
सांकेतिक इमेज (सोर्स-Chatgpt)
विदेश में पढ़ाई करना लंबे समय से भारतीय छात्रों और उनके परिवारों के लिए बेहतर शिक्षा और वैश्विक करियर से जुड़ा बड़ा सपना रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में अंडरग्रेजुएट डिग्री के लिए जाने का चलन भी तेजी से बढ़ा था। अब तस्वीर में बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। छात्र विदेश में पढ़ाई का सपना छोड़ नहीं रहे, बल्कि विदेश जाने का समय बदल रहे हैं। अब छात्र पहले भारत में ग्रेजुएशन, उसके बाद विदेश में मास्टर्स और फिर ग्लोबल करियर जैसे विकल्प तलाश रहे हैं।
Cambridge Destination Survey 2025-26 से सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, भारत में विश्वविद्यालय जाने वाले सर्वेक्षित Cambridge learners में 2025 में 50% ने अंडरग्रेजुएट पढ़ाई के लिए भारत में रहने का विकल्प चुना। 2024 में यह आंकड़ा 47% था। वहीं, अंडरग्रेजुएट पढ़ाई के लिए विदेश जाने वालों की हिस्सेदारी 42% से घटकर 40% रह गई। छात्रों का 50% का आंकड़ा Cambridge Destination Survey में शामिल Cambridge learners से संबंधित है। सर्वे में दुनिया के 49 देशों के 404 स्कूलों ने हिस्सा लिया और करीब 24,637 विद्यार्थियों को इसमें प्रतिनिधित्व मिला। भारत से 112 स्कूलों ने प्रतिक्रिया दी।
Cambridge International Education के ग्रुप MD रॉड स्मिथ के मुताबिक, शिक्षा में ‘वैल्यू’ को देखने का छात्रों का नजरिया बदल रहा है। अब केवल किसी डिग्री की प्रतिष्ठा या उसकी कीमत देखकर फैसला नहीं हो रहा। छात्र शिक्षा से रोजगार और उसके बाद मिलने वाले दीर्घकालिक अवसरों तक की पूरी यात्रा का आकलन कर रहे हैं। यही वजह है कि विदेश में पढ़ने की महत्वाकांक्षा खत्म होने के बजाय उसका स्वरूप बदल रहा है। स्कूल के तुरंत बाद विदेश जाने की जगह भारत में स्नातक, उसके बाद विदेश से पोस्टग्रेजुएशन और फिर अंतरराष्ट्रीय करियर का रास्ता अधिक आकर्षक बन रहा है। Cambridge रिपोर्ट इस बदलाव को केवल महंगी विदेशी शिक्षा, कमजोर रुपये, वीजा पाबंदियों या भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से पैदा हुआ अस्थायी बदलाव नहीं, बल्कि एक संभावित ‘structural shift’ मानती है।
सर्वे की एक अहम बात यह है कि भारत उच्च शिक्षा के मामले में खुद अपना बड़ा प्रतिस्पर्धी बन रहा है। भारतीय विश्वविद्यालयों को अब केवल उन विद्यार्थियों के विकल्प के रूप में नहीं देखा जा रहा, जो विदेश जाने का खर्च नहीं उठा सकते या विदेशी विश्वविद्यालय में प्रवेश नहीं पा सके।
बेहतर निजी और interdisciplinary संस्थान, अधिक flexible courses और भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस जैसे बदलाव घरेलू उच्च शिक्षा को आकर्षक बना रहे हैं। Data Science, Business Analytics और Artificial Intelligence जैसे क्षेत्रों में multidisciplinary विकल्प भी विद्यार्थियों को देश में रोकने में भूमिका निभा रहे हैं।
इस बदलाव के पीछे सरकारी नीतिगत आधार भी है। University Grants Commission ने नवंबर 2023 में विदेशी उच्च शिक्षण संस्थानों के भारत में कैंपस स्थापित करने और संचालित करने के लिए बाकायदा नियम अधिसूचित किए थे। इन नियमों में योग्य विदेशी संस्थानों के लिए भारतीय कैंपस स्थापित करने की व्यवस्था है और UGC की पूर्व मंजूरी अनिवार्य है।
Cambridge के निष्कर्षों के समानांतर अन्य सर्वे भी बताते हैं कि विदेश में पढ़ाई के प्रति भारतीय युवाओं का नजरिया बदल रहा है। Emeritus की ‘India’s Gen Z Outlook 2026’ रिपोर्ट के मुताबिक, विदेश में पढ़ाई पर विचार कर चुके उत्तरदाताओं में 48% ने कहा कि पिछले एक साल में उनकी दिलचस्पी कम हुई है। इनमें 37% ने लागत, 26% ने वीजा और इमिग्रेशन संबंधी जटिलताओं और 24% ने सुरक्षा संबंधी चिंताओं को कारण बताया।
दिलचस्प बात यह है कि इसी सर्वे में 68% उत्तरदाताओं ने भारत में किसी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले कार्यक्रम को करने की संभावना जताई। यानी अंतरराष्ट्रीय शिक्षा की मांग खत्म नहीं हो रही, बल्कि छात्र उसे कम जोखिम और बेहतर लागत वाले मॉडल में तलाश रहे हैं।
इस बदलाव को ‘भारतीय छात्रों ने विदेश जाना छोड़ दिया’ के रूप में देखना गलत होगा। विदेश मंत्रालय के उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2025 तक उच्च शिक्षा के लिए विदेश में मौजूद भारतीय छात्रों की अनुमानित संख्या करीब 12.5 लाख थी। इससे साफ है कि अंतरराष्ट्रीय शिक्षा भारतीय विद्यार्थियों के लिए अब भी महत्वपूर्ण है। अंतर सिर्फ इतना है कि पारंपरिक 4 बड़े गंतव्य में शामिल अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया, अब अकेले विकल्प नहीं रह गए हैं। सर्वे के मुताबिक सिंगापुर, UAE, जर्मनी, जापान, दक्षिण कोरिया,आयरलैंड और नीदरलैंड जैसे देशों में भी रुचि बढ़ रही है।
यह बदलाव पूरे दक्षिण एशिया में समान नहीं है। Cambridge सर्वे के अनुसार भारत और बांग्लादेश में स्थानीय स्तर पर अंडरग्रेजुएट पढ़ाई के बाद विदेश में पोस्टग्रेजुएशन की सोच मजबूत दिखाई देती है। इसके विपरीत श्रीलंका में विदेश में पढ़ने की इच्छा मजबूत बनी हुई है और वहां आर्थिक सामर्थ्य बड़ी बाधा के रूप में सामने आती है। भारतीय छात्रों की वैश्विक महत्वाकांक्षा कम होने के बजाय अधिक रणनीतिक होती दिखाई दे रही है।
Updated on:
02 Sept 2026 09:31 pm
Published on:
02 Sept 2026 09:31 pm
