
Nana Patekar: अभिनेता नाना पाटेकर का निधन(AI Creative)
Nana Patekar: 'यह मुसलमान का खून है, यह हिंदू का खून है… मिला। अब बता, इसमें मुसलमान का कौन-सा और हिंदू का कौन-सा?' कुछ सवाल पूछे परदे पर जाते हैं, पर जवाब हमारे जमीर से मांगते हैं। 1994 में फिल्म 'क्रांतिवीर' में नाना पाटेकर ने यह सवाल पूछा था। तीन दशक से ज्यादा बीत गए, फिल्म पुरानी पड़ गई, पर सवाल आज भी जस का तस खड़ा है। जवाब भी उतना ही सीधा है कोई फर्क नहीं। आज जब नाना पाटेकर की निधन की खबर सुनी तो यही डायलॉग याद आया। चीख-चीख कर हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश देने वाला एक जानदार, दमदार अभिनेता हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनके मशहूर डायलॉग का यह संदेश आज भी आईना दिखाता है।
क्रांतिवीर को मेहुल कुमार ने बनाया था। इसमें नाना ने ऐसे आदमी का किरदार निभाया, जो अपने आसपास की नफरत देखकर चुप नहीं रहता, गरजता है। यह संवाद उसी गरज का नतीजा था। इसी भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का सम्मान भी मिला। पर असली पुरस्कार यह रहा कि लोग इस संवाद को फिल्म से निकालकर अपनी बातचीत में ले आए। जब भी बहस मजहब पर अटकती है, यही पंक्ति याद आ जाती है।
नाना की आवाज में यह खरापन यूं ही नहीं आया। उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में हुआ। असली नाम विश्वनाथ पाटेकर है। उन्होंने मुंबई के जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट में पढ़ाई की और रंगमंच से होते हुए फिल्मों तक पहुंचे। जो इंसान संघर्ष की गलियों से गुजरा हो, वह जानता है कि भूख, बीमारी और आंसू किसी का धर्म पूछकर नहीं आते। शायद इसीलिए उनके संवाद रटे हुए नहीं, जिए हुए लगते हैं।
नाना का यह विचार सिर्फ स्क्रिप्ट तक सीमित नहीं रहा। मार्च 2022 में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि यह देश हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों का है, और अगर दोनों समुदायों के बीच विभाजन हो रहा है तो यह ठीक नहीं। उस वक्त 'द कश्मीर फाइल्स' को लेकर देशभर में तीखी बहस चल रही थी। ऐसे माहौल में साथ रहने की बात कहना आसान नहीं होता, पर नाना ने कही।
सबसे दिल को छूने वाला किस्सा उनके घर का है। एक मराठी अखबार में प्रकाशित उनके इंटरव्यू के मुताबिक, नाना ने बचपन में अपनी मां से पूछा था कि हिंदू और मुसलमान में क्या फर्क है? मां ने न कोई भाषण दिया, न कोई दलील। बस इतना कहा कि नमस्कार हम भी करते हैं, वे भी करते हैं, बस तरीका अलग है।
इस एक वाक्य में वह पूरी समझ है, जो हम बड़े होकर किताबों और बहसों में ढूंढते रह जाते हैं। फर्क तरीके का है, भावना का नहीं। सिर झुकाने का ढंग अलग हो सकता है, झुके हुए सिर की नीयत एक ही होती है।
नाना की पहचान सिर्फ अभिनेता की नहीं रही। 2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ 'नाम फाउंडेशन' शुरू किया, जो महाराष्ट्र के सूखा-पीड़ित किसान परिवारों की मदद के लिए जाना जाता है। यहां भी वही सोच दिखती है। दर्द का कोई धर्म नहीं होता, इसलिए मदद करने वाले हाथ का भी कोई धर्म नहीं होना चाहिए।
अगर नाना की यात्रा को एक लकीर में खींचें, तो वह सीधी निकलती है। परदे पर 'क्रांतिवीर' का संवाद, मंच पर 2022 का बयान, घर में मां की सीख। तीनों जगह बात एक ही है। यह एकता कोई नारा नहीं, एक सहज समझ है।
आज जब सोशल मीडिया पर हर दूसरी पोस्ट हमें बांटने पर आमादा दिखती है, तब यह समझ और कीमती हो जाती है। इसे बचाने के लिए किसी बड़े आंदोलन की जरूरत नहीं। यह तब बचती है, जब हम पड़ोसी की ईद की सेवइयां उसी प्यार से खाएं, जिस प्यार से वह हमारी दिवाली की मिठाई खाता है। यह तब बचती है, जब दफ्तर की चाय पर हम किसी का नाम नहीं, उसका काम देखें।
कहना होगा कि, नाना ने तो अपना सवाल पूछ लिया है, अब जवाब देने की बारी हमारी है। खून मिल चुका है, अब दिलों को मिलाना बाकी है।
Updated on:
08 Oct 2026 09:37 am
Published on:
08 Oct 2026 09:37 am
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