
मिजोरम में छात्र आंदोलन के चलते भर्ती परीक्षाएं टाल दी गई हैं। (Photo: ChatGpt)
मिजोरम लोक सेवा आयोग ने भर्ती परीक्षाएं अनिश्चितकाल के लिए टाल दी है। आयोग का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में तय कार्यक्रम के मुताबिक परीक्षाएं और इंटरव्यू कराना संभव नहीं है। इसके साथ ही 11 से 14 अगस्त के बीच निर्धारित सभी लिखित परीक्षाओं और व्यक्तिगत साक्षात्कारों को भी आगे बढ़ा दिया गया है। सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति, नियमितीकरण और पुष्टिकरण से जुड़ी विभागीय पदोन्नति समितियों की बैठकें भी फिलहाल टाल दी गई हैं। नई तारीखों का ऐलान स्थिति सामान्य होने के बाद किया जाएगा।
यह मामला सिर्फ परीक्षा टलने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे मिजो जिरलाई पॉल (MZP) का आंदोलन है, जिसने मिजोरम की भर्ती व्यवस्था और आयोग के कामकाज में बदलाव की मांग को लेकर MPSC कार्यालय के बाहर प्रदर्शन शुरू किया है। छात्रों की नाराजगी ने राज्य में सरकारी भर्ती की पारदर्शिता, जवाबदेही और परीक्षा प्रणाली पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है।
रिपोर्टों के मुताबिक MZP के सैकड़ों सदस्य सोमवार (10 अगस्त 2026) से MPSC कार्यालय के बाहर धरना और पिकेटिंग कर रहे हैं, जिससे आयोग के अधिकारियों और कर्मचारियों को कार्यालय में प्रवेश करने में परेशानी हुई। आंदोलन मंगलवार को भी जारी रहा। पुलिस और कुछ प्रदर्शनकारियों के बीच एक संक्षिप्त झड़प भी हुई, जब अधिकारियों ने कार्यालय में प्रवेश करने की कोशिश की, हालांकि प्रदर्शन कुल मिलाकर शांतिपूर्ण रहा। इसके बाद आयोग ने भर्ती से जुड़ी कई गतिविधियों को रोकने का फैसला किया।
आयोग ने स्पष्ट किया कि मौजूदा व्यवधान के कारण कई प्रक्रियाओं को निर्धारित समय पर पूरा करना संभव नहीं है। खासतौर पर विभिन्न विभागों में ग्रुप सी पदों के लिए होने वाली परीक्षाओं पर इसका असर पड़ सकता है, क्योंकि आयोग द्वारा तैयार किए गए प्रश्नपत्रों का वितरण भी मौजूदा हालात में संभव नहीं हो पा रहा है। संबंधित विभागों को आगे के निर्देशों का इंतजार करने को कहा गया है, और जिन विभागों ने MPSC के परीक्षा केंद्रों का इस्तेमाल करने की योजना बनाई थी, उन्हें वैकल्पिक व्यवस्था करने की सलाह दी गई है।
MPSC के फैसले का असर केवल लिखित परीक्षाओं पर नहीं पड़ा है। कई पदों के लिए होने वाले व्यक्तिगत साक्षात्कार भी अनिश्चितकाल के लिए टाल दिए गए हैं। इनमें वित्त विभाग के असिस्टेंट ऑडिट एंड अकाउंट्स ऑफिसर, असिस्टेंट अकाउंट्स ऑफिसर (ट्रेजरी), असिस्टेंट अकाउंट्स ऑफिसर (वर्क्स) जैसे पद शामिल हैं। इसके अलावा सोशल वेलफेयर, वुमेन एंड चाइल्ड डेवलपमेंट डिपार्टमेंट के फील्ड फैसिलिटेटर पद के इंटरव्यू भी स्थगित किए गए हैं। 11 से 14 अगस्त के बीच निर्धारित सभी लिखित परीक्षाओं और व्यक्तिगत साक्षात्कारों को टाल दिया गया है।
आयोग ने साफ किया है कि नई तारीखें फिलहाल तय नहीं की गई हैं। उनका ऐलान मौजूदा परिस्थितियों और स्थिति सामान्य होने के आधार पर किया जाएगा।
मौजूदा आंदोलन के केंद्र में मुख्य रूप से MPSC की वन-टाइम रजिस्ट्रेशन (OTR) व्यवस्था को लेकर विवाद है। MZP की मांग है कि मौजूदा OTR सिस्टम को खत्म कर उसकी जगह जरूरत आधारित, पद-विशिष्ट आवेदन फॉर्म लागू किए जाएं। संगठन का कहना है कि दस्तावेज अपलोड करने को लेकर पर्याप्त और स्पष्ट निर्देश न होने से उम्मीदवारों के बीच भ्रम की स्थिति बनी, जिसके चलते कई आवेदन अधूरे दस्तावेजों के कारण खारिज कर दिए गए। MZP ने यह भी मांग की है कि जिन उम्मीदवारों के आवेदन दस्तावेजों की कमी के कारण रद्द हुए, खासकर वे, जो लिखित परीक्षा पास करने के बाद दस्तावेज सत्यापन के दौरान अयोग्य ठहराए गए, उन्हें दस्तावेज ऑफलाइन जमा करने का एक मौका दिया जाए।
