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क्या नींद की कमी से कैंसर हो सकता है? जानिए देर रात तक जागने से होने वाले नुकसान और विशेषज्ञों की राय

आज के दौर में हमारी जीवनशैली में नींद की कमी एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। देर रात तक स्क्रीन देखते रहना, जिसे 'रिवेंज बेडटाइम प्रोक्रैस्टिनेशन' कहा जाता है। यह आदत हमारी सेहत को बिगाड़ सकती है।
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भारत

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Vinay Shakya

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Updated: 7 Nov 2026, 6:31 PM IST

symptoms of cancer

सांकेतिक इमेज (सोर्स- Janani)

मुश्किल से 5 घंटे की नींद लेने के बाद अलार्म की आवाज पर जल्दी उठना, आपके शरीर पर बहुत बुरा असर डालता है। इस खबर में हम जानेंगे कि जब आपके शरीर को जरूरी आराम नहीं मिलता, तो क्या होता है? क्या लंबे समय तक नींद में खलल पड़ने से कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है?

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

विशेषज्ञों का कहना है कि रिसर्च से पता चला है कि नींद के बिगड़े हुए पैटर्न और कुछ तरह के कैंसर के बीच एक संभावित लिंक है, लेकिन यह साबित नहीं हुआ है कि सिर्फ कम नींद लेना ही कैंसर का सीधा कारण है। हेल्दी नींद के महत्व को देखते हुए और कैंसर के बेवजह के डर से बचने के लिए, नींद की कमी (Sleep Deprivation) और कैंसर के बीच के वास्तविक संबंध और अंतर को समझना बेहद जरूरी है।

शरीर को रेगुलर स्लीप साइकिल की जरूरत क्यों होती है?


डॉक्टर्स का कहना है कि हमारा शरीर एक अंदरूनी 24-घंटे की घड़ी के हिसाब से काम करता है, जिसे 'सर्कडियन रिदम' कहते हैं। यह रिदम सोने-जागने के साइकिल, हॉर्मोन रिलीज, शरीर के तापमान और कई दूसरे बायोलॉजिकल प्रोसेस को रेगुलेट करने में मदद करता है। रोशनी के संपर्क में आना (खासकर शाम और रात के समय) इस रिदम पर असर डाल सकता है।

जब हम सोते हैं, तो हमारा शरीर टिशू को रिपेयर करने, इम्यून सिस्टम के काम को सपोर्ट करने और मेटाबॉलिज्म को रेगुलेट करने का काम करता है। मेलाटोनिन, जो नींद-जागने के साइकिल से जुड़ा एक हॉर्मोन है, आमतौर पर अंधेरा होने पर रिलीज होता है। लैब रिसर्च से पता चलता है कि मेलाटोनिन सिग्नलिंग और सर्कडियन रिदम में रुकावट कैंसर के विकास से जुड़े बायोलॉजिकल प्रोसेस पर असर डाल सकती है। हालांकि, सिर्फ ये प्रोसेस यह साबित नहीं करते कि खराब नींद से इंसानों में कैंसर होता है।

कैंसर के खतरे के बारे में रिसर्च क्या कहती है?

2019 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का हिस्सा, 'इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर' (IARC) ने नाइट-शिफ्ट में काम करने को 'संभवतः मनुष्यों के लिए कैंसरकारी' (ग्रुप 2A कार्सिनोजेन) की श्रेणी में रखा। वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि रात में काम करने से शरीर की प्राकृतिक जैविक घड़ी (सर्केडियन रिदम) बुरी तरह बाधित होती है।

इससे मेलाटोनिन हार्मोन का उत्पादन कम हो जाता है, जो शरीर को ट्यूमर से बचाने और कोशिकाओं की मरम्मत करने में मदद करता है। लंबे समय तक नाइट-शिफ्ट में काम करने से ब्रेस्ट, प्रोस्टेट और कोलोरेक्टल कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। 2020 में प्रकाशित यह आकलन, मनुष्यों पर किए गए सीमित अध्ययनों, जानवरों पर किए गए अध्ययनों से मिले पर्याप्त सबूतों और ठोस वैज्ञानिक डेटा पर आधारित था।

यह चिंता मुख्य रूप से लंबे समय तक काम करने से जुड़ी है, जो शरीर की नेचुरल 'सर्कडियन रिदम' को बिगाड़ देती है। हालांकि, इस क्लासिफिकेशन का मतलब यह नहीं है कि नाइट शिफ्ट में काम करने वाले हर किसी को कैंसर हो ही जाएगा, और न ही इसका मतलब यह है कि कभी-कभी देर तक जागने से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। सिर्फ सोने के समय पर फोकस करने वाली रिसर्च से कोई पक्का नतीजा नहीं निकलता है।

