
बसपा सुप्रीमो मायावती (Photo: ChatGpt)
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की रसड़ा सीट से बसपा के एकमात्र विधायक उमाशंकर सिंह का 5 अगस्त 2026 को कैंसर से निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा का प्रतिनिधित्व भी शून्य हो गया। लोकसभा में पहले से ही पार्टी का कोई सांसद नहीं है, और राज्यसभा में भी बसपा के एकमात्र सदस्य रामजी गौतम का कार्यकाल नवंबर 2026 में समाप्त होना है। यानी पहली बार ऐसा समय आ सकता है जब संसद और उत्तर प्रदेश विधानसभा - दोनों जगह बसपा का कोई प्रतिनिधि नहीं होगा।
यह केवल एक राजनीतिक दल की गिरावट नहीं, बल्कि उत्तर भारत की सामाजिक न्याय की राजनीति के बदलते समीकरणों की कहानी भी है।
बसपा की स्थापना 1984 में कांशीराम ने "बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय" के नारे के साथ की थी। उनका उद्देश्य दलित, पिछड़े, आदिवासी और अन्य वंचित वर्गों को राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी दिलाना था।
मायावती ने एक स्कूल शिक्षिका के रूप में शुरुआत की और कांशीराम के मार्गदर्शन में राजनीति में तेजी से उभरीं। 1995 में वह पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। हालांकि शुरुआती सरकारें गठबंधन और राजनीतिक अस्थिरता के कारण अधिक समय तक नहीं चल सकीं, लेकिन उन्होंने दलित नेतृत्व को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया।
बसपा का स्वर्णकाल 2007 का विधानसभा चुनाव माना जाता है। उस चुनाव में पार्टी ने 403 में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया। उसका वोट शेयर 30.43% रहा। यह उपलब्धि इसलिए भी ऐतिहासिक थी क्योंकि उत्तर प्रदेश में लंबे समय बाद किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिला था।
इस सफलता के पीछे मायावती की प्रसिद्ध "सोशल इंजीनियरिंग" रणनीति थी। उन्होंने केवल दलित वोटों पर निर्भर रहने के बजाय ब्राह्मण, दलित, पिछड़े और कुछ अन्य जातीय समूहों को साथ जोड़ने का प्रयास किया। "ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा" जैसे नारे उस दौर की पहचान बन गए।
मायावती की सरकार ने कानून-व्यवस्था को लेकर अपेक्षाकृत सख्त छवि बनाई। साथ ही लखनऊ और नोएडा में डॉ. भीमराव आंबेडकर, कांशीराम और अन्य दलित प्रतीकों से जुड़े स्मारकों और पार्कों का निर्माण भी हुआ। समर्थकों ने इसे दलित सम्मान का प्रतीक बताया, जबकि विरोधियों ने इसे सरकारी धन की बर्बादी कहा।
2007 की जीत को मायावती दोहरा नहीं सकीं। 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा का वोट शेयर घटकर 25.91% रह गया, और सीटें घटकर 80 रह गईं। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी ने युवा नेतृत्व और बदलाव के संदेश के साथ बहुमत हासिल कर लिया। यहीं से बसपा की लगातार गिरावट शुरू हुई।
2014 का लोकसभा चुनाव बसपा के लिए ऐतिहासिक झटका साबित हुआ। उत्तर प्रदेश में करीब 19.6% वोट मिलने के बावजूद पार्टी एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत सकी। भारत की चुनावी व्यवस्था (फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट) में वोट प्रतिशत अच्छा होने के बावजूद सीटें न मिलना बसपा की सबसे बड़ी राजनीतिक विफलताओं में से एक माना गया।
उधर भारतीय जनता पार्टी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश की राजनीति का समीकरण पूरी तरह बदल दिया। बसपा का परंपरागत गैर-जाटव दलित और कुछ पिछड़ा वोट बैंक धीरे-धीरे भाजपा की ओर खिसकने लगा।
2017 विधानसभा चुनाव में बसपा की स्थिति और खराब हुई। पार्टी का वोट शेयर लगभग 22.23% रहा, लेकिन सीटें घटकर 19 रह गईं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बसपा का वोट पूरे राज्य में फैला हुआ था, लेकिन किसी क्षेत्र में निर्णायक नहीं रह गया। भाजपा ने सामाजिक गठबंधन का दायरा बढ़ाते हुए दलितों की कई गैर-जाटव जातियों को अपने साथ जोड़ लिया।
