
प्रतीकात्मक तस्वीर | Credit- ChatGPT
परिवार में भावनात्मक बोझ और मानसिक भार का अनुभव अक्सर अनदेखा रह जाता है, लेकिन यह थकावट सिर्फ शारीरिक नहीं - बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी होती है। जब घर की योजनाएं, रिश्तों की देखभाल और भावनात्मक संतुलन बनाए रखना एक ही व्यक्ति की जिम्मेदारी बन जाए, तो वह व्यक्ति खुद थक जाता है। यह वह कहानी है जो अक्सर अनकही रह जाती है।
"मेंटल लोड" का मतलब है घर और बच्चों से जुड़ी योजनाएं बनाने, याद रखने और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने का बोझ जो अक्सर दिखाई नहीं देता। यह अवधारणा पहली बार फ्रांसीसी शोधकर्ता मोनिक हाइकेल ने सामने रखी थी, और तब से कई अध्ययनों में पाया गया है कि यह जिम्मेदारी घरों में महिलाओं पर असमान रूप से पड़ती है, जिससे उनके काम और भावनात्मक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है।
यह बोझ केवल काम में लगने वाला समय नहीं है, बल्कि लगातार याद रखने और योजना बनाने की जिम्मेदारी का एहसास है जिसे अक्सर पुरुष साथी कम आंकते हैं।
पत्रिका के साथ बातचीत में एक वर्किंग महिला ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया, मेरी जैसी कई महिलाएं हैं जो ऑफिस में शिफ्ट खत्म करने के बाद घर पर जाकर बच्चे, पति, सास-ससुर के लिए भी काम करती हैं। हम अगर अपनी शिकायत भी करते हैं तो अनसुना कर दिया जाता है।
भारत में, माताओं पर पारंपरिक घरेलू जिम्मेदारियों के साथ पेशेवर भूमिकाओं का दबाव भी होता है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) के टाइम यूज सर्वे 2024 के अनुसार, 15–59 वर्ष की उम्र में 41% महिलाएं रोजाना घरेलू देखभाल गतिविधियों में शामिल थीं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा सिर्फ 21.4% रहा। इसी सर्वे के मुताबिक महिलाएं रोजाना करीब 289 मिनट अवैतनिक घरेलू काम में बिताती हैं, जबकि पुरुष सिर्फ 88 मिनट - यानी महिलाओं का बोझ पुरुषों से तीन गुना से भी ज्यादा है।
इस "डबल बोझ" का असर नींद, मानसिक शांति और भावनात्मक स्वास्थ्य पर गहरा होता है। लगातार मानसिक सक्रियता - याद रखना, योजना बनाना, परिवार की भावनाओं को संभालना मां को थका देता है, लेकिन यह थकावट अक्सर दिखती नहीं।
केयरगिवर बर्नआउट यानी देखभाल करने वालों की भावनात्मक थकावट भी एक गंभीर वैश्विक समस्या है। अमेरिका के फैमिली केयरगिवर एलायंस के शोध के अनुसार, देखभाल करने वालों में क्लिनिकली महत्वपूर्ण अवसाद के लक्षणों का अनुमान 40 से 70% के बीच है, जिसमें से करीब एक-चौथाई से आधे मामलों में यह मेजर डिप्रेशन के डायग्नोस्टिक मानदंडों तक पहुंच जाता है।
वहीं हाल के एक अमेरिकी सर्वे में 87% केयरगिवर ने किसी न किसी समय तनाव या चिंता महसूस करने की बात कही, और आधे से ज्यादा ने इसे साप्ताहिक स्तर पर अनुभव किया।
भारत में केयरगिवर बर्नआउट पर बड़े पैमाने के सरकारी आंकड़े सीमित हैं, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों को "कर्तव्य" मानने की सांस्कृतिक प्रवृत्ति के कारण विशेषज्ञ मानते हैं कि कई महिलाएं अपनी थकावट को खुलकर साझा नहीं कर पातीं, जिससे अवसाद, चिंता और भावनात्मक टूटन का खतरा बढ़ सकता है।
पहला कदम है इस बोझ को पहचानना - जब आप लगातार थकान, नींद में खलल, चिड़चिड़ापन या खुद को खोया हुआ महसूस करें, तो यह संकेत हो सकते हैं कि मेंटल लोड भारी हो गया है।
दूसरा, जिम्मेदारियों को साझा करना जरूरी है। शोध बताते हैं कि जब घरेलू और मानसिक जिम्मेदारियों का विभाजन ज्यादा बराबर होता है, तो महिलाओं में तनाव और अवसाद के लक्षण कम होते हैं, और मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है।
तीसरा, परिवार और समाज में इस अदृश्य काम को मान्यता मिलनी चाहिए। लचीले काम के समय, जिम्मेदारियों का बराबर बंटवारा और अदृश्य श्रम की सामाजिक स्वीकृति से तनाव कम हो सकता है।
पत्रिका ने कुछ पुरुषों से भी इसको लेकर बातचीत की। अधिकतर पुरुषों का कहना था कि ऐसा नहीं है कि महिलाओं को घर पर समझा जा नहीं जा रहा है। अब समय के साथ चीजें बदल रही हैं। पुरुष भी किचन में काम करने के लेकर झाड़ू-पोछा लगाने तक में हाथ बंटा रहे हैं। हालांकि, ये संख्या कम हो सकती है। लेकिन, आने वाले समय में परिस्थिति और बदलेगी। एक दिन दोनों मिलकर इस लोड को बराबर कर लेंगे।
मेंटल लोड केवल एक व्यक्ति की कमजोरी नहीं, बल्कि पारिवारिक और सामाजिक संरचना की असंतुलन की निशानी है। भारत सरकार के अपने आंकड़े (टाइम यूज सर्वे 2024) इस असंतुलन की पुष्टि करते हैं। जब हम इसे पहचानते हैं, साझा करते हैं, और जिम्मेदारियों को बराबर बांटते हैं, तब ही यह बोझ हल्का हो सकता है।
Updated on:
07 Aug 2026 05:39 pm
Published on:
07 Aug 2026 05:38 pm
