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टेक्सास में 90 फीट ऊंचे हनुमान पर सियासी संग्राम, ‘इसे गिरा देंगे’ पोस्ट से मचा बवाल

क्या आपने कभी सोचा है कि एक 90 फीट ऊंची हनुमान प्रतिमा अमेरिका में सांस्कृतिक युद्ध की आग को कैसे भड़का सकती है? जानिए कैसे यह विवाद धार्मिक सहिष्णुता और पहचान की राजनीति को एक नई दिशा दे रहा है!
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Swatantra Mishra

•

Sep 22, 2026

Texas Hanuman Statue

टेक्सास में हनुमान की 90 फीट ऊंची प्रतिमा (Photo: ChatGpt)

अमेरिका के टेक्सास में भगवान हनुमान की 90 फीट ऊंची प्रतिमा इन दिनों धार्मिक आस्था से कहीं आगे बढ़कर राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई है। शुगर लैंड स्थित श्री अष्टलक्ष्मी मंदिर परिसर में स्थापित इस विशाल प्रतिमा को लेकर एक रूढ़िवादी यूट्यूबर की सोशल मीडिया पोस्ट ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। यूट्यूबर जेसी ह्यूजेस ने प्रतिमा की तस्वीर साझा करते हुए लिखा- “जब हम जीतेंगे, तो इसे गिरा देंगे।”हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह किस ‘जीत’ की बात कर रहे थे।

पोस्ट सामने आते ही हिंदू संगठनों और भारतीय-अमेरिकी समुदाय के एक वर्ग में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि टेक्सास में भारतीय-अमेरिकी आबादी पांच लाख से अधिक बताई जाती है और राज्य का राजनीतिक माहौल इस समय अमेरिका के मध्यावधि चुनावों की तैयारियों के बीच पहले से ही काफी गर्म है।

90 फीट की प्रतिमा क्यों है खास?

शुगर लैंड, ह्यूस्टन के आसपास का एक प्रमुख उपनगरीय क्षेत्र है और यहां भारतीय-अमेरिकी समुदाय की अच्छी मौजूदगी है। श्री अष्टलक्ष्मी मंदिर परिसर में स्थापित ‘स्टैच्यू ऑफ यूनियन’ को अगस्त 2024 में प्रतिष्ठित किया गया था। इसे उत्तर अमेरिका की सबसे ऊंची हनुमान प्रतिमाओं में से एक माना जाता है। प्रतिमा को आध्यात्मिक गुरु श्री चिन्ना जीयर स्वामी की पहल से स्थापित किया गया।

मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार यह प्रतिमा किसी राजनीतिक संदेश के बजाय धार्मिक आस्था, सेवा, शक्ति और एकता का प्रतीक है। मंदिर परिसर निजी धार्मिक संपत्ति पर बना है और समुदाय के लिए पूजा तथा आध्यात्मिक गतिविधियों का केंद्र है। भारतीय-अमेरिकी समुदाय के समर्थकों ने भी सोशल मीडिया पर इसी बात को रेखांकित किया कि अमेरिका में विभिन्न धार्मिक समुदाय अपने धार्मिक प्रतीक और पूजा स्थल स्थापित करने के अधिकार रखते हैं।

विवाद सिर्फ एक पोस्ट तक सीमित नहीं

जेसी ह्यूजेस की टिप्पणी कोई अलग-थलग घटना नहीं है। इस प्रतिमा को लेकर पहले भी टेक्सास में कुछ रूढ़िवादी आवाजों ने आपत्ति जताई है। 2025 में टेक्सास के रिपब्लिकन नेता अलेक्जेंडर डंकन ने प्रतिमा को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी और अमेरिका को ईसाई राष्ट्र बताते हुए हिंदू प्रतिमा पर सवाल उठाया था। उस समय हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन ने उनके बयान की आलोचना करते हुए इसे भेदभावपूर्ण बताया था।

फरवरी 2026 में टेक्सास के रूढ़िवादी कार्यकर्ता कार्लोस टुर्सियोस ने भी इसी प्रतिमा का वीडियो साझा करते हुए भारतीय प्रवासियों को लेकर बेहद तीखी भाषा का इस्तेमाल किया था। उन्होंने प्रतिमा को लेकर इसे ‘आक्रमण’ से जोड़ने वाली टिप्पणी की थी। उस विवाद के बाद भी भारतीय-अमेरिकी समुदाय की ओर से धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान के अधिकार की बात उठाई गई थी। इस पृष्ठभूमि में ह्यूजेस की नई पोस्ट ने पुराने विवाद को फिर सतह पर ला दिया है।

पूर्व सैनिक ने पूछा- यह कैसी ‘जीत’?