MPSC ने इन मांगों को खारिज कर दिया है। आयोग का कहना है कि OTR व्यवस्था खत्म करने से नई जटिलताएं पैदा होंगी और भर्ती प्रक्रिया की एकरूपता प्रभावित होगी। आयोग के मुताबिक उसने 2025-26 में करीब 50,000 आवेदन प्रोसेस किए और 2026-27 में अब तक 20,000 से अधिक आवेदन संभाले हैं, जिनमें से अनुमानित रूप से करीब 500 उम्मीदवार ही अधूरे दस्तावेज अपलोड या समयसीमा के बाद अपलोड करने की कोशिश से प्रभावित हुए। आयोग के मुताबिक, जिन उम्मीदवारों के आवेदन अधूरे या देर से अपलोड किए गए दस्तावेजों के कारण खारिज हुए, उनमें से कुछ ने गुवाहाटी उच्च न्यायालय की आइजोल बेंच का रुख भी किया है, और मामला अदालत में लंबित रहते मौजूदा प्रक्रिया में बदलाव करना उचित नहीं होगा।
MZP का कहना है कि वह पिछले साल जून से ही उम्मीदवारों को आ रही दिक्कतों को लेकर आयोग के सामने अपनी चिंताएं रखता आ रहा है। संगठन OTR व्यवस्था के सिद्धांत का समर्थन तो करता है, लेकिन उसका कहना है कि मौजूदा सिस्टम पर्याप्त रूप से यूजर-फ्रेंडली नहीं है।
इसके अलावा MZP आयोग में संरचनात्मक सुधार और अतिरिक्त मानव-संसाधन की भी मांग कर रहा है, ताकि आयोग की कार्यक्षमता और विश्वसनीयता मजबूत हो सके। संगठन का आरोप है कि भर्ती प्रक्रियाओं में बार-बार होने वाली प्रशासनिक खामियों ने नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं के भरोसे को कमजोर किया है।
MZP की मौजूदा नाराजगी को केवल OTR विवाद से जोड़कर भी नहीं देखा जा सकता। पिछले कुछ समय में MPSC की कार्यप्रणाली को लेकर छात्रों की ओर से कई और सवाल भी उठते रहे हैं। मई 2026 में MZP ने मिजोरम एनिमल हसबेंड्री एंड वेटरनरी सर्विस (MAH&VS) के जूनियर ग्रेड की भर्ती प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों को लेकर सवाल उठाए थे, और आयोग से पूरी भर्ती प्रक्रिया की समीक्षा तथा जिम्मेदारी तय करने की मांग की थी। इसी तरह मई में संगठन ने मिजोरम इंजीनियरिंग सर्विस एग्जामिनेशन 2025 के परिणाम को लेकर भी सवाल उठाए थे, जिसमें इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग विंग में सात पदों के मुकाबले आठ उम्मीदवारों के चयन का मुद्दा सामने आया था।
MPSC को लेकर छात्रों और आयोग के बीच अविश्वास की कहानी नई नहीं है। 2024 में भी MZP ने आयोग की परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर बड़ा आंदोलन किया था। उस समय संगठन ने MPSC के तत्कालीन चेयरमैन जे.सी. रामथांगा के इस्तीफे की मांग की थी।
विवाद के केंद्र में एक कंबाइंड कॉम्पिटिटिव एग्जामिनेशन के कुछ उत्तरपत्रों में करेक्टिंग फ्लुइड के इस्तेमाल और अंकों में कथित बदलाव के आरोप थे। छात्रों ने सवाल उठाया था कि उत्तर पुस्तिकाओं और टेब्युलेशन शीट्स में अंकों से जुड़ी प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए।
मामला इतना बढ़ा कि राज्य सरकार ने जांच के आदेश दिए। पूर्व मुख्य सचिव और पूर्व MPSC चेयरमैन एम. लालमनजुआला को प्रारंभिक जांच की जिम्मेदारी दी गई। बाद में जांच में परीक्षा संचालन में अनियमितता न मिलने और अंकों में बदलाव न किए जाने की बात सामने आई। मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने भी जांच रिपोर्ट के आधार पर यही कहा था।
लेकिन इस प्रकरण ने एक अहम सवाल छोड़ दिया - प्रतियोगी परीक्षाओं में केवल निष्पक्षता होना पर्याप्त है, या उसकी प्रक्रिया भी अभ्यर्थियों को पूरी तरह पारदर्शी दिखाई देनी चाहिए?
