
बच्चों के पोषण पर संकट! (Photo: ChatGpt)
गुजरात के वडोदरा में भुगतान और बिलों को लेकर पैदा हुए विवाद का सीधा असर उन बच्चों पर पड़ा है, जिनके पोषण के लिए आंगनवाड़ी केंद्रों पर रोजाना दूध पहुंचाया जाता है। शहर की करीब 400 आंगनवाड़ियों में 5,500 बच्चों को 17 सितंबर से दूध के पाउच नहीं मिल रहे हैं। अमूल की ओर से दूध की सप्लाई रोके जाने के बाद करीब एक सप्ताह से बच्चों के रोजाना मिलने वाले पोषण में यह रुकावट बनी हुई है।
यह मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि इन आंगनवाड़ियों में छह महीने से छह साल तक की उम्र के बच्चों को सप्ताह में पांच दिन 100 मिलीलीटर दूध दिया जाता है। वडोदरा नगर निगम के अंतर्गत आने वाली 400 आंगनवाड़ियों के लिए रोजाना करीब 5,500 पाउच की जरूरत होती है। यह व्यवस्था गुजरात सरकार की ‘दूध संजीवनी योजना’ के तहत चलती है, जिसमें अमूल स्थानीय निकायों को दूध उपलब्ध कराता है।
दूध की सप्लाई 17 सितंबर को बंद हुई। इसके पीछे अमूल और संबंधित सरकारी विभाग के बीच भुगतान को लेकर पैदा हुआ विवाद बताया जा रहा है। हालांकि, इस विवाद की वजह को लेकर सरकारी अधिकारियों के बयान एक जैसे नहीं हैं।
वडोदरा की जिला कार्यक्रम अधिकारी (ICDS) हीरल ठाकोर के मुताबिक, दूध की कीमत बढ़ने के कारण अमूल के पास जमा तीन महीने का क्रेडिट बैलेंस समाप्त हो गया था। उनके अनुसार, 2025 में एक दूध पाउच की कीमत 9 रुपये से बढ़कर 11.25 रुपये हो गई थी और जुलाई के आसपास पहले से जमा क्रेडिट राशि खत्म हो गई।
इसके बाद भुगतान की प्रक्रिया को लेकर समस्या बढ़ी। ठाकोर का कहना है कि विभाग को अमूल के बिल समय पर नहीं मिल रहे थे, जिससे भुगतान प्रक्रिया प्रभावित हुई। उनके अनुसार, 21 अगस्त को जो आखिरी भुगतान किया गया, वह जून महीने का था और इसका कारण जून का बिल देर से मिलना था।
ICDS अधिकारी के मुताबिक, जुलाई का बिल भी कई बार याद दिलाने के बाद 3 सितंबर को मिला। बिल मिलने के बाद उसे भुगतान की प्रक्रिया के लिए भेज दिया गया, लेकिन सरकारी विभाग में भुगतान को मंजूरी मिलने में समय लगता है। इसी बीच अमूल ने दूध की सप्लाई रोक दी।
ठाकोर ने कहा कि विभाग ने अमूल से हर महीने की 10 तारीख तक संबंधित महीने का बिल जमा करने को कहा है, ताकि भुगतान का चक्र प्रभावित न हो। लेकिन उनके अनुसार 23 सितंबर तक अगस्त का बिल भी विभाग को प्राप्त नहीं हुआ था।
अमूल के ICDS कार्यक्रम के वडोदरा शहर के समन्वयक से इन आरोपों पर प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी। इसलिए बिल देर से जमा होने के विभागीय दावे की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
दूसरी ओर, वडोदरा नगर निगम का लेखा विभाग बिलों में देरी के आरोप से अनभिज्ञता जताता है। VMC के मुख्य लेखाधिकारी संतोष तिवारी ने कहा कि नगर निगम को इस तरह की देरी की कोई जानकारी नहीं है और बिल मिलने के बाद उनका नियमित रूप से भुगतान किया जाता है।
