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7वीं सदी की ‘कच्छरी’ कैसे बनी आज की राजस्थानी कचौरी? जानिए 1400 साल पुराने स्वाद का इतिहास

क्या आप जानते हैं कि आज की मशहूर राजस्थानी कचौरी की जड़ें 7वीं सदी की 'कच्छरी' से जुड़ी हैं? जानिए मारवाड़ से शुरू हुए इस स्वादिष्ट सफर का इतिहास, प्याज और मावा कचौरी की खासियत तथा कैसे यह व्यंजन पूरे भारत की पहचान बन गया।
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भारत

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Ravi Gupta

Jul 31, 2026

Kachori History in Hindi

प्रतीकात्मक तस्वीर | ChatGPT

राजस्थान की सूखी धरती पर जन्मी कचौरी ने सिर्फ पेट भरने का काम नहीं किया, बल्कि स्वाद और संस्कृति का एक लंबा सफर तय किया है। मारवाड़ क्षेत्र से निकली यह गहरी तली हुई, मसालेदार और भरवां पेस्ट्री आज पूरे भारत में लोकप्रिय है, लेकिन इसकी असली कहानी राजस्थान की मिट्टी, परंपरा और व्यापार से जुड़ी है।

इतिहास और उत्पत्ति

कचौरी की शुरुआत मारवाड़ क्षेत्र में मानी जाती है, जहाँ की शुष्क जलवायु और सीमित सब्ज़ियों ने ऐसी टिकाऊ और स्वादिष्ट चीज़ों को जन्म दिया जो बिना फ्रिज के भी लंबे समय तक सुरक्षित रह सकें।

प्राचीन ग्रंथों में भी कचौरी जैसी डिश का ज़िक्र मिलता है।

सुश्रुत संहिता में आटे, घी और गुड़ से बनी तली हुई पेस्ट्री का उल्लेख है, जिसमें मसालेदार मूंग दाल या मांस भरा होता था। जैन ग्रंथों में “कच्छरी” नामक व्यंजन का उल्लेख मिलता है, जो 7वीं सदी का है।

1613 में बनारसीदास ने इंदौर में रोज़ाना एक सेर कचौरी खरीदने का जिक्र अपनी आत्मकथा में किया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उस समय यह व्यंजन लोकप्रिय था।

कचौरी के प्रकार और उनकी विशेषताएँ

राजस्थान में कचौरी की कई किस्में हैं, जिनमें दो सबसे प्रसिद्ध हैं:

प्याज़ कचौरी (कांदा कचौरी)

जोधपुर में उत्पन्न यह कचौरी प्याज़, बेसन और मसालों से भरी होती है, और आमतौर पर मीठी-खट्टी इमली की चटनी के साथ परोसी जाती है। यह सुबह की चाय के साथ या शाम के नाश्ते में बेहद लोकप्रिय है।

मावा कचौरी

यह मीठी कचौरी जोधपुर की खासियत है, जिसमें मावा (खोया) और सूखे मेवे भरे होते हैं, फिर इसे घी में तला जाता है और चीनी की चाशनी में डुबोकर पिस्ता, बादाम और चांदी के वर्क से सजाया जाता है।

अन्य क्षेत्रीय विविधताएँ

बीकानेर की राज कचौरी, जो “रॉयल” स्टाइल की होती है, दही, इमली की चटनी, हरी चटनी, सेव और अनारदाना से सजाई जाती है। कोटा की कचौरी में मूंग दाल का मसालेदार मिश्रण और हींग की खुशबू खास होती है।

संस्कृति और व्यापार में कचौरी का स्थान

राजस्थान की पारंपरिक थाली में कचौरी का स्थान महत्वपूर्ण है - यह न सिर्फ स्वाद बढ़ाती है, बल्कि थाली को विविधता भी देती है। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार, प्याज़ और मावा कचौरी दोनों ही राज्य के व्यंजनों में लंबे समय से शामिल हैं और अब पूरे देश में फैले हुए हैं।

जयपुर की प्रसिद्ध मिठाई दुकान रावत मिष्ठान भंडार, जो आठ दशकों से प्याज़ कचौरी के लिए जानी जाती है, इस व्यंजन की लोकप्रियता और व्यापारिक सफलता का उदाहरण है।

स्वाद का अनुभव

राजस्थानी कचौरी का असली आकर्षण उसकी बनावट, मसालों का संतुलन और साथ में परोसी जाने वाली चटनी या करी में है। प्याज़ कचौरी की कुरकुराहट और तीखा प्याज़-मसाला, मावा कचौरी की मीठास और खोए का भराव — दोनों ही स्वाद में गहराई लाते हैं।

अगर आप घर पर बनाना चाहें, तो ध्यान रखें:

  • आटे में थोड़ा घी मिलाकर नरम परत बनाएं।
  • प्याज़ कचौरी में प्याज़ को हल्का भूनें ताकि कचौरी फूले और कुरकुरी बने।
  • मावा कचौरी में खोया और मेवों का मिश्रण गाढ़ा रखें, ताकि भरावन बाहर न निकलें।
  • तलते समय तेल का तापमान ठीक रखें - बहुत गर्म तेल से बाहर से जलन और अंदर कच्चापन हो सकता है।

अगर आप राजस्थान की यात्रा कर रहे हैं या वहां के व्यंजनों को घर पर आज़माना चाहते हैं, तो प्याज़ और मावा कचौरी दोनों को जरूर ट्राई करें। हर एक में राजस्थान की मिट्टी, संस्कृति और स्वाद की कहानी बसी है। अगली बार जब आप चाय के साथ कुछ खास चाहते हों, तो इन कचौरियों को अपनी थाली में शामिल करें—यह सिर्फ नाश्ता नहीं, एक स्वाद का सफर है।

इस अनसुने स्वाद की कहानी में हर कचौरी एक अनुभव का अध्याय है और हर बाइट में राजस्थान की मिट्टी की खुशबू।