
PM मोदी और उज्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव (फोटो सोर्स- Chatgpt)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने उज्बेकिस्तान दौरे के समय वहां के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव के साथ 11 महत्वपूर्ण समझौतों (India Uzbekistan Deal) पर साइन किए। इसके साथ ही 5 बड़ी घोषणाएं भी की हैं। इन 11 समझौतों में एक फैसला ऐसा है, जो दुनिया के 32.41 करोड़ और भारत देश के करीब 95.50 लाख बौद्ध अनुयायियों में खुशी की लहर लेकर आया है।
दक्षिण उज्बेकिस्तान के टर्मेज (Termez) में स्थित दो अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण बौद्ध मठ फयाज तेपा (Fayaz Tepa) और कारा तेपा (Kara Tepa) के पुनरुद्धार और संरक्षण के लिए दोनों देशों ने एक विशेष सहमति पत्र पर साइन किए हैं। इसके तहत भारत उज्बेकिस्तान के साथ मिलकर इन दोनों बौद्ध साइट को संवारेगा।
उज्बेकिस्तान में बौद्ध धर्म के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र फयाज तेपा और कारा तेपा दक्षिण उज्बेकिस्तान के टर्मेज में स्थित दो अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण बौद्ध मठ परिसर हैं। ये प्राचीन बैक्ट्रिया क्षेत्र का हिस्सा थे और सिल्क रोड (रेशम मार्ग) पर बौद्ध धर्म के प्रसार के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र माने जाते हैं।
इतिहास पर नजर डालें तो फयाज तेपा की स्थापना पहली शताब्दी ईस्वी (कुषाण काल) में हुई थी। इसमें एक मुख्य स्तूप, बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए कमरे और एक बड़ा लॉन शामिल है। फयाज तेपा के भवन को मुख्य रूप से तीन भागों आवास, भोजनालय और पूजा स्थल में बांटा गया था।
फयाज तेपा से 1968 में भगवान बुद्ध की एक विश्व प्रसिद्ध त्रिमूर्ति मिली थी। जिसमें भगवान बुद्ध दो भिक्षुओं के साथ बोधि वृक्ष के नीचे बैठे हैं। यह मूर्ति गांधार और ग्रीक-बौद्ध कला का एक नमूना मानी जाती है, जो दर्शाती है कि मध्य एशिया में भारतीय और यूनानी संस्कृतियों का कितना गहरा मिलन हुआ था। यह प्रतिमा वर्तमान में उज्बेकिस्तान के राज्य इतिहास संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है।
कारा तेपा एक प्राचीन बौद्ध पुरातात्विक स्थल है। पहली से चौथी शताब्दी ईस्वी (कुषाण काल) के दौरान यह बौद्ध धर्म, संस्कृति और शिक्षा का एक बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था। यह फयाज तेपा से कुछ सौ मीटर की दूरी पर स्थित है। इसका विकास मुख्य रूप से दूसरी से चौथी शताब्दी ईस्वी के बीच हुआ।
कारा तेपा 3 बलुआ पत्थर की पहाड़ियों पर बना हुआ है। इसकी गुफाएं अनूठी हैं, इनमे बौद्ध भिक्षु ध्यान और साधना करते थे। कारा तेपा की दीवारों पर प्राचीन कुषाण, ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों में प्राचीन शिलालेख और दीवार चित्र मिले हैं, जो अपने इतिहास पर रोशनी डालते हैं। ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों के शिलालेख साबित करते हैं कि यहां भारतीय बौद्ध विद्वानों का नियमित आना-जाना था।
सिल्क रोड यानी रेशम मार्ग प्राचीन और मध्यकालीन व्यापारिक मार्गों का एक विशाल नेटवर्क था, जो एशिया, यूरोप और अफ्रीका को आपस में जोड़ता था। इस मार्ग का नाम चीन से होने वाले रेशम के भारी व्यापार के कारण पड़ा था। 6,500 किलोमीटर से अधिक लंबा यह मार्ग चीन से शुरू होकर मध्य एशिया, भारत, ईरान और रोम तक जाता था।
रेशम के अलावा इस रास्ते से मसाले, चाय, सोना, चांदी, कीमती पत्थर और चीनी मिट्टी के बर्तन का व्यापार होता था। उज्बेकिस्तान को सिल्क रोड का मुख्य केंद्र या दिल कहा जाता था। भौगोलिक रूप से मध्य एशिया के केंद्र में स्थित होने के कारण, चीन को यूरोप और मध्य पूर्व से जोड़ने वाले लगभग सभी प्रमुख व्यापारिक रास्ते उज्बेकिस्तान से होकर गुजरते थे।
भारत और उज्बेकिस्तान के बीच फयाज तेपा और कारा तेपा के पुनरुद्धार और संरक्षण के लिए हुए सहमति पत्र पर हस्ताक्षर से दुनिया भर के 50 करोड़ और भारत देश के करीब 84 लाख बौद्ध अनुयायियों को नया आध्यात्मिक केंद्र मिलेगा। अब तक बौद्ध सर्किट मुख्य रूप से नेपाल के लुम्बिनी और भारत के बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर तक सीमित था। इस पहल से मध्य एशिया का टर्मेज क्षेत्र भी इस सर्किट का एक प्रमुख हिस्सा बन जाएगा। बौद्ध अनुयायियों को उस मार्ग को करीब से देखने और समझने का मौका मिलेगा, जिससे होकर बौद्ध धर्म भारत से चीन, जापान और कोरिया तक फैला था।
भारत के फयाज तेपा और कारा तेपा के संरक्षण कार्य के तहत पर्यटकों के लिए मार्ग, सूचना केंद्र और बुनियादी सुविधाएं बेहतर की जाएंगी। साथ ही भारत और उज्बेकिस्तान के बीच हुए पर्यटन सहयोग समझौते के कारण श्रद्धालुओं के लिए टर्मेज की यात्रा करना अधिक सुरक्षित और आसान हो जाएगा।
भारत के साथ हुए समझौते के बाद इन पुराने स्थानों को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से संरक्षित किया जाएगा। कारा तेपा की गुफाओं में मौजूद ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों के प्राचीन शिलालेखों का दस्तावेजीकरण होगा, जिससे बौद्ध धर्म के शुरुआती सिद्धांतों को समझने में मदद मिलेगी।
उज्बेकिस्तान के फयाज तेपा और कारा तेपा के संरक्षण की कमान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) संभालेगा। एएसआई के पास भारत के नालंदा और सारनाथ जैसे बौद्ध स्थलों के संरक्षण का लंबा अनुभव है। इसका उपयोग वह यहां करेगा। कारा तेपा की गुफाओं की ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों के शिलालेखों को एएसआई डिकोड करके उन्हें डिजीटल रूप देकर सहेजेगा। इसके साथ ही यहां से मिलीं मूर्तियों और कलाकृतियों को सहेजने के लिए एएसआई एक आधुनिक ऑन-साइट संग्रहालय बनाने में भी मदद करेगा।
Updated on:
01 Sept 2026 08:17 pm
Published on:
01 Sept 2026 08:17 pm