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे सीधा असर उन अभ्यर्थियों पर पड़ेगा जो महीनों से परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। सरकारी भर्ती परीक्षा सिर्फ एक तारीख नहीं होती। उम्मीदवार इसके लिए पाठ्यक्रम पूरा करते हैं, मॉक टेस्ट देते हैं, नौकरी या पढ़ाई के साथ तैयारी करते हैं और परीक्षा केंद्र तक पहुंचने के लिए यात्रा की योजना बनाते हैं।
जब परीक्षा अचानक अनिश्चितकाल के लिए टलती है तो उम्मीदवारों की तैयारी का पूरा टाइमलाइन बिगड़ जाता है। खासतौर पर उन युवाओं के लिए स्थिति ज्यादा कठिन हो सकती है जिनकी उम्र सीमा नजदीक है या जो कई प्रतियोगी परीक्षाओं के बीच अपनी तैयारी का कार्यक्रम बनाकर चल रहे हैं।
हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों में आयोग का तर्क यह है कि परीक्षा को तय कार्यक्रम के मुताबिक आयोजित करना संभव नहीं है। प्रश्नपत्रों के वितरण से लेकर परीक्षा केंद्रों और कर्मचारियों की उपलब्धता तक कई स्तरों पर व्यवधान पैदा हुआ है। ऐसे में परीक्षा कराने की कोशिश से प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर और सवाल उठ सकते हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि MPSC की भर्ती प्रक्रिया दोबारा कब शुरू होगी। आयोग ने कोई निश्चित तारीख नहीं दी है और कहा है कि स्थिति के अनुसार नई परीक्षा और इंटरव्यू तारीखों की घोषणा की जाएगी।आयोग ने अपने ऑनलाइन भर्ती पोर्टल को बेहतर बनाने की दिशा में काम जारी होने की बात भी कही है, साथ ही छात्र संगठन से आंदोलन वापस लेकर कर्मचारियों को कार्यालय में प्रवेश की अनुमति देने की अपील की है।
इस बीच MZP का आंदोलन किस दिशा में जाता है और आयोग तथा छात्रों के बीच संवाद से कोई समाधान निकलता है या नहीं, इस पर नजर रहेगी।
मिजोरम का मौजूदा विवाद एक व्यापक संदेश भी देता है। सरकारी नौकरी की प्रतियोगिता में उम्मीदवारों के लिए परीक्षा सिर्फ रोजगार पाने का माध्यम नहीं होती, बल्कि यह व्यवस्था पर भरोसे की परीक्षा भी होती है। एक परीक्षा का टलना अस्थायी समस्या हो सकती है, लेकिन भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर उठे सवाल लंबे समय तक असर डाल सकते हैं।
MPSC के सामने अब दोहरी चुनौती है - एक तरफ मौजूदा गतिरोध खत्म कर परीक्षाओं को सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से कराना, दूसरी तरफ अभ्यर्थियों के बीच यह भरोसा मजबूत करना कि भर्ती प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध है। आने वाले दिनों में आयोग और छात्र संगठन के बीच बातचीत ही तय करेगी कि यह विवाद केवल परीक्षा स्थगित होने तक सीमित रहता है या मिजोरम की भर्ती व्यवस्था में बड़े बदलाव की शुरुआत करता है।
Updated on:
12 Aug 2026 03:30 pm
Published on:
12 Aug 2026 03:30 pm
