
राजस्थान की पारंपरिक रसोई, जहां केर-सांगरी, पंचकुट्टा और खेजड़ी ज़ायक़े व सौंधी महक की कहानी बयां करते हैं। ( फोटो: AI)
Thar रेगिस्तान की सुनहरी रेत दूर से भले ही वीरान दिखाई देती हो, लेकिन इसकी मिट्टी में सदियों पुरानी खानपान की परंपरा का ऐसा ख़ज़ाना छिपा हुआ है, जिसने कठिन परिस्थितियों में भी जीवन को स्वाद और पोषण से भर दिया। राजस्थान के जोधपुर,बीकानेर, जैसलमेर और नागौर जैसे इलाकों में भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं है, बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल, पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय अर्थव्यवस्था का आधार है। पानी की कमी, तेज़ गर्मी और सीमित संसाधनों ने यहां के लोगों को ऐसी रसोई दी, जो आज देश-विदेश के फूड प्रेमियों का ध्यान खींच रही है।
थार की जलवायु कठोर है। यहां वर्षा कम होती है और लंबे समय तक सूखा पड़ सकता है। ऐसी परिस्थितियों में स्थानीय समुदायों ने ऐसे खाद्य पदार्थ अपनाए, जो लंबे समय तक सुरक्षित रह सकें और कम पानी में उग सकें।
इसी सोच ने बाजरा, ज्वार, मूंग, मोठ और स्थानीय जंगली फलों व सब्जियों को यहां के भोजन का आधार बनाया। सूखे खाद्य पदार्थों को महीनों तक सुरक्षित रखने की परंपरा आज भी ग्रामीण परिवारों में जीवित है।
बीकानेर, जोधपुर, नागौर और जैसलमेर के किसानों के बीच कचरी, तरबूज, खरबूजा और अन्य स्थानीय कुकुर्बिट फसलों का विशेष महत्व है।
सन 2010 से 2013 के बीच हुए एक अध्ययन में यह तथ्य सामने आया कि अधिकतर किसान इन फसलों का ताज़ा उपयोग करने के साथ-साथ उन्हें सुखा कर भी संरक्षित करते हैं। इन्हीं से अचार, पाउडर, जूस, जैम और लड्डू जैसे मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार किए जाते हैं।
यह तरीका केवल भोजन बचाने का माध्यम नहीं, बल्कि अतिरिक्त आमदनी का भी स्रोत बन चुका है। स्थानीय महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से इन उत्पादों को बाज़ार तक पहुंचा रही हैं।
थार के सबसे प्रसिद्ध पारंपरिक व्यंजनों में पंचकुट्टा का नाम सबसे ऊपर आता है।
यह पांच स्थानीय जंगली पौधों के सूखे फलों का मिश्रण होता है, जिसमें सामान्यतः शामिल होते हैं—
केर
कुमट
खेजड़ी की सांगरी
कचरी
लसौड़ा
मार्च से सितंबर के बीच इसे सब्ज़ी के रूप में बनाया जाता है, जबकि पूरे वर्ष इसे अचार और मसालेदार मिश्रण के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है।
स्थानीय समुदायों में इसे पेट और गले की तकलीफ़ों और गठिया जैसी समस्याओं में पारंपरिक घरेलू उपचार के रूप में भी उपयोग किया जाता रहा है, हालांकि इसे आधुनिक चिकित्सा का विकल्प नहीं माना जाता।
यदि थार की पहचान किसी एक पेड़ से जुड़ी है तो वह है खेजड़ी (Prosopis cineraria)।
इस वृक्ष को राजस्थान में कल्पवृक्ष कहा जाता है क्योंकि यह सूखे में भी जीवित रहता है। इसकी गहरी जड़ें भूमिगत जल तक पहुंचती हैं और यह आसपास की मिट्टी को भी बेहतर बनाने में मदद करता है।
इसके फल सांगरी प्रोटीन और फाइबर से भरपूर माने जाते हैं। केर-सांगरी, पंचकुट्टा और अन्य पारंपरिक व्यंजनों में इसका व्यापक उपयोग होता है।
