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वर्मा को हटाने में सरकार ने नियमों का भी नहीं रखा खयाल

जानकार भी मानते हैं कि चयन समिति की मंजूरी थी जरूरी अन्य प्रभावशाली लोगों को जांच के लपेटे में लेना चाह रहे थे सीबीआइ चीफ घबराहट में सरकार ने उठाया यह आपातकालीन कदम
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वर्मा को हटाने में सरकार ने नियमों का भी नहीं रखा खयाल

नई दिल्ली। शीर्ष जांच एजेंसी सीबीआइ के प्रमुख आलोक वर्मा को रातों-रात हटाते हुए केंद्र सरकार ने नियमों का भी ध्यान नहीं रखा। तय प्रक्रिया के मुताबिक दो साल के तय कार्यकाल के दौरान उन्हें छुट्टी पर भेजने से पहले सरकार को चयन समिति की मंजूरी लेनी जरूरी थी। ऐसे में अब अगर अदालत ने सरकार की कार्रवाई के खिलाफ वर्मा की अपील को ठुकरा भी दिया तो भी सरकार को इस कार्रवाई की मंजूरी चयन समिति से लेनी होगी।

सीबीआइ के एक पूर्व निदेशक ‘पत्रिका’ से बातचीत में मानते हैं कि तबादले या छुट्टी पर भेजने से पहले चयन समिति की मंजूरी जरूरी है। अगर मंजूरी नहीं ली है तो निर्णय के उपरांत भी इसे समिति के पास ले जाना होगा और उसके सामने सभी आरोपों को रखना होगा।

उधर, सीबीआइ के ही पूर्व विशेष निदेशक एमएल शर्मा यह तो मानते हैं कि यह मंजूरी जरूरी है, लेकिन कहते हैं, ‘सीबीआइ का भट्ठा बैठा जा रहा था, ऐसे में सामान्य नियम लागू नहीं होते। फिर यह फैसला सीवीसी ने लिया है। सरकार ने उसे मंजूर भर किया है। अब सुप्रीम कोर्ट पर नजर होगी।’

सुप्रीम कोर्ट ने 1998 के अपने फैसले में यह तय किया था कि सीबीआइ निदेशक का कार्यकाल दो साल के लिए तय होगा और इस दौरान उन्हें और अधिक महत्वपूर्ण जिम्मेवारी देने के लिए भी तबादला करना हो तो चयन समिति की मंजूरी अनिवार्य होगी। समिति में प्रधानमंत्री के अलावा विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के नेता और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शामिल हैं।

घबराहट में उठाया सरकार ने कदम

सीबीआइ निदेशक आलोक वर्मा और उनकी टीम ने अब अपनी जांच के दायरे में सिर्फ राकेश अस्थाना को ही नहीं बल्कि सरकार के कई और अहम लोगों को भी ले लिया था। साथ ही सरकार को यह आशंका भी थी कि अपनी कुर्सी जाता देख कर वे रफाल मामले पर भी औपचारिक रूप से प्रारंभिक जांच शुरू कर सकते हैं। इसके लिए अरुण शौरी और प्रशांत भूषण आदि की याचिका उनके पास थी ही। ऐसे में सरकार ने ज्यादा समय तक इंतजार करना ठीक नहीं समझा। सरकार के एक शीर्ष सूत्र कहते हैं, ‘सरकार को इस बात के स्पष्ठ सबूत मिले हैं कि वर्मा जांच एजेंसी का बेहद खतरनाक दुरुपयोग कर रहे थे। ऐसे में उनके खिलाफ तत्काल कार्रवाई जरूरी थी।’

अस्थाना की बजाय सरकार का निशाना सिर्फ वर्मा

खास बात है कि बुधवार को जब वर्मा और अस्थाना दोनों को छुट्टी पर भेजने का सरकार का फैसला आया तो उसके साथ जारी बयान में सरकार ने अपना पूरा निशाना सिर्फ वर्मा को ही बनाया है। इस लंबे-चौड़े बयान में वर्मा के खिलाफ कई आरोप लगाए गए हैं, लेकिन अस्थाना के बारे में पूरी तरह चुप्पी बरती गई है। सूत्र कहते हैं कि भले ही एफआइआर अस्थाना के खिलाफ हुई हो, लेकिन अब जांच तो दोनों की ही होगी।