2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया। इस गठबंधन ने बसपा को 10 लोकसभा सीटें दिलाईं, लेकिन चुनाव के कुछ समय बाद गठबंधन टूट गया। इसके बाद बसपा फिर अकेली पड़ गई। विश्लेषकों के अनुसार यह बसपा का आखिरी बड़ा संसदीय प्रदर्शन साबित हुआ।
2022 विधानसभा चुनाव में बसपा केवल एक सीट जीत सकी। उसका वोट शेयर घटकर लगभग 12.88% रह गया, जो 2007 के मुकाबले आधे से भी कम था। वहीं 2024 लोकसभा चुनाव में भी बसपा को एक भी सीट नहीं मिली। राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी का वोट शेयर लगभग 2% के आसपास सिमट गया। इसके बाद 5 अगस्त 2026 को एकमात्र विधायक उमाशंकर सिंह के निधन के साथ उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी बसपा का प्रतिनिधित्व समाप्त हो गया।
सोशल इंजीनियरिंग का मॉडल टूट गया: 2007 में जिस ब्राह्मण-दलित गठजोड़ ने मायावती को सत्ता दिलाई थी, वह लंबे समय तक टिक नहीं पाया। ब्राह्मण वोट भाजपा की ओर लौट गए, जबकि गैर-जाटव दलितों का बड़ा हिस्सा भी भाजपा के साथ चला गया।
संगठन का अत्यधिक केंद्रीकरण : बसपा में लगभग हर बड़ा फैसला मायावती के स्तर पर केंद्रित रहा। पार्टी में दूसरे पायदान का नेतृत्व विकसित नहीं हो सका। इसके चलते कई वरिष्ठ नेता समय-समय पर पार्टी छोड़ते गए। स्वामी प्रसाद मौर्य, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, लालजी वर्मा, राम अचल राजभर जैसे कई प्रभावशाली चेहरे अलग हो गए।
जमीनी आंदोलन कमजोर पड़ गया : बसपा कभी बूथ स्तर तक मजबूत कैडर वाली पार्टी मानी जाती थी। लेकिन समय के साथ संगठनात्मक सक्रियता घटती गई। कई जिलों में पार्टी का ढांचा निष्क्रिय होता चला गया।
नई राजनीति के साथ तालमेल की कमी: सोशल मीडिया, डिजिटल प्रचार और लगातार जनसंपर्क आज की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। विश्लेषकों का मानना है कि बसपा इस बदलाव के साथ खुद को उतनी तेजी से नहीं ढाल सकी।
गठबंधन की अस्थिर रणनीति: कभी अकेले चुनाव लड़ना, कभी गठबंधन करना और फिर उसे तोड़ देना — इस रणनीति ने भी मतदाताओं के बीच भ्रम पैदा किया।
राजनीति के क्षेत्र में यह कहना जल्दबाजी होगी। आज भी जाटव समुदाय के बीच मायावती का प्रभाव बना हुआ माना जाता है। उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति की चर्चा उनके बिना पूरी नहीं होती। चार बार मुख्यमंत्री रह चुकी मायावती का राजनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व अब भी कायम है। हालांकि यह प्रभाव चुनावी सफलता में बदल नहीं पा रहा है।
भारतीय राजनीति में वापसी असंभव नहीं होती। जनता दल से लेकर भाजपा और कांग्रेस तक कई दल उतार-चढ़ाव देख चुके हैं। लेकिन बसपा की चुनौती अधिक कठिन है, क्योंकि उसका पूरा राजनीतिक मॉडल एक मजबूत सामाजिक गठबंधन और करिश्माई नेतृत्व पर आधारित रहा है।
यदि पार्टी संगठन का पुनर्गठन करती है, नए नेतृत्व को अवसर देती है और बदलते सामाजिक समीकरणों के अनुरूप रणनीति बनाती है, तो उसके लिए भविष्य में कुछ राजनीतिक अवसर बन सकते हैं। लेकिन यदि वर्तमान स्थिति बनी रहती है, तो बसपा का प्रभाव केवल इतिहास और प्रतीकात्मक राजनीति तक सीमित होने का खतरा बढ़ सकता है।
मायावती का राजनीतिक सफर भारतीय लोकतंत्र की सबसे असाधारण कहानियों में से एक है। एक दलित महिला का देश के सबसे बड़े राज्य की चार बार मुख्यमंत्री बनना अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि है। लेकिन 2007 के पूर्ण बहुमत से 2026 में विधानसभा और संसद से लगभग पूरी तरह बाहर हो जाना यह भी दिखाता है कि राजनीति में केवल करिश्माई नेतृत्व पर्याप्त नहीं होता। मजबूत संगठन, लगातार जनसंपर्क, नए सामाजिक समीकरणों के अनुरूप रणनीति और समय के साथ बदलाव को स्वीकार करना भी उतना ही जरूरी है। आज बसपा एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि यह गिरावट अंत साबित होगी या किसी नई राजनीतिक शुरुआत की भूमिका।
Updated on:
07 Aug 2026 12:45 pm
Published on:
07 Aug 2026 12:45 pm
