
ट्रैक्टर-ट्रॉली से स्कूल जाते बच्चे | Credit- Patrika
भोपाल। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के बड़े-बड़े दावों के बीच सांदीपनि विद्यालयों की जमीनी हकीकत सरकारी दावों की पोल खोल रही है। दूरदराज के ग्रामीण अंचलों से आने वाले बच्चों को कॉन्वेंट स्तर की शिक्षा देने का सपना दिखाकर खोले गए इन स्कूलों में बच्चे कैसे पहुंचेंगे, इसका कोई पुख्ता खाका तैयार नहीं किया गया। राजधानी से सटे और आसपास के छह जिलों गुना, अशोकनगर, विदिशा, राजगढ़, सीहोर और रायसेन में करीब 35 हजार विद्यार्थियों में से ज्यादातर का भविष्य बस की उपलब्धता के अभाव में अधर में लटका है। इन जिलों में कुल उपलब्ध 282 बसों के मुकाबले कम से कम 212 और नई बसों की सख्त जरूरत है। सबसे चिंताजनक स्थिति गुना और अशोकनगर की है, जहां हजारों पंजीकृत विद्यार्थियों के लिए प्रशासनिक स्तर पर उपलब्ध बसों की संख्या शून्य दर्ज है। नतीजतन, दूर-दराज से आने वाले नौनिहाल या तो जान जोखिम में डालकर असुरक्षित साधनों से सफर करने को मजबूर हैं या फिर हफ्ते में आधी हाजिरी देकर अपनी पढ़ाई का नुकसान सह रहे हैं।
रायसेन में तुगलकी फरमान और विरोध: रायसेन जिले के 8 सांदीपनि विद्यालयों में 13,023 विद्यार्थी दर्ज हैं। उपलब्ध 72 बसों के अलावा 24 अतिरिक्त बसों की भारी कमी बनी हुई है। जिले के उदयपुरा स्थित स्कूल में क्षमता से कम वाहन होने के कारण प्रशासनिक स्तर पर एक अनोखा 'ऑड-इवेन' फॉर्मूला लागू कर दिया गया था। व्यवस्था बनाई गई कि एक दिन केवल छात्र (लड़के) आएंगे और अगले दिन केवल छात्राएं (लड़कियां) ही स्कूल आ पाएंगी। यानी गाड़ियों की कमी के चलते बच्चों की पढ़ाई का एक-एक दिन का गैप तय कर दिया गया। हालांकि, जब इस अव्यावहारिक फैसले का चौतरफा विरोध शुरू हुआ और मामला गरमाया, तो प्रबंधन को यह तुगलकी व्यवस्था आनन-फानन में वापस लेनी पड़ी।
विदिशा का हाल: जिले के 7 विद्यालयों में परिवहन की स्थिति ब्लॉकवार बंटी हुई है। गंजबासौदा में 1,235 बच्चों के लिए उपलब्ध 8 बसें अपर्याप्त साबित हुईं। अब स्कूल को दो पालियों में संचालित करना पड़ रहा है। यहां 8 अतिरिक्त बसों की सख्त जरूरत है। ग्यारसपुर में 2,000 से अधिक बच्चों के लिए मात्र 20 बसें हैं, जिनसे दो-दो फेरे (राउंड) लगवाकर किसी तरह काम चलाया जा रहा है। नटेरन में 5 बसों के अलावा 2 और बसों की मांग लंबित है। हालांकि कुरवाई (12 बसें), विदिशा (8 बसें), लटेरी (8 बसें) और सिरोंज (5 बसें) में पर्याप्त बसें हैं।
सीहोर जिला: जिले के 9 सांदीपनि विद्यालयों में दर्ज 8,000 विद्यार्थियों के लिए 100 बसें चलाई जा रही हैं। देखने में यह व्यवस्था बेहतर लगती है, लेकिन दूरस्थ रूटों को कवर करने के लिए अभी भी 10 अतिरिक्त बसों की दरकार बनी हुई है।
