12 अगस्त 2026,

बुधवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

रॉकेट हमेशा पूर्व दिशा में ही क्यों किए जाते हैं लॉन्च? क्या आप जानते हैं पृथ्वी की रफ्तार है फ्री स्पीड बूस्टर!

Rocket Eastward Launch: क्या आपको भी लगता है कि रॉकेट ज्यादातर पूर्व दिशा में ही लॉन्च किए जाते हैं और क्यों? जानिए कैसे पृथ्वी की अपनी घूर्णन गति (1,675 km/h) रॉकेट को फ्री स्पीड बूस्ट देती है? पोलर ऑर्बिट मिशनों में यह फायदा क्यों काम नहीं आता और भारत के PSLV मिशनों से जुड़े उदाहरण जो आपको समझाएंगे रॉकेस लॉन्चिंग साइंस
3 min read
Google source verification

भारत

image

Sanjana Kumar

Aug 12, 2026

Rocket Eastward Launch

Rocket Eastward Launch: क्या आपके दिमाग में भी आता है ये Question? (AI Creative)

Rocket Eastward Launch:जब भी कोई रॉकेट अंतरिक्ष की तरफ उड़ान भरता है, एक बात गौर करने लायक होती है, ज्यादातर रॉकेट पूर्व दिशा की तरफ ही लॉन्च किए जाते हैं। क्या यह कोई परंपरा है, या फिर इसके पीछे कोई ठोस वैज्ञानिक वजह छिपी है? दरअसल साइंटिस्ट के मुताबिक इसका जवाब है पृथ्वी रॉकेट की स्पीड को बूस्ट करने में मदद करती है।

पृथ्वी की अपनी स्पीड

पृथ्वी अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की दिशा में घूमती है। भूमध्य रेखा पर पृथ्वी की सतह की यह घूर्णन गति करीब 465 मीटर प्रति सेकंड, यानी लगभग 1,675 किलोमीटर प्रति घंटा होती है। अब जब कोई रॉकेट लॉन्च पैड पर खड़ा होता है, तो वह भी पृथ्वी के साथ-साथ इसी गति से पहले से ही घूम रहा होता है। भले ही वो स्थिर खड़ा दिखे।

अब अगर रॉकेट को उसी दिशा में यानी पूर्व की तरफ उड़ाया जाए, तो पृथ्वी की यह मौजूदा गति उसकी अपनी स्पीड में जुड़ जाती है। इसे समझने का सबसे आसान तरीका है। किसी घूमते हुए प्लेटफॉर्म पर खड़े होकर उसी दिशा में छलांग लगाना। आपकी छलांग में प्लेटफॉर्म की गति अपने आप शामिल हो जाती है। रॉकेट के साथ भी बिल्कुल यही होता है।

इतनी स्पीड की जरूरत आखिर क्यों?

किसी सैटेलाइट को धरती की कक्षा में स्थिर रखने के लिए सिर्फ ऊंचाई पर पहुंच जाना काफी नहीं है। रॉकेट को इतनी तेज क्षैतिज (horizontal) गति हासिल करनी होती है कि वह पृथ्वी की तरफ गिरते हुए भी लगातार उसकी सतह को 'मिस' करता रहे। इसी को ऑर्बिटल मोशन कहते हैं। पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit) तक पहुंचने के लिए करीब 28,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार चाहिए होती है।

अब जरा कुछ देर सोचिए!

अगर लॉन्च से पहले ही 1,675 km/h की गति मुफ्त में मिल जाए, तो रॉकेट के इंजन पर बोझ कुछ कम हो जाता है। हालांकि यहां एक बात साफ समझनी जरूरी है, यह पूरा हिसाब इतना सीधा नहीं कि 28,000 में से बस 1,675 घटा दिया जाए। असल मिशन में लेटिट्यूड, ऑर्बिट का झुकाव (inclination), ग्रेविटी लॉसेस, एटमॉस्फेरिक ड्रेग जैसी कई चीजें शामिल होती हैं। फिर भी, कम झुकाव वाली कक्षाओं के लिए भूमध्य रेखा के करीब से लॉन्च करना ईंधन बचाने या ज्यादा वजन ऑर्बिट में भेजने में काफी मदद करता है।

श्रीहरिकोटा ही क्यों चुना गया भारत का स्पेसपोर्ट?

