
तमिलनाडु विधानसभा स्पीकर के बयान के बाद बवाल मचा हुआ है। (ChatGpt)
तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष के हालिया बयान ने गर्भपात (अबॉर्शन) के अधिकार और अजन्मे शिशु के जीवन के बीच एक नई बहस छेड़ दी है। इस लेख में हम जानेंगे कि विवाद कैसे शुरू हुआ, भारत में अबॉर्शन का कानून क्या कहता है, महिला के प्रजनन अधिकार का प्रश्न क्या है, और धर्म व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनता है।
तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष जे.सी.डी. प्रभाकर 9 अगस्त 2026 को कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) से जुड़े संगठन CHARIS इंडिया द्वारा आयोजित "मार्च फॉर लाइफ" (एंटी-अबॉर्शन) रैली में शामिल हुए, जहां उन्होंने कहा कि "जीवन गर्भाधान से शुरू होता है।" इस टिप्पणी और उनकी उपस्थिति ने यह बहस छेड़ दी कि क्या वे एक संवेदनशील और कानूनी रूप से सुरक्षित स्वास्थ्य विषय पर धार्मिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दे रहे हैं। इस पर तमिलनाडु के स्वास्थ्य मंत्री के.जी. अरुणराज को स्पष्ट करना पड़ा कि गर्भपात एमटीपी एक्ट के तहत सख्ती से नियंत्रित है और अक्सर एक चिकित्सीय आवश्यकता होती है। भाजपा नेता नैनार नागेंथ्रन सहित कई राजनीतिक हस्तियों ने भी अध्यक्ष के बयान पर सवाल उठाए हैं।
भारत में गर्भपात को नियंत्रित करने वाला मुख्य कानून मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) एक्ट, 1971 है, जिसे 2021 में संशोधित किया गया। मूल कानून के अनुसार, 12 सप्ताह तक गर्भपात एक डॉक्टर की सलाह पर किया जा सकता था; 12–20 सप्ताह के बीच दो डॉक्टरों की सहमति आवश्यक थी।
2021 के संशोधन ने इसे और उदार बनाया। अब 20 सप्ताह तक एक डॉक्टर की राय से गर्भपात संभव है, जबकि 20–24 सप्ताह तक कुछ विशेष श्रेणियों , जैसे बलात्कार पीड़िता, नाबालिग, विकलांग महिला, गर्भावस्था के दौरान तलाकशुदा या विधवा हुई महिलाएं, और गंभीर भ्रूण दोष वाले मामलों में दो डॉक्टरों की राय से अनुमति मिल सकती है। 24 सप्ताह से अधिक की स्थिति में केवल राज्य द्वारा गठित मेडिकल बोर्ड की सिफारिश पर ही गर्भपात संभव है।
भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में स्पष्ट किया है कि गर्भपात का निर्णय महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और गोपनीयता का हिस्सा है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) से जुड़ा है। अप्रैल 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एक 15 वर्षीय बलात्कार पीड़िता को 30 सप्ताह की गर्भावस्था में गर्भपात की अनुमति दी और AIIMS की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें इस फैसले को पलटने की मांग की गई थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि जब बात नाबालिग रेप पीड़िता की हो, तो प्रजनन संबंधी निर्णय राज्य नहीं, बल्कि पीड़िता और उसका परिवार लेगा, और केंद्र सरकार को कानून में संशोधन कर 24 सप्ताह की सीमा पर पुनर्विचार करने का सुझाव भी दिया। यह फैसला दर्शाता है कि न्यायपालिका महिला की सुरक्षा और अधिकार को प्राथमिकता देती है, भले ही गर्भावस्था की अवधि सामान्य सीमा से आगे हो।
यह बहस धर्म और कानून के सीधे टकराव की नहीं, बल्कि धर्म और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन की है। तमिलनाडु अध्यक्ष का धार्मिक रैली में शामिल होना इस संतुलन को चुनौती देता प्रतीत होता है। भारत का कानून महिला को स्पष्ट रूप से निर्णय का अधिकार देता है, और सुप्रीम कोर्ट ने इसे संवैधानिक अधिकार माना है। धर्म व्यक्तिगत विश्वास का विषय हो सकता है, लेकिन जब वह किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के माध्यम से कानून और स्वास्थ्य निर्णयों को प्रभावित करने लगे, तो यह संवैधानिक सीमाओं को छूता है।
यह मामला याद दिलाता है कि व्यक्तिगत स्वास्थ्य और अधिकारों पर धर्म का प्रभाव सीमित होना चाहिए। कानून ने महिला को निर्णय का अधिकार दिया है, और न्यायपालिका ने उसे सशक्त किया है। लेकिन जब राजनीतिक या धार्मिक पदाधिकारी इस अधिकार को चुनौती देते हैं, तो यह आम नागरिकों के लिए, विशेषकर उन महिलाओं के लिए चिंता का विषय बन जाता है जो संवेदनशील स्वास्थ्य निर्णय लेने की स्थिति में हैं।
तमिलनाडु अध्यक्ष के बयान ने एक संवेदनशील और कानूनी रूप से संरक्षित विषय पर धर्म और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन पर प्रश्न खड़ा किया है। भारत में अबॉर्शन का कानून महिला के अधिकार को मान्यता देता है, और सुप्रीम कोर्ट ने इसे संवैधानिक अधिकार के रूप में सशक्त किया है। धर्म व्यक्तिगत विश्वास हो सकता है, लेकिन जब वह सार्वजनिक स्वास्थ्य और कानूनी अधिकारों को प्रभावित करने लगे, तो उस पर प्रश्न उठाना जायज़ है और यह बहस उसी अधिकार की रक्षा का हिस्सा है।
Updated on:
11 Aug 2026 12:47 pm
Published on:
11 Aug 2026 12:47 pm
