
सांकेतिक इमेज (सोर्स-ChatGpt)
आंध्र प्रदेश के प्रकाशम जिले के मुरुगुम्मी, मारेला और थंगेला गांवों ने ‘जल संचय जन भागीदारी’ अभियान के तहत वर्षा जल संचयन और भूजल पुनर्भरण के कई उपाय अपनाए। मुरुगुम्मी में 71 संरचनाएं बनाईं गईं, जिनकी कुल जल संचयन क्षमता लगभग 8.11 लाख घन मीटर है। संरक्षित किए गए इस जल से 264.5 हेक्टेयर कृषि भूमि की सिंचाई होती है। मारेला गांव में जल संरक्षण के लिए 10.04 लाख घन मीटर क्षमता वाली संरचनाएं बनीं और थंगेला में 5.89 लाख घन मीटर क्षमता वाली संरचनाओं के साथ पारंपरिक जल स्रोतों का पुनरुद्धार भी हुआ। इन प्रयासों से न केवल भूजल स्तर सुधरा, बल्कि खेती और आजीविका को भी मजबूती मिली।
छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले में ‘5% मॉडल’ ने भी जल संरक्षण में नया रास्ता दिखाया। इस मॉडल में किसानों से कहा गया कि वे अपनी खेती की जमीन का लगभग 5 प्रतिशत हिस्सा वर्षा जल संचयन और भूजल रिचार्ज के लिए छोड़ दें। इस हिस्से पर खेत तालाब, रिचार्ज पिट और कंटूर ट्रेंच जैसी संरचनाएं बनाई गईं, जिससे बारिश का पानी जमीन में रुककर भूजल स्तर बढ़ाने में मदद करता है।
राजस्थान के आदिवासी कोटरी गांव ने यह साबित किया कि तकनीकी उपायों के साथ-साथ समुदाय की भागीदारी, जवाबदेही और पारदर्शिता भी जरूरी है। यूनिसेफ के सहयोग से गांव ने जल प्रबंधन में सामूहिक नेतृत्व और वित्तीय अनुशासन अपनाया, जिससे यह गांव दूसरों के लिए प्रेरणा बन गया। बस्तर के तिरथुम गांव में भी जल संरक्षण का असर साफ दिखा। यहां ग्रामीणों ने 900 कंटूर ट्रेंच बनाकर भूजल स्तर में सुधार किया और अब किसान एक की जगह तीन फसल ले पा रहे हैं।
केंद्र सरकार की ‘जल शक्ति अभियान: कैच द रेन’ योजना ने देशभर में वर्षा जल संचयन और जल संरक्षण को बढ़ावा दिया है। मार्च 2021 से दिसंबर 2024 तक, पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में 7,841 जल संबंधी कार्य पूरे किए गए, जिनमें वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जल स्रोतों का नवीनीकरण और जल संरचनाओं का विकास शामिल था। इसके अलावा सरकार ने ‘अटल भूजल योजना’ ने 7 राज्यों में 8,203 जल-संकटग्रस्त ग्राम पंचायतों में समुदाय-आधारित भूजल प्रबंधन को सफलतापूर्वक लागू किया।
इस योजना के तहत 83,800 से अधिक संरचनाएं- जैसे चेक डैम, तालाब और रिचार्ज शाफ्ट बनाईं या पुनरोद्धार की गईं, जिससे 180 ब्लॉकों में भूजल स्तर में सुधार हुआ। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि जल संरक्षण के लिए बड़े बांध या भारी मशीनरी की जरूरत नहीं होती है। जरूरत है तो गांव की समझ, सामूहिक मेहनत और थोड़ी-सी जमीन। जैसे- कोरिया मॉडल में 5 प्रतिशत। जब गांव खुद इस काम में शामिल हो, तो परिणाम स्थायी और असरदार होते हैं। गांव पंचायत, सरपंच और किसान मिलकर यह तय कर सकते हैं कि कौन-सी जमीन पर तालाब, कंटूर ट्रेंच या रिचार्ज पिट बनाए जाएं। इसके साथ ही, पारंपरिक तालाबों और कुओं का जीर्णोद्धार भी शुरू किया जा सकता है।
Updated on:
05 Aug 2026 10:05 pm
Published on:
05 Aug 2026 10:05 pm
