
Pingali Venkayya: भारत को तिरंगा देने वाले नायक की कहानी। (फोटोः एआई)
Pingali Venkayya Birth Anniversary: जब भी राष्ट्रीय पर्व आता है, पूरा देश गर्व से तिरंगा लहराता है। स्कूलों से लेकर सरकारी कार्यालयों और घरों तक हर जगह तिरंगा भारत की पहचान बनकर दिखाई देता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस तिरंगे की मूल रूपरेखा किसने तैयार की थी? बहुत से लोग इसका जवाब नहीं जानते। 2 अगस्त को मनाई जाने वाली पिंगली वेंकैया जयंती उसी व्यक्ति को याद करने का अवसर है, जिसने भारत की राष्ट्रीय पहचान को आकार देने में अहम भूमिका निभाई। पिंगली वेंकैया का नाम इतिहास की किताबों में जरूर मिलता है, लेकिन जितना सम्मान उनके योगदान को मिलना चाहिए था, उतनी चर्चा आज भी नहीं होती। यही कारण है कि उन्हें अक्सर "तिरंगे के गुमनाम नायक" के रूप में याद किया जाता है।
पिंगली वेंकैया का जन्म 2 अगस्त 1876 को वर्तमान आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के भाटलापेनुमर्रु गांव में हुआ था। बचपन से ही उन्हें पढ़ाई, विज्ञान और नई चीजों को समझने में रुचि थी। उन्होंने अलग-अलग विषयों का अध्ययन किया और कई भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया।
कम उम्र में उन्होंने ब्रिटिश भारतीय सेना में भी सेवा की। दक्षिण अफ्रीका में तैनाती के दौरान उन्हें दुनिया के कई देशों के राष्ट्रीय ध्वज देखने और समझने का अवसर मिला। यहीं से उनके मन में यह सवाल पैदा हुआ कि भारत का अपना राष्ट्रीय ध्वज कैसा होना चाहिए।
अक्सर लोग पिंगली वेंकैया को केवल तिरंगे का डिजाइनर मानते हैं, जबकि उनका व्यक्तित्व इससे कहीं अधिक बड़ा था। वे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। वे कृषि वैज्ञानिक भी थे और खेती से जुड़े विषयों पर शोध करते थे। भूविज्ञान और खनिजों में भी उनकी रुचि थी। शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा और वे कई भाषाओं के जानकार माने जाते थे। इसी बहुआयामी व्यक्तित्व ने उन्हें एक अलग पहचान दी।
बीसवीं सदी की शुरुआत में भारत के पास कोई आधिकारिक राष्ट्रीय ध्वज नहीं था। अलग-अलग संगठनों और आंदोलनों के अपने-अपने झंडे थे। पिंगली वेंकैया ने महसूस किया कि स्वतंत्रता आंदोलन को एक ऐसे ध्वज की जरूरत है, जो पूरे देश का प्रतिनिधित्व करे। उन्होंने दुनिया के अनेक देशों के झंडों का अध्ययन किया। कहा जाता है कि उन्होंने इस विषय पर एक पुस्तक भी तैयार की, जिसमें विभिन्न देशों के राष्ट्रीय ध्वजों की जानकारी और उनके महत्व का उल्लेख था। कई वर्षों के अध्ययन के बाद उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज के कई प्रारूप तैयार किए।
साल 1921 में विजयवाड़ा में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन के दौरान पिंगली वेंकैया ने महात्मा गांधी के सामने अपने डिजाइन का प्रस्ताव रखा। शुरुआती डिजाइन में दो रंग थे, जो देश के प्रमुख समुदायों का प्रतिनिधित्व करते थे।
गांधी जी ने सुझाव दिया कि इसमें सफेद रंग भी जोड़ा जाए, ताकि देश के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व हो सके। उन्होंने चरखे को भी शामिल करने की सलाह दी, जो आत्मनिर्भरता और स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक था। इसके बाद तिरंगे का नया स्वरूप सामने आया, जिसने आगे चलकर भारत के राष्ट्रीय ध्वज की नींव रखी।
22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने भारत के राष्ट्रीय ध्वज को औपचारिक रूप से अपनाया। उस समय चरखे की जगह अशोक चक्र को शामिल किया गया। यह चक्र सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ के धर्मचक्र से लिया गया है और इसमें 24 तीलियां हैं।
केसरिया रंग साहस और त्याग का प्रतीक माना जाता है। सफेद रंग सत्य और शांति का संदेश देता है, जबकि हरा रंग समृद्धि, विकास और प्रकृति से जुड़ाव को दर्शाता है। अशोक चक्र निरंतर प्रगति और न्यायपूर्ण जीवन का प्रतीक है। यही वजह है कि आज का तिरंगा भारत के मूल्यों और संविधान की भावना का प्रतीक माना जाता है।
इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का मानना है कि पिंगली वेंकैया को उनके योगदान के अनुरूप पहचान काफी देर से मिली। जीवन के अंतिम वर्षों में उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा। हालांकि, बाद के वर्षों में उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया गया, कई संस्थानों और सड़कों का नाम उनके नाम पर रखा गया और विभिन्न राज्यों में उनकी प्रतिमाएं स्थापित की गईं।
राष्ट्रीय ध्वज की मूल रूपरेखा तैयार करने का श्रेय पिंगली वेंकैया को दिया जाता है। वहीं, अंतिम स्वरूप तैयार होने की प्रक्रिया में महात्मा गांधी के सुझाव महत्वपूर्ण रहे। इसके बाद संविधान सभा ने 1947 में कुछ बदलाव करते हुए चरखे की जगह अशोक चक्र को अपनाया और आधुनिक तिरंगे को मंजूरी दी।
इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि आधुनिक भारतीय तिरंगा एक सामूहिक ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, जिसकी बुनियाद पिंगली वेंकैया ने रखी।
Updated on:
02 Aug 2026 05:26 pm
Published on:
02 Aug 2026 05:26 pm