राजगढ़ जिला: 5 सांदीपनि विद्यालयों के 2,200 विद्यार्थियों के लिए 44 बसें मैदान में उतारी गई हैं। यहां भी 10 और बसों की मांग भेजी गई है। राजगढ़ में समस्या केवल बसों की संख्या की नहीं, बल्कि लंबे रूटों की है। जब एक ही बस को कई दूर-दराज के गांवों से बच्चों को एकत्र करना पड़ता है, तो फेरे बढ़ने से बच्चों का काफी समय सफर में ही बर्बाद हो जाता है।
परिवहन सुविधा न होने पर किस तरह की जोखिमभरी स्थितियां बनती हैं, इसका बड़ा उदाहरण विदिशा जिले की नटेरन तहसील में देखने को मिला था। नटेरन सांदीपनि विद्यालय के करीब 130 बच्चे खैराई, मूड़री खिरनी, मूड़रा पीतांबर, निपानिया और नागौर जैसे दूरदराज के गांवों से रोजाना 10 से 15 किलोमीटर दूर ट्रैक्टर-ट्रॉली में ठंसकर स्कूल आने को मजबूर थे। बच्चों की सुरक्षा पर मंडराते खतरे को देखते हुए 5 अगस्त को स्कूली छात्र सड़कों पर उतर आए। करीब तीन दर्जन जेन जी और अल्फा पीढ़ी के विद्यार्थियों ने तहसील कार्यालय पहुंचकर विरोध जताया और तहसीलदार को ज्ञापन सौंपा। इस छात्र आंदोलन के बाद प्रशासन की नींद खुली और दो बसों की तात्कालिक व्यवस्था की गई थी। हालांकि अभी भी दो और बसों की मांग पेंडिंग है।
परिवहन की कमी के कारण जब बच्चे नियमित रूप से स्कूल नहीं पहुंच पाते या पालियों में पढ़ाई करने को मजबूर होते हैं, तो इसका सीधा असर उनकी सीखने की क्षमता पर पड़ता है। गणित, विज्ञान और अंग्रेजी जैसे मुख्य विषयों में निरंतरता टूट जाने से कमजोर पृष्ठभूमि वाले ग्रामीण बच्चों की नींव और अधिक कमजोर हो रही है। वार्षिक परीक्षाओं के नजदीक आने पर पाठ्यक्रम पूरा करने का दबाव बढ़ता है, जिससे गुणात्मक शिक्षा का मूल उद्देश्य ही परास्त हो जाता है।
सरकारी योजनाओं की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि घोषणाएं तो बेहद भव्यता और गाजे-बाजे के साथ कर दी जाती हैं, लेकिन उन्हें धरातल पर क्रियान्वित करने वाला बुनियादी ढांचा (इंफ्रास्ट्रक्चर) तैयार करना भूल जाता है। सांदीपनि विद्यालय का मूल उद्देश्य ही यह था कि दूर-दराज के गांव का गरीब से गरीब बच्चा भी कॉन्वेंट जैसी आधुनिक शिक्षा पा सके। लेकिन जब बच्चा स्कूल समय पर पहुंचेगा ही नहीं, या गाड़ियों के अभाव में हफ्ते में आधे दिन घर पर बैठने को मजबूर होगा, तो इस शिक्षा की गुणवत्ता का क्या अर्थ रह जाएगा? शिक्षा विभाग को बिना किसी देरी के तात्कालिक बजट जारी कर प्रभावित जिलों में आवश्यक 212 अतिरिक्त बसों का अधिग्रहण करना चाहिए, ताकि देश के नौनिहालों के भविष्य से यह देशी जुगाड़ और खिलवाड़ स्थायी रूप से बंद हो सके।
Updated on:
28 Sept 2026 03:39 pm
Published on:
28 Sept 2026 03:39 pm
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