सरकारी कंपनी को मिला 450 मिलियन डॉलर से अधिक का कॉन्ट्रैक्ट। (Photo: ChatGpt)
अफ्रीका की ऊर्जा तस्वीर बदलने वाली एक महत्वाकांक्षी परियोजना में भारत की इंजीनियरिंग क्षमता को बड़ी भूमिका मिली है। अफ्रीका के सबसे अमीर उद्योगपतियों में शामिल अलिको डांगोटे के समूह ने केन्या में प्रस्तावित 16 अरब डॉलर की रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल परियोजना के लिए भारत की सरकारी स्वामित्व वाली Engineers India Limited (EIL) को 450 मिलियन डॉलर से अधिक का कॉन्ट्रैक्ट दिया है। यह परियोजना केन्या के तटीय शहर लामू में विकसित की जानी है और इसकी प्रस्तावित क्षमता 7 लाख बैरल कच्चे तेल प्रतिदिन होगी।
यह समझौता केवल एक बड़े अंतरराष्ट्रीय कॉन्ट्रैक्ट की कहानी नहीं है। इसके पीछे भारत और अफ्रीका के बीच बढ़ते औद्योगिक सहयोग, भारतीय इंजीनियरिंग कंपनियों की वैश्विक भूमिका और पूर्वी अफ्रीका की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने की महत्वाकांक्षा भी दिखाई देती है।
EIL और डांगोटे समूह की यह साझेदारी नई नहीं है। भारतीय कंपनी पहले ही नाइजीरिया के लेक्की फ्री जोन में बने डांगोटे रिफाइनरी और पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स के लिए प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंट और Engineering, Procurement and Construction Management यानी EPCM कंसल्टेंट के तौर पर काम कर चुकी है। उस रिफाइनरी की शुरुआती क्षमता 6.5 लाख बैरल प्रतिदिन है और उसकी क्षमता को बढ़ाकर 14 लाख बैरल प्रतिदिन करने की योजना पर भी EIL काम कर रही है।
यानी केन्या की परियोजना में EIL को चुनने के पीछे पहले से मौजूद तकनीकी अनुभव और डांगोटे समूह के साथ काम करने का रिकॉर्ड एक महत्वपूर्ण आधार है।
EIL की भूमिका सिर्फ सलाह देने तक सीमित नहीं होगी। कंपनी प्रोजेक्ट मैनेजमेंट और इंजीनियरिंग, खरीद तथा निर्माण प्रबंधन से जुड़ी जिम्मेदारियां निभाएगी। यानी परियोजना की योजना, इंजीनियरिंग, ठेकेदारों के समन्वय, लागत, समयसीमा, गुणवत्ता और सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं की निगरानी में उसकी भूमिका होगी।
लामू में प्रस्तावित रिफाइनरी की क्षमता 7 लाख बैरल प्रतिदिन रखी गई है। इसके साथ एक बड़ा पेट्रोकेमिकल कॉम्प्लेक्स भी विकसित किया जाना है। परियोजना के पूरा होने पर इसका लक्ष्य पूर्वी अफ्रीका में ईंधन उत्पादन बढ़ाना, आयात पर निर्भरता कम करना और क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना है। साथ ही उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात की संभावना भी रखी गई है।
डांगोटे के लिए यह परियोजना उसके कारोबार के भौगोलिक विस्तार का भी हिस्सा है। नाइजीरिया के अटलांटिक तट से अब उसकी रिफाइनिंग महत्वाकांक्षा हिंद महासागर के तट तक पहुंच रही है। केन्या में परियोजना के जरिए पूर्वी अफ्रीका के बाजारों तक पहुंच बनाने की संभावना बढ़ेगी।
डांगोटे समूह पहले ही अफ्रीका के कई देशों में सीमेंट, उर्वरक, तेल-गैस, खाद्य और अन्य क्षेत्रों में कारोबार करता है। समूह की गतिविधियां 17 अफ्रीकी देशों तक फैली हुई हैं।
केन्या का लामू हिंद महासागर के तट पर स्थित है और इसे क्षेत्रीय व्यापार एवं परिवहन के लिहाज से महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। प्रस्तावित रिफाइनरी इसी क्षेत्र में विकसित होने वाली बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं में शामिल है।