भारत का सतीश धवन स्पेस सेंटर, यानी श्रीहरिकोटा, देश के पूर्वी समुद्री तट पर स्थित है। इसकी वजह सिर्फ 'पूर्व में होना' नहीं है। यह भूमध्य रेखा के अपेक्षाकृत करीब है, समुद्र की तरफ एक लंबा और खुला रास्ता (launch corridor) मिलता है और आसपास आबादी भी कम है। इससे रॉकेट का ट्रैजेक्टरी समुद्र की तरफ रखा जा सकता है, जिससे किसी दुर्घटना की स्थिति में आबादी वाले इलाकों को खतरा कम होता है।

क्या हर रॉकेट पूर्व दिशा में ही जाता है?

नहीं, और यही इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ है। रॉकेट किस दिशा में जाएगा, यह पूरी तरह इस बात पर निर्भर करता है कि सैटेलाइट को किस तरह की कक्षा में पहुंचाना है। अगर मिशन कम झुकाव वाली (low-inclination) कक्षा का है, तो पूर्व दिशा का फायदा भरपूर मिलता है। लेकिन अगर सैटेलाइट को पोलर ऑर्बिट यानी उत्तर-दक्षिण दिशा वाली कक्षा में भेजना हो, तो पृथ्वी के घूर्णन का यह 'फ्री राइड' काफी हद तक बेअसर हो जाता है और उतनी ही ऊंचाई तक पहुंचने के लिए ज्यादा ऊर्जा खर्च करनी पड़ सकती है।

भारत के PSLV मिशन इसकी बेहतरीन मिसाल

भारत के PSLV मिशन इसकी बेहतरीन मिसाल हैं। 2017 में PSLV-C37 ने एक साथ 104 सैटेलाइट को करीब 506 किमी की सन-सिंक्रोनस पोलर ऑर्बिट में स्थापित किया, जिसका झुकाव 97.46 डिग्री था। इसी तरह PSLV-C52 ने EOS-04 सैटेलाइट को 529 किमी की सन-सिंक्रोनस पोलर ऑर्बिट में पहुंचाया। दूसरी तरफ, PSLV-C30 ने AstroSat को महज 6 डिग्री झुकाव वाली 650 किमी ऑर्बिट में भेजा। यहां पूर्व दिशा का पूरा फायदा उठाया गया।

दिशा तय कौन करता है, फिजिक्स या सुरक्षा?

इसका जवाब है, दोनों। दरअसल लॉन्च ट्रैजेक्टरी सिर्फ इस आधार पर तय नहीं होती कि किस दिशा में सबसे ज्यादा एनर्जी बचेगी। यह भी देखा जाता है कि अगर रॉकेट में कोई खराबी आए, तो उसका मलबा कहां गिर सकता है और रास्ता किसी आबादी वाले इलाके के ऊपर से तो नहीं गुजर रहा।

दिलचस्प बात यह भी है कि पृथ्वी की गति का फायदा सिर्फ लॉन्च तक सीमित नहीं है। पृथ्वी खुद सूरज की परिक्रमा करीब 1,07,000 किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा की औसत रफ्तार से करती है और इंटरप्लेनेटरी मिशनों में सही समय पर लॉन्च करके इस गति का भी फायदा उठाया जाता है।

तो 'रॉकेट हमेशा पूर्व दिशा में लॉन्च होते हैं', यह बात पूरी तरह सही नहीं है। असली सच यह है कि पृथ्वी की अपनी घूर्णन गति की वजह से पूर्व दिशा में लॉन्च करना कई मिशनों के लिए ऊर्जा बचाने का एक स्मार्ट तरीका है। खासकर तब जब, सैटेलाइट को कम झुकाव वाली कक्षा में भेजना हो। लेकिन असल दिशा हमेशा सैटेलाइट की मंजिल, पृथ्वी का घूर्णन और नीचे मौजूद लोगों की सुरक्षा, इन तीनों को मिलाकर ही तय की जाती है।