
सांकेतिक इमेज (सोर्स-gemini)
जलवायु परिवर्तन का असर मौसम के साथ ही मानव जीवन पर भी पड़ रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन, मौसम, गर्मी, बारिश और बाढ़ जैसे मौसम संबंधी बदलावों ने बीमारियों के फैलने का जोखिम बढ़ा दिया है। आइए समझते हैं कि यह समस्या कितनी बड़ी चुनौती है और इसके पीछे क्या कारण हैं?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) बताता है कि जलवायु परिवर्तन से तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव हो रहे हैं। इसकी वजह से पानी और भोजन से फैलने वाली बीमारियां, जैसे टाइफाइड, हैजा, हेपेटाइटिस-A आदि, बढ़ रही हैं। गर्म मौसम में पानी दूषित होने की संभावना बढ़ जाती है, जिससे बैक्टीरिया और वायरस तेजी से फैलते हैं।
टाइफाइड पर विशेष ध्यान इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि WHO के अनुसार, 2019 में अनुमानतः 90 लाख लोग टाइफाइड से संक्रमित हुए और 1,10,000 लोगों की मौत हुई। यह बीमारी दूषित पानी या भोजन से फैलती है और खराब स्वच्छता, भीड़भाड़ तथा जलवायु परिवर्तन इसे और गंभीर बना रहे हैं।
भारत में नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC) के सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल एंड ऑक्यूपेशनल हेल्थ, क्लाइमेट चेंज एंड हेल्थ (CEOH‑CCH) ने नेशनल एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज एंड ह्यूमन हेल्थ (NAPCCHH) तैयार किया है। जिसे 2019 में शुरू कर 2021 में संशोधित किया गया।
इस योजना में हीट स्ट्रोक, वेक्टर‑जनित बीमारियां, चरम मौसम, ग्रीन हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर और वायु प्रदूषण जैसी चुनौतियों के लिए तैयारियां शामिल हैं। इसके अलावा, स्वास्थ्य मंत्रालय ने बाढ़ जैसी आपदाओं के दौरान पानी और खाद्यजनित बीमारियों, वेक्टर‑जनित बीमारियों और स्वच्छता से जुड़ी समस्याओं पर सार्वजनिक स्वास्थ्य दिशा‑निर्देश जारी किए हैं। इस संबंध में 28 राज्यों ने राज्य‑स्तरीय कार्ययोजना बनाई है।
BMJ की समीक्षा बताती है कि बढ़ता तापमान और बदलते मौसम पैटर्न से मलेरिया, डेंगू और शिगेला जैसी बीमारियां अधिक फैल रही हैं। खासकर कम विकसित और घनी आबादी वाले क्षेत्र ज्यादा प्रभावित हैं। IPCC की रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है कि जलवायु जोखिम तेजी से बढ़ रहे हैं और अनुकूलन मुश्किल हो रहा है।
WHO का अनुमान है कि 2030 के दशक तक जलवायु परिवर्तन के कारण प्रतिवर्ष लगभग 2,50,000 अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं, जिनमें मलेरिया, डायरिया और हीट स्ट्रेस जैसी बीमारियां शामिल हैं। यह संकेत देता है कि जलवायु‑संवेदनशील बीमारियों का बोझ बढ़ने वाला है।
स्वच्छ पानी, बेहतर स्वच्छता और टीकाकरण, टाइफाइड जैसी बीमारियों से बचाव के सबसे प्रभावी उपाय हैं। WHO ने टाइफाइड कन्जुगेट वैक्सीन को मंजूरी दी है, जो उच्च‑बोझ वाले देशों में उपयोग के लिए प्राथमिकता पर है। इसके साथ ही, जलवायु‑संबंधित स्वास्थ्य जोखिमों की निगरानी और प्रतिक्रिया प्रणाली विकसित करना जरूरी है।
WHO की सलाह है कि स्वास्थ्य योजनाओं में जलवायु जोखिम को शामिल किया जाए और जल, भोजन तथा पर्यावरण क्षेत्र में अनुकूलन क्षमता बढ़ाई जाए। शहरी क्षेत्रों में मौसम और स्वास्थ्य डेटा का एकीकरण भी आवश्यक है। उदाहरण के लिए, बेंगलुरु में क्लाइमेट और स्वास्थ्य डेटा का उपयोग करके AI‑आधारित डेंगू पूर्वानुमान मॉडल विकसित किया गया है। यह मॉडल भविष्य में भारत में टाइफाइड जैसी बीमारियों के लिए भी उपयोगी हो सकता है।
बीमारियों से बचने के लिए घर‑परिवार स्तर पर साफ पानी पीना, हाथ धोना, भोजन अच्छी तरह पकाना और टीकाकरण कराना सबसे सरल और असरदार कदम हैं। स्कूलों, पंचायतों और स्थानीय संस्थाओं को जलवायु‑संबंधित स्वास्थ्य शिक्षा और आपदा‑तैयारी में शामिल करना चाहिए। स्थानीय स्तर पर जलवायु‑सहज स्वास्थ्य निगरानी, जल स्रोतों की सफाई और टीकाकरण अभियान जैसे कदम प्रभावी हो सकते हैं। इसके साथ ही, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को जलवायु‑संबंधित बीमारियों की पहचान और प्रतिक्रिया में प्रशिक्षित करना भी आवश्यक है।
जलवायु परिवर्तन और संक्रामक बीमारियों के बीच संबंध स्पष्ट है और भारत जैसे देश में यह चुनौती और भी गंभीर है। लेकिन तैयारी और जागरूकता से हम इस जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं। स्वच्छता, टीकाकरण, जलवायु‑सक्षम स्वास्थ्य प्रणालियां और समुदाय‑स्तरीय तैयारी, इन सब पर ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि हम इन कदमों को अपनाएं, तो आने वाले समय में टाइफाइड और अन्य जलवायु‑संवेदनशील बीमारियों से होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है।
Updated on:
03 Aug 2026 08:29 pm
Published on:
03 Aug 2026 08:29 pm