डांगोटे की योजना केवल रिफाइनरी तक सीमित नहीं है। रिपोर्टों के मुताबिक लामू को इथियोपिया से जोड़ने वाली पाइपलाइन और जिबूती-इथियोपिया लिंक समेत करीब 4,000 किलोमीटर के पाइपलाइन नेटवर्क की व्यापक योजना भी चर्चा में है। इसका उद्देश्य क्षेत्र के समुद्र तक सीधी पहुंच न रखने वाले देशों के लिए ऊर्जा परिवहन नेटवर्क विकसित करना है।
अगर यह नेटवर्क योजनानुसार विकसित होता है, तो रिफाइनरी का प्रभाव केवल केन्या तक सीमित नहीं रह सकता। पूर्वी अफ्रीका के व्यापक बाजार को पेट्रोलियम उत्पाद उपलब्ध कराने के लिए यह एक क्षेत्रीय ऊर्जा केंद्र का रूप ले सकती है।
इतने बड़े प्रोजेक्ट के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। सबसे बड़ा सवाल कच्चे तेल की लगातार आपूर्ति का है। केन्या में फिलहाल ऐसा व्यावसायिक स्तर का घरेलू तेल उत्पादन नहीं है जो 7 लाख बैरल प्रतिदिन की प्रस्तावित रिफाइनरी की जरूरत पूरी कर सके। ऐसे में कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए दूसरे देशों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री बाजार पर निर्भरता महत्वपूर्ण मुद्दा होगी।
दक्षिण सूडान और युगांडा जैसे संभावित स्रोतों से तेल लाने की संभावनाएं हैं, लेकिन इनके साथ पाइपलाइन, परिवहन, सुरक्षा और भू-राजनीतिक जोखिम जुड़े हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार से समुद्री रास्ते के जरिए कच्चा तेल लाना एक विकल्प हो सकता है, लेकिन इससे परियोजना वैश्विक तेल कीमतों और समुद्री परिवहन की लागत से प्रभावित होगी।
इसके अलावा इतनी बड़ी परियोजना के लिए भारी निवेश, बंदरगाह और भंडारण सुविधाओं, पाइपलाइन नेटवर्क तथा अन्य बुनियादी ढांचे की जरूरत होगी। लामू क्षेत्र में पर्यावरणीय चिंताएं और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत से जुड़े मुद्दे भी परियोजना के लिए महत्वपूर्ण होंगे।
EIL को मिला यह कॉन्ट्रैक्ट भारतीय इंजीनियरिंग और तकनीकी सेवाओं की वैश्विक पहुंच के लिहाज से महत्वपूर्ण है। भारत लंबे समय से अफ्रीकी देशों के साथ ऊर्जा, बुनियादी ढांचे, डिजिटल सेवाओं और औद्योगिक परियोजनाओं में सहयोग बढ़ा रहा है। केन्या की इतनी बड़ी रिफाइनरी परियोजना में भारतीय कंपनी की भूमिका इस आर्थिक रिश्ते को एक और स्तर पर ले जाती है।
इस सौदे की खास बात यह भी है कि भारत यहां सिर्फ एक बाजार के रूप में नहीं, बल्कि 'तकनीकी विशेषज्ञता उपलब्ध कराने वाले साझेदार' के रूप में दिखाई देता है। EIL के लिए यह अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं में अपने अनुभव को और विस्तार देने का अवसर है।
डांगोटे की नाइजीरियाई रिफाइनरी में EIL की पिछली भूमिका ने दोनों कंपनियों के बीच भरोसे की नींव तैयार की। अब वही अनुभव केन्या की कहीं बड़ी प्रस्तावित परियोजना में इस्तेमाल किया जाएगा।
हालांकि रिफाइनरी के निर्माण की अंतिम समयसीमा अभी स्पष्ट नहीं है, डांगोटे ने सितंबर 2026 के अंत तक परियोजना पर काम शुरू करने की बात कही है। रिपोर्टों के अनुसार पूरी परियोजना की लागत करीब 16 अरब डॉलर बताई गई है, जबकि कुछ पूर्व अनुमानों में यह आंकड़ा लगभग 17 अरब डॉलर तक रहा है।
आखिरकार, केन्या की यह परियोजना केवल एक रिफाइनरी बनाने की योजना नहीं है। यह पूर्वी अफ्रीका की ऊर्जा आपूर्ति, क्षेत्रीय व्यापार और औद्योगिक ढांचे को प्रभावित करने वाली बड़ी पहल है। और इस पूरे सपने के इंजीनियरिंग तथा प्रोजेक्ट मैनेजमेंट के केंद्र में भारत की Engineers India Limited का होना बताता है कि भारतीय तकनीकी कंपनियां अब देश की सीमाओं से बाहर भी बड़े ऊर्जा ढांचे की योजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
Updated on:
23 Sept 2026 04:18 pm
Published on:
23 Sept 2026 04:18 pm
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