
monsoon heat stress india: अब बारिश में भई सतागी गर्मी, लगातार बढ़ रहा हीट स्ट्रेस (AI Creative)
Monsoon heat stress: बारिश की पहली बूंदें पड़ते ही आमतौर पर हमें गर्मी से राहत महसूस होती है। तापमान थोड़ा कम होता है और मौसम सुहाना लगने लगता है। लेकिन एक नई वैज्ञानिक रिसर्च कहती है कि आने वाले सालों में यह राहत गायब हो सकती है और भारत का मानसून भी शरीर के लिए उतना ही खतरनाक बन सकता है जितनी गर्मियां।
यह रिसर्च IIT गांधीनगर के नेतृत्व में, अमेरिका की Stanford और Purdue यूनिवर्सिटीज के साथ मिलकर की गई है। 4 जून 2026 को प्रतिष्ठित जर्नल 'AGU Advances' में प्रकाशित भी हुई है। इसे दीपेश सिंह चुफल, क्विंकिन कॉन्ग, मैथ्यू हबर, विमल मिश्रा ने मिलकर लिखा है।
इस रिसर्च को समझने के लिए पहले एक आसान बात समझनी होगी कि, हमारा शरीर खुद को ठंडा रखने के लिए पसीना निकालता है। जब यह पसीना त्वचा से भाप बनकर उड़ता है, तभी शरीर से गर्मी बाहर निकलती है। लेकिन अगर हवा में नमी (humidity) बहुत ज्यादा हो, तो पसीना ठीक से सूख नहीं पाता, और शरीर की यह नैचुरल कूलिंग सिस्टम फेल होने लगती है।
यानी बाहर का तापमान बहुत ज्यादा न भी हो, फिर भी गर्मी और ज्यादा नमी मिलकर शरीर पर भारी दबाव डाल सकती हैं। इसी स्थिति को वैज्ञानिक भाषा में अनकंपेनसेबल हीट स्ट्रेस (UHS) कहा जाता है। यानी वह हालत जब शरीर अपने अंदर की गर्मी को बाहर नहीं निकाल पाता।
ध्यान देना होगा कि यह 'हीटवेव' से अलग होती है। हीटवेव सिर्फ असामान्य रूप से ज्यादा तापमान को कहते हैं। लेकिन UHS का सवाल यह है कि क्या इंसान का शरीर उस मौसम में खुद को संभाल पा रहा है या नहीं। भले ही मौसम विभाग की कोई हीटवेव वॉर्निंग जारी न हुई हो।
शोधकर्ताओं ने 1979 से 2021 तक के मौसम डेटा का गहराई से अध्ययन किया और फिर अलग-अलग भविष्य के तापमान परिदृश्यों (warming scenarios) के आधार पर अनुमान लगाया।
लेकिन अगर धरती का तापमान 2 डिग्री सेल्शियस तक बढ़ जाए (यह प्री-इंडस्ट्रियल यानी औद्योगीकरण-पूर्व दौर के मुकाबले नापा जाता है), तो तस्वीर बिल्कुल बदल सकती है-
एक जरूरी बात समझनी होगी कि, यह 53% वाला आंकड़ा आज के भारत की स्थिति नहीं है, बल्कि यह भविष्य में 2 डिग्री सेल्शियस तापमान बढ़ने पर होने वाले हालात का अनुमान है। इसे 'अभी मानसून में आधा भारत खतरे में है' समझना गलत होगा।
यह स्टडी सिर्फ भविष्य की भविष्यवाणी नहीं है। 1979 से 2021 के बीच के असली डेटा में भी भारत में UHS की घटनाएं और उनका फैलाव लगातार बढ़ता हुआ पाया गया। रिसर्च में यह भी सामने आया कि गर्मियों में होने वाली UHS का सीधा संबंध भारत में गर्मी से जुड़ी मौतों से है। हालांकि यह एक सांख्यिकीय संबंध (statistical association) है, इसका मतलब यह नहीं कि हर मौत सीधे इसी वजह से हुई।
अभी सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों में शामिल हैं:
जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा, यह दायरा और बड़ा होता जाएगा। रिसर्चर्स के मुताबिक कुछ ऐसे इलाके जो अभी 2 डिग्री सेल्शियस पर कम प्रभावित रहेंगे, वे 3 डिग्री और 4 डिग्री सेल्शियस तापमान बढ़ने पर खतरे की जद में आ सकते हैं। इनमें पूर्वोत्तर भारत, गुजरात और राजस्थान के कुछ हिस्से शामिल हैं।
अगर मानसून में भी लगातार यह हीट स्ट्रेस बढ़ता रहा, तो इसका असर सिर्फ बीमारी तक सीमित नहीं रहेगा। रिसर्चर्स ने तीन बड़े क्षेत्रों पर असर बताया है:
भारत में मानसून को हमेशा गर्मी के बाद राहत का मौसम माना गया है। लेकिन यह रिसर्च कहती है कि अब सिर्फ तापमान का आंकड़ा देखना काफी नहीं। असली सवाल यह होना चाहिए कि तापमान के साथ ही हवा की नमी औरप शरीर उस मौसम में खुद को ठंडा रख पा रहा है या नहीं?
रिसर्चर्स के मुताबिक अगर तापमान 4 डिग्री सेल्शियस तक बढ़ जाता है, तो UHS की घटनाएं मौजूदा हालात के मुकाबले काफी ज्यादा बढ़ सकती हैं, हालांकि इसका सटीक आंकड़ा ओरिजिनल रिसर्च पेपर देखकर ही पूरी तरह पुष्ट किया जा सकता है।
कहना होगा कि मानसून का मतलब अब हमेशा यह नहीं होगा कि गर्मी खत्म हो गई। जलवायु परिवर्तन के साथ भारत में गर्मी के खतरे को सिर्फ थर्मामीटर की रीडिंग से समझना काफी नहीं रहेगा, आने वाले सालों में हवा की नमी और इंसानी शरीर की सीमाएं यह तय करने में उतनी ही अहम होंगी कि कोई मौसम हमारे लिए कितना सुरक्षित है।
बता दें कि यह रिसर्च डराने के लिए नहीं है, बल्कि सचेत करने के लिए है, आज जिस हीट स्ट्रेस को हम सिर्फ गर्मियों की समस्या मानते हैं, वह आने वाले दशकों में मानसून की भी एक बड़ी सेहत चुनौती बन सकता है।
Updated on:
10 Aug 2026 03:36 pm
Published on:
10 Aug 2026 03:36 pm
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