ताजा विवाद में सबसे चर्चित प्रतिक्रियाओं में अमेरिकी सेना के पूर्व सैनिक रुचिर बख्शी का बयान शामिल है। अफगानिस्तान और इराक में युद्धक जिम्मेदारी निभा चुके बख्शी ने खुद को हिंदू-अमेरिकी बताते हुए ह्यूजेस की टिप्पणी पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि उन्होंने जिस देश के लिए सैन्य सेवा की, वहां किसी दूसरे धार्मिक समुदाय के पूजा स्थल को निशाना बनाए जाने की कल्पना स्वीकार्य नहीं हो सकती।

बख्शी की प्रतिक्रिया के बाद Coalition of Hindus of North America (CoHNA) और टेक्सास के पूर्व सैनिक एवं राजनीतिक टिप्पणीकार कार्ल व्हील्स ने भी उनका समर्थन किया। CoHNA ने सोशल मीडिया पर धार्मिक कट्टरता के खिलाफ बख्शी की प्रतिक्रिया का समर्थन किया।

यह बहस अब सिर्फ हनुमान प्रतिमा के पक्ष या विपक्ष तक सीमित नहीं रह गई है। सवाल यह बन गया है कि अमेरिका जैसे बहुधार्मिक समाज में धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक संघर्ष के बीच किस तरह देखा जा रहा है।

टेक्सास की राजनीति में भारतीय-अमेरिकी मुद्दा

टेक्सास लंबे समय से रिपब्लिकन राजनीति का गढ़ रहा है। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में रिपब्लिकन पार्टी राज्य सरकार और दोनों विधायी सदनों पर नियंत्रण रखती है। इसी बीच नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले टेक्सास में आव्रजन, पहचान और सांस्कृतिक बदलाव से जुड़े मुद्दे राजनीतिक बहस का हिस्सा बने हुए हैं।

भारतीय-अमेरिकी समुदाय भी इस बहस के बीच लगातार अधिक दिखाई दे रहा है। टेक्सास में भारतीय मूल के लोगों की बड़ी आबादी है और कई परिवार दशकों से राज्य में रह रहे हैं। इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कारोबार और तकनीकी क्षेत्र में उनकी मौजूदगी खास तौर पर उल्लेखनीय है।

हाल के दिनों में भारतीय मूल के छात्रों और समुदाय को लेकर टेक्सास की राजनीति में सामने आए कुछ विवादों ने भी इस संवेदनशीलता को बढ़ाया है। उदाहरण के तौर पर रिपब्लिकन उम्मीदवार बो फ्रेंच की दक्षिण एशियाई छात्रों को लेकर की गई सोशल मीडिया टिप्पणी की आलोचना हुई थी। रिपब्लिकन सीनेटर जॉन कॉर्निन सहित कुछ रिपब्लिकन नेताओं ने भी उस टिप्पणी पर सार्वजनिक रूप से आपत्ति जताई।

धर्म, पहचान और राजनीति का चौराहा

हनुमान प्रतिमा विवाद इसी बड़े सवाल का एक नया अध्याय है। एक तरफ इसे हिंदू-अमेरिकी समुदाय अपनी धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पहचान के प्रतीक के रूप में देखता है, दूसरी तरफ कुछ रूढ़िवादी आवाजें अमेरिका की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को लेकर अलग दृष्टिकोण रखती हैं।

अमेरिकी संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इसलिए किसी धार्मिक प्रतीक को लेकर राजनीतिक या वैचारिक असहमति और किसी धार्मिक स्थल या प्रतीक को हटाने की मांग- इन दोनों के बीच कानूनी और संवैधानिक सवाल भी जुड़े हैं।

फिलहाल जेसी ह्यूजेस की पोस्ट ने बहस को फिर तेज कर दिया है। 90 फीट ऊंची हनुमान प्रतिमा अब सिर्फ शुगर लैंड के एक मंदिर की पहचान नहीं रह गई है; वह टेक्सास में धर्म, प्रवास, सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच चल रही व्यापक बहस का प्रतीक बनती दिखाई दे रही है। यह विवाद आगे किस रूप में बढ़ता है, यह आने वाले दिनों की राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाओं पर निर्भर करेगा।