
lord mountbatten Murder know history facts: जानें कैसे की गई थी भारत के अंतिम वायसराय की हत्या और किसने ली थी इसकी जिम्मेदारी, भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण हो चली थी ये घटना? (AI Creative)
Lord mountbatten Murder story:आज, 27 अगस्त की तारीख हमें इसी दिन सन् 1979 में हुई एक दर्दनाक घटना की याद दिलाती है। लॉर्ड लुई माउंटबेटन की हत्या। वे भारत के अंतिम वायसराय और स्वतंत्र भारत के पहले गवर्नर‑जनरल थे। उस दिन की घटना ने न केवल ब्रिटिश राजवंश को झकझोर दिया, बल्कि भारत सहित दुनिया भर में गहरी संवेदना उत्पन्न की।
उस सुबह माउंटबेटन अपनी पारिवारिक छुट्टियों के दौरान आयरलैंड के काउंटी स्लाइगो के मुलाघमोरे में स्थित क्लासीबॉन कैसल से अपनी नाव “Shadow V” पर निकले थे। उनके साथ उनकी बेटी लेडी पैट्रीशिया ब्राबॉर्न, उनके पति लॉर्ड ब्राबॉर्न, उनके जुड़वां पोते, निकोलस और टिमोथी, उनकी सास डोरिन, लेडी ब्राबॉर्न और एक स्थानीय नाव सहायक के रूप में पॉल मैक्सवेल मौजूद थे। उस रात, आईआरए के सदस्य थॉमस मैकमैहन ने नाव में एक रेडियो-नियंत्रित बम छिपा दिया था।
सुबह लगभग 11:15 बजे, जब नाव समुद्र में कुछ दूर पहुंच गई और माउंटबेटन नाव चला रहे थे, बम विस्फोट कर दिया गया। धमाका इतना तेज था कि माउंटबेटन की टांगें लगभग अलग हो गईं और नाव पूरी तरह नष्ट हो गई। इस हमले में माउंटबेटन, उनके 14 वर्षीय पोते निकोलस और 15 वर्षीय नौकर पॉल मैक्सवेल की मौके पर ही मृत्यु हो गई। लेडी ब्राबॉर्न गंभीर रूप से घायल हो गईं और अगले दिन अस्पताल में उनका निधन हो गया।
आईआरए ने इस हमले की जिम्मेदारी ली। थॉमस मैकमैहन को बाद में गिरफ्तार किया गया और नवंबर 1979 में विशेष अपराध अदालत में मुकदमा चलाया गया। उन्हें दोषी ठहराया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। बाद में, गुड फ्राइडे समझौते के तहत उन्हें 1998 में रिहा कर दिया गया।
उनकी अंतिम यात्रा 5 सितंबर 1979 को वेस्टमिंस्टर एबे में आयोजित की गई। इस समारोह में क्वीन एलिजाबेथ द्वितीय, कई यूरोपीय राजघरानों के सदस्य और कई देशों के सैन्य प्रतिनिधि उपस्थित हुए। उनके ताबूत को रॉयल नेवी के 118 जवानों ने गन कैरिज पर खींचा, और यह समारोह टेलीविजन पर प्रसारित हुआ। अंत में उन्हें रोम्से एबे में दफनाया गया।
इस घटना का भारत के लिए विशेष महत्व है, क्योंकि माउंटबेटन ने 1947 में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाई थी। वे भारत के अंतिम वायसराय थे और स्वतंत्रता के बाद पहले गवर्नर‑जनरल बने। उनके निधन पर भारत में भी शोक की लहर दौड़ गई। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक उस समय कुछ स्थानों पर दुकानें बंद कर दी गई थीं और एक सप्ताह का शोक मनाया गया था।
आज, 27 अगस्त (2026) को जब हम इस घटना को याद करते हैं, तो यह केवल इतिहास नहीं रह जाता, बल्कि यह एक ऐसा दिन है, जिसने सत्ता, स्वतंत्रता और हिंसा की जटिलताओं को एक साथ उजागर किया। माउंटबेटन की हत्या ने ब्रिटिश-आयरिश संबंधों में तनाव बढ़ा दिया था। वहीं भारत में यह याद दिलाया कि स्वतंत्रता की राह कितनी नाजुक और संघर्षपूर्ण रही है।
इस दिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि सत्ता हस्तांतरण और राजनीतिक परिवर्तन कितनी संवेदनशील प्रक्रिया होती है। माउंटबेटन की भूमिका ने यह दिखाया कि नेतृत्व और जिम्मेदारी का क्या अर्थ होता है। और उनकी हत्या ने यह स्पष्ट कर दिया कि राजनीतिक हिंसा कितनी दूर तक जा सकती है। यह हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए हमें सतर्क और संवेदनशील बने रहना चाहिए।
Updated on:
27 Aug 2026 11:06 am
Published on:
27 Aug 2026 11:06 am