2018 में BMC कैंसर में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा और मेटा-विश्लेषण (जिसमें लगभग 15।5 लाख लोगों से जुड़े 65 अध्ययनों की जांच की गई थी) में नींद की अवधि (चाहे वह कम हो या ज्यादा) और कैंसर के जोखिम के बीच कोई खास संबंध नहीं पाया गया। हालांकि कुछ विशिष्ट समूहों के नतीजों में संभावित संबंध का संकेत मिला था, लेकिन 'डोज-रिस्पॉन्स एनालिसिस' से इसकी पुष्टि नहीं हुई। विशेषज्ञों का जोर है कि किसी भी विषय पर कोई पक्का या ठोस निष्कर्ष निकालने से पहले व्यापक और मजबूत शोध होना जरूरी है। अधूरी जानकारी पर भरोसा करने या जल्दबाजी में फैसले लेने से अक्सर गलत निष्कर्ष निकल सकते हैं। इसलिए इस विषय पर अभी और रिसर्च की जरूरत है।

भारत के लिए यह क्यों मायने रखता है?


भारतीयों के लिए (जिनमें हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स, शिफ्ट में काम करने वाले फैक्ट्री कर्मचारी, IT कर्मचारी, सुरक्षाकर्मी, ट्रांसपोर्ट कर्मचारी और व्यस्त काम-काज वाले अन्य लोग शामिल हैं) नींद का एक नियमित रूटीन बनाए रखना मुश्किल होता है। देर रात तक मोबाइल फोन का इस्तेमाल, काम पर जाने-आने में लगने वाला लंबा समय, घर की जिम्मेदारियां और काम के अनियमित घंटे इस समस्या को और बढ़ा सकते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि अगर आपकी एक रात की नींद पूरी न हो, तो आप घबरा जाएं। बल्कि, अगर आपकी नींद लगातार खराब हो रही है, तो इसे स्वास्थ्य से जुड़ी एक ऐसी समस्या माना जाना चाहिए जिस पर ध्यान देने की जरूरत है। भले ही कैंसर के साथ इसका संबंध अभी तक पूरी तरह से स्पष्ट न हुआ हो।

अपनी नींद को बेहतर बनाने के लिए क्या कर सकते हैं?

  • आपको सोने और जागने का एक नियमित रूटीन बनाना चाहिए।
  • दिन के बाद के समय में कैफीन (जैसे चाय या कॉफी) का सेवन कम करें।
  • सोने से पहले तेज रोशनी वाली स्क्रीन (जैसे फोन या टीवी) देखने से बचें और अपने बेडरूम को अंधेरा और आरामदायक रखें। इससे आपको आसानी से नींद आने में मदद मिलती है।
  • जो लोग नाइट शिफ्ट में काम करते हैं, उन्हें सोने का एक ऐसा नियमित रूटीन बनाने की कोशिश करनी चाहिए जो उनके काम के घंटों के हिसाब से सही हो।
  • अगर आपको लगातार नींद न आने (इंसोम्निया), जोर से खर्राटे लेने, सोते समय सांस लेने में दिक्कत होने, या दिन के समय बहुत ज्यादा नींद आने जैसी समस्याएं होती हैं, तो आपको डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए।
  • अन्य बचाव उपायों के साथ-साथ, नींद पर भी ध्यान देना चाहिए। भले ही नींद की कमी सीधे तौर पर कैंसर का कारण न हो, लेकिन नींद पूरी न होने से शरीर में कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं, जो आगे चलकर कैंसर का कारण बन सकती हैं। इसलिए, कैंसर से बचाव और बेहतर स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त और अच्छी गुणवत्ता वाली नींद लेना बहुत जरूरी है।
  • नींद में खलल से बचने और कैंसर के जोखिम को कम करने के लिए तंबाकू से दूर रहना, शराब का सेवन सीमित करना, स्वस्थ वजन बनाए रखना, शारीरिक रूप से सक्रिय रहना, कैंसर स्क्रीनिंग के सुझावों का पालन करना और कोई भी चेतावनी संकेत दिखने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।

(डिस्क्लेमर: यहां दी गई स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और सुझाव केवल शैक्षिक उद्देश्यों के लिए हैं। इन सुझावों का पालन करने से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श करना सर्वोत्तम होगा।)