विश्नोई समुदाय के लिए खेजड़ी केवल एक पेड़ नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण का प्रतीक भी है।
कुछ दशक पहले तक केर-सांगरी मुख्यतः ग्रामीण घरों तक सीमित थी।
आज यह राजस्थान के लगभग हर प्रमुख पर्यटन स्थल की थाली का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। जैसलमेर के हवेलियों वाले रेस्तरां हों या जोधपुर के पारंपरिक भोजनालय, विदेशी पर्यटक भी इस व्यंजन को स्थानीय अनुभव का हिस्सा मानकर चखना पसंद करते हैं।
इस बदलाव ने स्थानीय किसानों और उत्पादकों को नए बाज़ार भी उपलब्ध कराए हैं।
हाल के वर्षों में जयपुर में आयोजित कुछ पॉप-अप फूड आयोजनों ने थार की पारंपरिक सामग्री को आधुनिक व्यंजनों में शामिल किया।
इनमें प्रमुख रूप से शामिल रहे—
ऊंट का दूध
केर
सांभर झील का नमक
स्थानीय जंगली फल
शेफ़ इन सामग्रियों से आधुनिक डेज़र्ट, सॉस और फ्यूज़न व्यंजन तैयार कर रहे हैं। इससे थार की खाद्य विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश हो रही है।
थार के भोजन की सबसे बड़ी विशेषता उसकी टिकाऊ प्रकृति है।
यहां के अधिकतर व्यंजन ऐसे हैं जो—
कम पानी में तैयार हो सकते हैं।
लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं।
अधिक ऊर्जा प्रदान करते हैं।
स्थानीय संसाधनों पर आधारित होते हैं।
घी, मसालों और सूखे फलों का संतुलित उपयोग भोजन को लंबे समय तक टिकाऊ और स्वादिष्ट बनाता है।
आज थार के पारंपरिक खाद्य पदार्थ केवल सांस्कृतिक पहचान तक सीमित नहीं हैं।
महिला स्वयं सहायता समूह, किसान उत्पादक संगठन और स्थानीय उद्यमी इनसे—
मसाला मिश्रण
सूखी सब्ज़ियां
अचार
पैक्ड सांगरी
पंचकुट्टा मिक्स
जैसे उत्पाद तैयार कर ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों बाज़ारों में बेच रहे हैं।
इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिल रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि स्थानीय खाद्य प्रणालियां केवल स्वाद नहीं, बल्कि टिकाऊ जीवनशैली का भी हिस्सा हैं।
बाजरा, ज्वार, सांगरी और कचरी जैसे खाद्य पदार्थ फाइबर, खनिज और पौध-आधारित पोषक तत्वों से भरपूर माने जाते हैं। यही कारण है कि मिलेट आधारित भोजन और पारंपरिक खाद्य पदार्थों की लोकप्रियता बढ़ने के साथ थार की रसोई भी नए सिरे से चर्चा में आई है।
अगर आप राजस्थान के थार क्षेत्र की यात्रा करें तो इन पारंपरिक स्वादों को अपनी सूची में ज़रूर शामिल करें—
केर-सांगरी: थार का सबसे मशहूर पारंपरिक व्यंजन।
पंचकुट्टा: पांच जंगली फलों का अनोखा मिश्रण।
बाजरे की रोटी: स्थानीय भोजन का आधार।
कचरी की चटनी: तीखा और पारंपरिक स्वाद।
ऊंट के दूध से बने उत्पाद: आधुनिक फूड ट्रेंड का हिस्सा।
बहरहाल, थार का भोजन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि कठिन प्राकृतिक परिस्थितियां भी संस्कृति और स्वाद रोक नहीं सकतीं। यहां की रसोई सदियों के अनुभव, पर्यावरण के प्रति समझ और संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग की कहानी कहती है। पंचकुट्टा, केर-सांगरी और खेजड़ी जैसे स्वाद आज केवल राजस्थान की पहचान नहीं, बल्कि टिकाऊ भोजन और स्थानीय खाद्य विरासत की प्रेरक मिसाल बन चुके हैं।
Updated on:
20 Aug 2026 05:53 pm
Published on:
20 Aug 2026 05:53 pm
