
सांकेतिक इमेजः Gemini
बच्चों की परवरिश में माता-पिता की भूमिका सिर्फ उनकी जरूरतें पूरी करने और सही-गलत समझाने तक सीमित नहीं होती। बच्चे को ऐसा भरोसेमंद साथी भी चाहिए, जिसके सामने वह बिना डरे अपनी बात कह सके। कई बार बच्चे स्कूल, दोस्तों या अपनी भावनाओं से जुड़ी बातें माता-पिता को बताने से हिचकिचाते हैं। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि उन्हें लगता है कि उनकी बात सुनने के बजाय उन्हें डांट या सलाह मिलेगी।
ऐसे में माता-पिता और बच्चों के बीच दोस्ताना रिश्ता बनाना जरूरी है। इसका मतलब यह नहीं कि माता-पिता अपनी जिम्मेदारियां या अनुशासन छोड़ दें। बल्कि बच्चे को प्यार, सम्मान और भरोसा देते हुए उसके साथ ऐसा रिश्ता बनाएं, जिसमें वह अपनी खुशियां और परेशानियां खुल कर साझा कर सके।
बच्चे से दोस्ताना रिश्ता बनाने का पहला कदम उसकी बात सुनना है। जब वह स्कूल, दोस्तों या अपनी किसी परेशानी के बारे में बताता है, तो बीच में टोकने या तुरंत फैसला सुनाने से बचें। मोबाइल और टीवी से ध्यान हटाकर उसकी बात सुनें।
कई बार बच्चे को किसी समस्या का समाधान नहीं, बल्कि यह एहसास चाहिए होता है कि कोई उसकी बात समझ रहा है। उसकी भावनाओं को महत्व देने से वह आगे भी आपसे बातें साझा करने में सहज महसूस कर सकता है।
अगर बच्चा कोई गलती करता है, तो तुरंत गुस्सा करने के बजाय उसे समझने की कोशिश करें। गलती पर बात जरूर करें, लेकिन बच्चे को बुरा या नाकाबिल कहने से बचें।
उदाहरण के लिए, अगर उसने होमवर्क पूरा नहीं किया है, तो उसे आलसी कहने के बजाय पूछें कि काम पूरा करने में क्या परेशानी आई। इससे बच्चा अपनी गलती स्वीकार करना और उसे सुधारना सीख सकता है।
व्यस्त दिनचर्या में माता-पिता कई बार बच्चों के साथ समय बिताने के लिए पर्याप्त वक्त नहीं निकाल पाते। लेकिन मजबूत रिश्ते के लिए बहुत लंबा समय जरूरी नहीं है। रोज कुछ मिनट बिना किसी दूसरी व्यस्तता के बच्चे के साथ बिताएं।
उससे दिनभर की बातें पूछें, साथ बैठकर खेलें या टहलने जाएं। नियमित बातचीत से बच्चे को यह महसूस होता है कि वह परिवार के लिए महत्वपूर्ण है।
दोस्ती का रिश्ता केवल गंभीर बातचीत से नहीं बनता। बच्चों के साथ खेलना, उनकी पसंद की गतिविधियों में शामिल होना और छोटी-छोटी शरारतों में उनका साथ देना भी जरूरी है।
बच्चे की उम्र के अनुसार बोर्ड गेम, पजल, आउटडोर गेम या कोई रचनात्मक गतिविधि चुन सकते हैं। खेलते समय हर बार जीतने या नियम सिखाने पर ध्यान देने के बजाय साथ में अच्छा समय बिताएं।
बच्चे भी गुस्सा, दुख, डर, जलन और निराशा जैसी भावनाओं से गुजरते हैं। कई बार वे खुद भी नहीं समझ पाते कि उन्हें कैसा महसूस हो रहा है।
ऐसे समय में उनकी भावनाओं को छोटा न समझें। अगर बच्चा किसी दोस्त से झगड़े के कारण दुखी है, तो यह न कहें कि इतनी छोटी बात पर परेशान क्यों हो रहे हो। उसकी बात सुनें और उसे अपनी भावना शब्दों में बताने में मदद करें।
माता-पिता बच्चों के साथ अपने बचपन के अनुभव और छोटी-छोटी कहानियां साझा कर सकते हैं। उन्हें बताएं कि आप भी कभी परीक्षा से घबराए थे, किसी गलती से सीखा था या किसी मुश्किल परिस्थिति का सामना किया था।
इससे बच्चों को समझ आता है कि गलतियां करना या किसी बात से डरना असामान्य नहीं है। हालांकि, अपनी बातें साझा करते समय बच्चे की उम्र और समझ का ध्यान रखना जरूरी है।
हर बच्चे की पसंद अलग होती है। किसी को चित्र बनाना अच्छा लगता है, किसी को खेलना तो किसी को संगीत या किताबें पसंद होती हैं।
बच्चे की रुचियों को समझें और उन्हें आगे बढ़ाने में मदद करें। जरूरी नहीं कि उसकी हर पसंद आपकी पसंद से मेल खाए। जब माता-पिता बच्चे की रुचियों का सम्मान करते हैं, तो उसके अंदर आत्मविश्वास बढ़ने में मदद मिलती है।
घर से जुड़ी कुछ छोटी बातों में बच्चे की राय पूछें। जैसे छुट्टी के दिन कहां जाना है, कौन सा खेल खेलना है या कमरे की सजावट कैसी होनी चाहिए।
इससे बच्चे को लगता है कि उसकी बात और पसंद भी मायने रखती है। उम्र के अनुसार उसे फैसले लेने के छोटे-छोटे मौके दें, ताकि वह जिम्मेदारी समझना सीख सके।
माता-पिता भी कभी-कभी गुस्से में गलत बोल सकते हैं या बच्चे की बात समझने में चूक कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में अपनी गलती स्वीकार करने से पीछे न हटें।
अगर आपने बच्चे को बिना वजह डांट दिया है, तो उससे माफी मांगें और अपनी बात समझाएं। इससे बच्चा सीखता है कि गलती मानना कमजोरी नहीं है। साथ ही, रिश्ते में भरोसा और सम्मान बढ़ता है।
बच्चे के दोस्त बनने का मतलब यह नहीं कि माता-पिता हर बात मान लें या अनुशासन खत्म कर दें। बच्चों को सुरक्षित रखने और जिम्मेदार बनाने के लिए कुछ नियम जरूरी हैं।
मोबाइल इस्तेमाल करने का समय, पढ़ाई, सोने का समय और घर के व्यवहार से जुड़े नियम तय करें। इन नियमों के पीछे की वजह भी बच्चे को समझाएं। उसकी उम्र और जरूरत के अनुसार नियमों में बदलाव की गुंजाइश रखें।
माता-पिता और बच्चों के बीच दोस्ती जैसा रिश्ता भरोसे, बातचीत और सम्मान से बनता है। बच्चे को यह भरोसा होना चाहिए कि वह अपनी परेशानी बताएगा तो उसकी बात सुनी जाएगी। वहीं माता-पिता को भी प्यार के साथ सही मार्गदर्शन और जरूरी सीमाएं बनाए रखनी चाहिए।
याद रखें, बच्चे को ऐसा माहौल देना जरूरी है जहां वह अपनी बात कहने से डरे नहीं। जब घर में बातचीत के लिए जगह होती है, तो बच्चे अपनी खुशियां, गलतियां और परेशानियां माता-पिता के साथ साझा करने में अधिक सहज महसूस कर सकते हैं।
Updated on:
1 Nov 2026, 6:54 PM IST
Published on:
1 Nov 2026, 6:54 PM IST
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