तिवारी के अनुसार, आखिरी भुगतान 21 अगस्त को किया गया था। उन्होंने कहा कि जून और जुलाई के भुगतान भी किए गए हैं। उनके मुताबिक, निगम को यह जानकारी नहीं है कि बिल जमा करने में कहीं देरी हुई थी या नहीं, लेकिन बिल प्राप्त होते ही उनका भुगतान किया जाता है।
नगर निगम के मुताबिक, बिल को ऑडिट विभाग से मंजूरी मिलने में सामान्य तौर पर पांच से छह दिन लगते हैं। जरूरी मंजूरी मिलने के बाद लंबित भुगतान को प्राथमिकता दी जाती है। तिवारी ने यह भी कहा कि यदि किसी भुगतान को तत्काल कराने की जरूरत बताई जाए तो ऑडिट प्रक्रिया को तेज किया जा सकता है।
उनके अनुसार, दूध के भुगतान को लेकर न तो संबंधित विभाग और न ही सप्लायर ने निगम को किसी तत्काल भुगतान की आवश्यकता के बारे में सूचित किया था।
इस पूरे विवाद के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि प्रशासनिक और भुगतान संबंधी प्रक्रिया का असर बच्चों के पोषण पर क्यों पड़ रहा है। दूध वितरण व्यवस्था के तहत छह महीने से छह साल तक के बच्चों को सप्ताह में पांच दिन 100 मिलीलीटर दूध दिया जाता है। यानी 400 आंगनवाड़ियों में रोजाना हजारों बच्चों तक पहुंचने वाला यह छोटा-सा दूध का पाउच उनके नियमित पोषण कार्यक्रम का हिस्सा है। वडोदरा में यह व्यवस्था 2012 से चल रही है। ICDS अधिकारी के अनुसार, शुरुआत में अमूल के पास तीन महीने की क्रेडिट राशि जमा कराई गई थी। लेकिन दूध की कीमत बढ़ने के साथ वह क्रेडिट व्यवस्था पर्याप्त नहीं रही और अंततः जुलाई में उसका बैलेंस समाप्त हो गया।
इस घटनाक्रम में विभाग और नगर निगम के बयान अलग-अलग तस्वीर पेश करते हैं। ICDS का कहना है कि बिल देर से मिलने से भुगतान चक्र प्रभावित हुआ, जबकि नगर निगम कहता है कि बिल मिलने पर भुगतान नियमित रूप से किया जाता है। इस अंतर के बीच एक तथ्य निर्विवाद रूप से सामने है- 17 सितंबर से वडोदरा की 400 आंगनवाड़ियों में करीब 5,500 बच्चों को मिलने वाला दूध बाधित है।
यह मामला केवल एक भुगतान विवाद का नहीं रह जाता, क्योंकि सरकारी पोषण योजनाओं में सप्लाई की निरंतरता सीधे बच्चों तक पहुंचने वाली सेवा से जुड़ी होती है। बिल, ऑडिट और भुगतान की प्रशासनिक प्रक्रिया अपनी जगह जरूरी है, लेकिन इनके बीच तालमेल नहीं होने पर उसका असर लाभार्थियों पर पड़ता है।
अब निगाह इस बात पर है कि अमूल और प्रशासन के बीच भुगतान संबंधी गतिरोध कब दूर होता है और 400 आंगनवाड़ियों में दूध की नियमित सप्लाई कब बहाल होती है। साथ ही, यह घटना इस सवाल को भी सामने लाती है कि ऐसी पोषण योजनाओं में भुगतान और सप्लाई के बीच ऐसा कौन-सा तंत्र हो, जिससे बिलों के विवाद या प्रशासनिक देरी का खामियाजा बच्चों को न भुगतना पड़े।
Updated on:
24 Sept 2026 01:42 pm
Published on:
24 Sept 2026 01:33 pm
Copyright © 2026 Patrika Group. All Rights Reserved.
