
Sundarbans Microplastics carbon cycle: AI Creative
Sundarbans microplastic carbon cycle: प्लास्टिक को हम आमतौर पर एक ऐसे कचरे के रूप में देखते हैं जो समुद्र में जमा होता जाता है। लेकिन सुंदरबन से आई नई रिसर्च ने इसकी एक और परत सामने रखी है। भारत के सुंदरबन मैंग्रोव क्षेत्र में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक्स सिर्फ पानी में तैरते नहीं दिखते। इनके टूटने और वेदरिंग के दौरान प्लास्टिक से जुड़ा कार्बन पानी और वहां मौजूद माइक्रोबियल कम्युनिटी के कार्बन साइकल में शामिल हो सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि सुंदरबन का पूरा कार्बन सिंक खत्म हो रहा है, लेकिन वैज्ञानिकों के सामने एक नया सवाल जरूर खड़ा हो गया है कि क्या हम ब्लू कार्बन की वास्तविक तस्वीर को अधूरा समझ रहे हैं?
यह रिसर्च 2026 में जर्नल ऑफ हैजर्डस मैटेरियल्स एडवांसेज (वॉल्यूम 22) में प्रकाशित हुई है। नीरुपमा साइनी, अनवेशा घोष और पुण्यश्लोक भद्रा (आईआईएसईआर कोलकाता) ने यह शोध किया है।
यहां प्लास्टिक खाने को इंसानी अर्थ में नहीं समझना चाहिए। कुछ सूक्ष्मजीव एंजाइम्स की मदद से प्लास्टिक पॉलिमर्स से निकलने वाले कंपाउंड्स को तोड़ सकते हैं, जिससे प्लास्टिक से जुड़ा कार्बन का कुछ हिस्सा डिज़ॉल्व्ड ऑर्गेनिक कंपाउंड्स में बदल सकता है, जिन्हें माइक्रोब्स इस्तेमाल कर सकें। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि माइक्रोब्स समुद्र में पड़ा सारा प्लास्टिक खत्म कर सकते हैं।
रिसर्चर्स ने सुंदरबन के मूरीगंगा एस्चुअरी के सरफेस वाटर को अक्टूबर 2021 से अक्टूबर 2022 तक सैंपल किया। माइक्रोप्लास्टिक अबंडेंस 4.66 से 58.33 पार्टिकल्स प्रति लीटर तक पाई गई, और मानसून के दौरान यह अबंडेंस प्री-मानसून की तुलना में करीब 1.4 गुना ज्यादा रही। इसे ज्यादा रेनफॉल और सरफेस रनऑफ से जोड़ा गया, जिसके जरिए पुराने वेदरड प्लास्टिक फ्रैगमेंट्स एस्चुअरी तक पहुंच सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण खोज रही माइक्रोप्लास्टिक्स से जुड़े 'प्लास्टिक पार्टिकुलेट ऑर्गेनिक कार्बन (pPOC)की औसत कॉन्सन्ट्रेशन, जो लगभग 41.63 ± 72.22 माइक्रोग्राम प्रति लीटर पाई गई।
नेचर इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, डिजॉल्व्ड प्लास्टिक-डिराइव्ड कार्बन एक्वेटिक ऑर्गेनिक कार्बन पूल में लगभग 1% योगदान कर सकता है। यह आंकड़ा भले छोटा लगे, लेकिन स्टडी के लीड ऑथर पुण्यश्लोक भद्रा के मुताबिक अगर यह लंबे समय तक बना रहे तो इसका असर बड़ा हो सकता है।
सुंदरबन दुनिया के सबसे बड़े मैंग्रोव इकोसिस्टम्स में से एक है और एक महत्वपूर्ण ब्लू कार्बन इकोसिस्टम है। यानी यह वायुमंडल से कार्बन कैप्चर करके उसे लंबे समय तक स्टोर कर सकता है। अब रिसर्चर्स को इस सिस्टम में एक नया कार्बन सोर्स दिखाई दे रहा है, प्लास्टिक।
लेकिन अभी उपलब्ध रिसर्च यह साबित नहीं करती कि माइक्रोप्लास्टिक्स के कारण सुंदरबन का कार्बन सिंक निश्चित रूप से कमजोर हो गया है। यह सिर्फ इतना दिखाती है कि प्लास्टिक-डिराइव्ड कार्बन आसपास के माइक्रोबियल और कार्बन प्रोसेसेज़ के साथ इंटरैक्ट कर रहा है, जिससे रीजनल कार्बन बजट को प्रभावित करने की क्षमता है।
स्टडी में 12 अलग-अलग पॉलिमर टाइप्स की पहचान हुई, जिनमें पॉलीप्रोपिलीन (35.7%), पीईटी (19.7%) और पॉलीएथिलीन (11.4%) प्रमुख थे। सबसे ज्यादा मॉर्फोलॉजिकल फॉर्म फाइबर्स का रहा (करीब आधा हिस्सा), जिसका संबंध सिंथेटिक टेक्सटाइल्स जैसे स्रोतों से हो सकता है।
नेचर इंडिया ने एक इंडिपेंडेंट एक्सपर्ट के हवाले से बताया कि स्टडी ने अभी सीधे तौर पर डिजॉल्व्ड कार्बन रिलीज, माइक्रोबियल एसिमिलेशन, या मैंग्रोव सेडिमेंट में कार्बन बरियल को मेजर नहीं किया है। यानी यह कार्बन माइक्रोब्स के बायोमास में गया, CO₂ में बदला, सेडिमेंट में जमा हुआ, या फूड वेब में आगे गया। यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
एक अलग 2025 IISER कोलकाता स्टडी (FEMS Microbiology Letters) में यह भी पाया गया कि प्लास्टिक-डिग्रेडिंग एंजाइम्स रखने वाली माइक्रोबियल कम्युनिटीज में एंटीबायोटिक और मेटल रेजिस्टेंस जीन्स भी मौजूद हो सकते हैं। इसलिए भविष्य में प्लास्टिक बायोरेमेडिएशन के लिए इन माइक्रोब्स के इस्तेमाल से पहले बायोसेफ्टी समझना जरूरी होगा।
यह रिसर्च प्लास्टिक पॉल्यूशन को देखने का एक नया नजरिया देती है। माइक्रोप्लास्टिक्स अब सिर्फ कचरा नहीं, बल्कि सुंदरबन के कार्बन साइकल का हिस्सा बनते दिख रहे हैं। लेकिन यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि इससे ब्लू-कार्बन सिस्टम कमजोर हो गया है। असल सवाल यह है कि यह इंसान-निर्मित कार्बन आखिर जाता कहां है और इसका जवाब आने वाले रिसर्च में मिल सकता है।
Updated on:
10 Aug 2026 02:44 pm
Published on:
10 Aug 2026 02:44 pm
