
ऐसे नेता जिन्होंने धर्म और सियासत दोनों में बनाई अपनी खास पहचान
नई दिल्ली। सत्ता का सुख भोगने की सबकी ख्वाहिश होती है। फिर चाहे 10 सेे 6 की ड्यूटी करनेे वाला कर्मचारी हो, समाजसेवी हो या फिल्म स्टार। योग और आध्यात्म से जुड़़े साधु-संत भी इसमें पीछे नहीं रहे। इस बार के लोकसभा चुनाव में भी यह देखने को मिल रहा है। बता दें कि सियासत से संन्यासियों का बहुत पुराना नाता रहा है। भगवा चोला ओढकर, अपना जीवन पूरी तरह योग और आध्यात्म को समर्पित कर चुके कुछ साधु-संत राजनीति में अपनी एक अलग की पहचान रखते हैं। तो आइए जानते हैं ऐसे कुछ साधु-संतों के बारे में जिन्होंने धर्म से लेकर राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई-
योगी आदित्यनाथ: 2017 में बने UP केे सीएम
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और गोरक्षनाथ पीठ के महंत योगी आदित्यनाथ को कौन नहीं जानता। 5 जून 1972 में उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश था) के पौड़ी जिला स्थित यमकेश्वर तहसील के पंचूर गांव के एक राजपूत परिवार में योगी आदित्यनाथ का जन्म हुआ था। उनका बचपन का नाम अजय सिंह नेगी है। कोटद्वार के गढ़वाल यूनिवर्सिटी से गणित में बीएससी की परीक्षा पास करने के बाद योगी 1993 एमएससी की पढ़ाई के दौरान गुरु गोरखनाथ पर रिसर्च करने गोरखपुर आ गए। यहां गोरक्षनाथ पीठ के महंत अवैद्यनाथ की नजर आदित्यनाथ पर पड़ी। जिसके बाद 1994 सांसारिक मोहमाया त्यागकर योगी पूर्ण रूप से संन्यासी बन गए। इसके बाद अजय सिंह नेगी का नाम योगी आदित्यानाथ हो गया और यहीं से उनका धर्म के साथ सियासी सफर भी शुरू हो गया।
योगी को साल 1998 में महज 26 साल की उम्र में गोरखपुर से भाजपा प्रत्याशी के तौर पर चुनावी मैदान में उतारा गया और उन्होंने जीत हासिल की। तब से योगी 1999, 2004, 2009 और 2014 में गोरखपुर से सांसद रहे। बीजेपी के फायर ब्राडं नेता के रूप में जाने जाने वाले योगी आदित्यनाथ को पार्टी ने 2017 बड़ी जिम्मेदारी देते हुए यूपी का मुख्यमंत्री बनाया।
बता दें कि योगी का जितना नाम योग, पूजा-पाठ और आध्यात्म में है उतनी ही पहचान वह राजनीति में रखते हैं। नाथ संप्रदाय की जिस पीठ के योगी महंत हैं, उसके अनुयायी पूरे देश में फैले हैं। यही वजह है कि भगवाधारी और हिंदुत्व की समर्थक भाजपा अपने विस्तार और राजनीतिक हिस्सेदारी को और बढ़ाने के लिए योगी आदित्यानाथ को अपने बड़े चेहरे के दौर पर दिखाती है।
उमा भारती : राम मंदिर आंदोलन से चर्चा में आईं
बीजेपी के दिग्गजों में शुमार उमा भारती को किसी पहचान की जरूरत नहीं। मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में जन्मीं उमा भारती भारतीय जनता पार्टी में कई अहम पदों पर रहीं। उनकी प्रसिद्धि धार्मिक बालिका के तौर पर बचपन से ही थी। लेकिन राजमाता विजयाराजे सिंधिया के संपर्क में आने के बाद वह भाजपा की विचारधार से काफी प्रभावित हूईं। बता दें कि विजयाराजे सिंधिया ही उमा भारती को राजनीति में लेकर आईं। उमा भारती की पॉलिटिकल मेंटर रहीं विजयाराजे ने ही उन्हें 1984 में पहला लोकसभा चुनाव लड़वाया। लेकिन उमा ये चुनाव हार गईं। भले की उमा भारती चुनाव हार गई हों लेकिन उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत हो चुकी थी। धर्म और आध्यात्मा को अपना आधार मानने वाली उमा ने पांच साल बाद फिर 1989 में खजुराहो लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।
उमा को 1991, 1996 और 1998 में भी यहीं से लगातार सफलता मिलती रही। लेकिन राम जन्मभूमि आंदोलन से वह काफी चर्चा में आईं। बता दें कि दिसंबर 1992 में वह संघ के उन चुनिंदा लोगों में शामिल थीं, जो अयोध्या की रैली में शामिल थे। इसके बाद उनका राजनीतिक जीवन परवान चढ़ता गया। वाजपेयी और मोदी सरकार में उन्हें अहम जिम्मेदारी देते हुए केंद्रिय मंत्री बनाया गया। वह 2003 में मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री भी रहीं। साल 2014 तक सांसद रहीं।
साध्वी प्रज्ञा ठाकूर: लोकसभा चुनाव में भोपाल से BJP प्रत्याशी
साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर का जन्म 2 फरवरी 1970 को मध्यप्रदेश के भिण्ड जिले में हुआ था।वह एक मध्यवर्गीय कुशवाहा राजपूत परिवार से तालुख रखती हैं। उनके पिता डॉ. चंद्रपाल सिंह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सेवक और आयुर्वेदिक डॉक्टर थे। परिवारिक पृष्ठभूमि के चलते वे संघ और विहिप से जुड़ीं और फिर संन्यास ले लिया। बता दें कि शुरुआती दिनों में साध्वी प्रज्ञा का दक्षिणपंथी संगठनों के तरफ काफी झुकाव रहा था। यही वजह रही की वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की सक्रिय सदस्य रहीं। इसके बाद वह विश्व हिन्दू परिषद (वीएचपी) की महिला विंग दुर्गा वाहिनी से जुड़ गईं। 2002 में उन्होंने 'जय वंदे मातरम जन कल्याण समिति' बनाई।
लेकिन चर्चा में वह अपने तीखे बयानों से आईं। अपने भाषणों से वह हमेशा सुर्थियों में बनी रहती थीं। ऐसा कहा जाता है कि जब भी वह भाषण देती थीं तो लोगों केे रोंगटे खड़े हो जाते थे। उनकी पहचान एक हिन्दुत्व चेहरे के रूप में थी। अपनी इसी छवि और जोशीेले भाषणों की वजह से उन्होंने बीजेपी नेताओं को काफी प्रभावित किया और धीरे-धीरे उनका राजनीति में वर्चस्व बढ़ता गया। लेकिन प्रज्ञा ठाकुर को 2008 मालेगांव ब्लास्ट मामले में गिरफ्तार कर लिया गया। वह नौ साल तक जेल में भी रहीं। इस समय वे जमानत पर बाहर हैं और लोकसभा चुनाव में भोपाल सीट से कांग्रेस उम्मीदवार दिग्विज सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं।
स्वामी अग्निवेश : हरियाणा सरकार में रहे मंत्री
आर्य समाज से जुड़े स्वामी अग्निवेश का जन्म 21 सितंबर 1939 में आंध्र प्रदश के श्रीकाकुलम में हुआ था। बचपन में ही उनके पिता की मृत्यु हो गई थी। उनके नाना ने उनकी परवरिश की। लॉ और कॉमर्स में डिग्री धारक अग्निवेश कोलकाता चले गए थे। यहां वे सेंट जेवियर्स कॉलेज में मैनेजमेंट के लेक्चरर रहे। सब्यसाची मुखर्जी के अधीन उन्होंने वकालत भी की। इसके बाद वे हरियाणा चले गए। यहां अग्निवेश 1968 में आर्य समाज में शामिल हो गए। 1970 में उन्होंने संन्यास लिया। इसी साल उन्होंने 1970 'आर्य सभ' नाम की राजनीति पार्टी बनाई, जिसके बाद उनका सियासी जीवन शुरू हुआ। साल 1977 में वह हरियाणा विधासनभा के लिए विधायक चुने गए। उन्हें हरियाणा सरकार में शिक्षा मंत्री बनाया गया।
उल्लेखनीय है कि 2011 में अग्निवेश उस समिति में शामिल थे, जिन्होंने माओवादियों से बात करके अगवा हुए पांच पुलिसकर्मियों को छुड़ाया था। इन्होंने 2011 के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन में भी हिस्सा लिया। स्वामी अग्निवेश सिर्फ धर्म और सियासत तक ही सिमटे नहीं रहे। उन्होंने टीवी रियॉलिटी शो में भी भाग लिया। उन्होंने तीन दिन तक बिग बॉस के घर में रहकर काफी सु्खियां बटोरी।
कंप्यूटर बाबा : शिवराज सरकार में मिला राज्यमंत्री का दर्जा
माथे पर दन का टीका। जटाओं वाले बाल और गले में रूद्राक्ष की माला, ज्यादातर बाबओं की वेशभूषा ऐसी ही होती है। लेकिन एक ऐसे बाबा भी हैं, जो इससे कुछ अलग हैं। जो धर्म और आध्यात्म की बात भ्री करते हैं, लेकिन इनके अलावा वह लैपटॉप, फेसबुक और हेलिकॉप्टर का भी शौक रखते हैं। दरअसल, हम बात कर रहे हैं एमपी के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान की सरकार में राज्यमंत्री रहे कंप्यूटर बाबा की।
अपने नाम के आगे ‘महामंडलेश्वर’ लगाने वाले कंप्यूटर बाबा का बचपन का नाम नामदेव दास त्यागी है। 25 साल की उम्र के बाद वह बनारस जाकर साधु हो गए थे। उन्हीं दिनों देश में कंप्यूटर आया था। एक कंप्यूटर इनके मठ में भी लिया गया। इसे चलाना पूरे मठ में सिर्फ इन्हें ही आता था। मठ के गुरु ने अपने बाद मठ की कमान इनके हाथों में सौंपी। तभी से लोग इन्हें कंप्यूटर बाबा के नाम से जानने लगे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कंप्यूटर बाबा राजनीति का शौक पहले से ही रखते थे। वह 2014 के लोकसभा चुनाव मे आम आदमी पार्टी की टिकट से संसद पहुंचने का सपना देख रहे थे।
Updated on:
03 May 2019 08:11 pm
Published on:
01 May 2019 07:06 am
