Assembly Election 2020 :  जीतन राम मांझी बिहार की राजनीति में इतने खास क्यों हैं?

  • Jitan Ram Manjhi ने महागठबंधन से सियासी नाता तोड़कर आरजेडी के वोट बैंक फार्मूले को हिला दिया।
  • थर्ड फ्रंट को भी हम को अपने साथ लाने में अभी तक मदद नहीं मिली।
  • CM Nitish Kumar ने जीतन राम से टेबल टॉक कर उन्हें लगभग एनडीए के पाले में शामिल कर लिया है।

By: Dhirendra

Updated: 28 Aug 2020, 04:56 PM IST

नई दिल्ली। इस बार बिहार विधानसभा चुनाव 2020 ( Bihar Assembly Election 2020 ) कोरोना विस्फोट ( Corona Explosion ) के बीच होने जा रहा है। इसलिए सियासी तौर—तरीके भी बदले हुए हैं, लेकिन सत्ता पर काबिज होने को लेकर जोड़तोड़ पहले की तरह जारी है। इस मुहिम से एनडीए ( NDA ), महागठबंधन ( Grand Alliance ) और थर्ड फ्रंट ( Third Front ) के नेता एक-दूसरे का खेल बिगाड़ने में लगे हैं।

फिलहाल बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और हिन्दुस्तान अवाम मोर्चा ( HAM ) के प्रमुख जीतन राम मांझी ( Jitan Ram Manjhi ) ने महागठबंधन से सियासी नाता तोड़कर वोट बैंक के जातीय समीकरणों को हिला दिया है। यही वजह है कि जीतन राम मांझी अचानक बिहार की राजनीति में अहम हो गए हैं। उनके इस कदम से हर गठबंधन को अब चुनावी जीत के लिए नए सिरे से समीकरण सेट करना पड़ रहा है।

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मांझी ने बिगाड़ा महागठबंधन का खेल

चुनावी मौसम में महागठबंधन को झटका देकर जीतन राम मांझी ने आरजेडी ( RJD ) को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने का काम किया है। माना जा रहा है कि आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ( RJD Tejashwi Yadav ) के अड़ियल रुख की वजह से वह महागठबंधन छोड़ने को मजबूर हुए हैं। तेजस्वी के दबाव में ही कांग्रेस ( Congress ) भी जीतन राम मांझी को महागठबंधन में बनाए रखने में सफल नहीं हुई।

नीतीश कुमार ने उठाया अवसर का लाभ

महगठबंधन झटका इसलिए भी माना जा रहा है कि 2019 के लोकसभा चुनाव ( Lok Sabha Election 2019 ) में जिन तीन संसदीय सीटों से हम के प्रत्याशी चुनाव लड़े थे वहां पर उन्होंने एनडीए ( NDA ) को कड़ी टक्टर दी थी। यानि तीन संसदीय क्षेत्रों में हम की वजह से महागठबंधन का बड़ा नुकसान तय है। इसके अलावे भी कई सीटों पर मांझी अपना दखल रखते हैं। इस बात को सीएम नीतीश कुमार बखूबी समझते हैं। इसलिए सियासी स्तर पर छत्तीस का आंकड़ा होने के बावजूद उन्होंने महागठबंधन में मतभेद का लाभ उठाकर उन्हें अपने लगभग साथ जोड़ लिया। साथ ही मांझी के बेटे वर्तमान में एमएलसी हैं। उनकी पकड़ भी एससी मतदाताओं ( SC Voters ) पर अच्छी है।

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थर्ड फ्रंट का मामला अधर में

आरजेडी विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के लिए जिस जातीय समीकरण के फार्मूले को अपने पक्ष में मानकर चल रही थी वो खेल जीतन राम के जाने से बिगड़ गया। ऐसा इसलिए कि तेजस्वी यादव यह मानकर चल रहे थे कि 12 फीसदी यादव और 13 फीसदी मुस्लिम मतदाता उनके साथ हैं। 17 फीसदी एससी मतदाता वीआईपी, हम वामपंथियों की वजह से वोट उन्हें मिलेगा। उनका यही फार्मूला हम की नाराजगी की वजह से बिगड़ गया। अब 17 फीसदी एससी मतदाताओं का गणित महागठबंधन के खाते से बाहर निकल लगभग एनडीए के खाते में चली गई है।

थर्ड फ्रंट की मुहिम भी हुई कमजोर

केवल महागठबंधन ही नहीं बल्कि थर्ड फ्रंट ( Third front ) का गणित भी उलझ गया है। ऐसा इसलिए कि थर्ड फ्रंट के नेता भी हम नेता जीतन राम मांझी को अपने गुट में शामिल को लेकर बातचीत कर रहे थे। इस फ्रंट को पूर्व बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा द्वारा लंबे अरसे से जारी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक अलाएंस ( United Democratic Alliance ) थर्ड फ्रंट के रूप में खड़ा करने की मुहिम में जुटे थे। हालांकि आज भी यूडीए के नेता मांझी को अपने पाले में लाने के लिए सक्रिय हैं, लेकिन अब इसके चांस बहुत कम हैं।

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HAM के सियासी अहमियत को नकार नहीं सकते

आरएलएसपी युवा के राष्ट्रीय महासचिव आशीष कुमार सिन्हा बताते हैं कि कई वजहों से इस बार बिहार की राजनीति में हिन्दुस्तान अवाम मोर्चा के प्रमुख जीतन राम मांझी अहम हो गए हैं। उनका कहना है कि बिहार में अनुसूचित जातियों की कुल मतदाताओं में 17 फीसदी की हिस्सेदारी है। इनमें से 3 फीसदी मांझी कम्युनिटी के लोग हैं।

सीएम पद रहते हुए इन तबके के लोगों का रखा था ख्याल

उन्होंने बताया कि हम नेता ने अपने छोटे से मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल के दौरान एससी कटेगरी के लोगों के लिए काफी अहम काम किया था, जिसे अनुसूचित जाति के लोग अभी तक भूले नहीं हैं। उन्होंने अनुसूचित जाति के बीपीएल कार्डधारकों से कहा था कि वो बिहार में कहीं भी अपने लिए 0.5 डिसिमल जमीन अपने आवास के लिए खरीद लें। बिहार सरकार बाजार कीमत पर उसका भुगतान करेगी। उन्होंने सवर्णों को छोड़कर सभी वर्गों के छ़ात्र—छात्राओं के लिए पीजी तक एजुकेशन फ्री कर दिया था। जबकि सवर्ण वर्ग में केवल लड़कियों को पीजी तक एजुकेशन फ्री किया था।

इसी तरह बिहार सहकारिता विभाग में भी उन्होंने अच्छा काम किया था। उनका यही काम नीतीश कुमार को उस समय अच्छा नहीं लगा था। सियासी खटास की वजह से सरकार अल्पमत में आने से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा था। सरकार बचाने क्रम में उन्होंने शरद यादव को कह दिया था कि उनके कहने पर तो वो कतई इस्तीफा नहीं देंगे।

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