
जानिए मिजोरम विधानसभा चुनाव 2018 से जुड़ी हर जानकारी
अमित कुमार बाजपेयी. नई दिल्ली। पूर्वोत्तर के पर्वतीय राज्य मिजोरम में इस वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव पर सभी की नजर है क्योंकि देशभर को कांग्रेसमुक्त करने का सपना देख रही भारतीय जनता पार्टी यहां कब्जा जमाना चाहती हैं। जबकि कांग्रेस और मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) राज्य में सत्ता की बागडोर छोड़ने के मूड में नजर नहीं आतीं। जानना दिलचस्प होगा कि मिजोरम के राजनीतिक समीकरण क्या कहते हैं।
मिजोरम का भूगोल
2011 की जनगणना के मुताबिक मिजोरम की कुल जनसंख्या 10 लाख 91 हजार 014 थी। राज्य में ग्रामीण जनसंख्या का प्रतिशत 48.49 फीसदी जबकि शहरी जनसंख्या 51.51 फीसदी थी। मिजोरम में लैंगिक अनुपात 1,000 पुरुषों पर 970 महिलाओं का है जबकि साक्षरता 91.33 फीसदी। इन दोनों ही लिहाज से यह भारत के अन्य राज्यों को कड़ी चुनौती देता है।
मिजोरम की करीब 95 फीसदी जनसंख्या अनुसूचित जनजाति तबके की है, जो इसे सर्वाधिक जनजातीय घनत्व वाला राज्य भी बनाती हैै। करीब 87 फीसदी मिजोरमवासी इसाई हैं। जबकि बौद्ध लगभग 8 फीसदी हैं, जो इन्हें सबसे बड़ा अल्पसंख्यक तबका साबित करते हैं।
ये हैं राज्य के मुख्य मुद्दे
अवैध प्रवासी
2016 असम चुनाव की ही तरह 2018 मिजोरम विधानसभा चुनाव में भी म्यांमार, बांग्लादेश और नेपाल जैसे पड़ोसी राज्यों से होने वाली अवैध घुसपैठ को रोकना सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण मुद्दा है। अक्टूबर 2017 की मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा की राज्य इकाई ने राज्य की कांग्रेस सरकार से निवेदन किया था कि वो अवैध रूप से आने वाले विदेशियों की पहचान करने के बाद उन्हें वापस पड़ोसी मुल्कों में भेज दें। वहीं, दिसंबर में मिजोरम के प्रमुख नागरिक और छात्र संगठनों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फरियाद लगाई थी कि बांग्लादेश के चकमा समेत सभी अवैध प्रवासियों को यहां से वापस भेज दिया जाए।
ढांचागत सुविधाएं
मिजोरम में ढांचागत विकास भी चुनाव का मुख्य मुद्दा बन सकता है। दिसंबर में आइजोल में हुई एक जनसभा के दौरान पीएम मोदी ने कहा था कि मिजोरम-म्यांमार के बीच रिह-टिड्डीम मार्ग विकसित होने और तमाम ग्रामीण 'हाट' बनने से राज्य का व्यापार बढ़ेगा। मोदी ने यह भी कहा था कि केंद्र ने बुनियादी सुविधाओं के अंतर को पाटने के लिए नॉर्थ ईस्ट स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम (एनईएसआईएस) लॉन्च की थी।
बेरोजगारी
मिजोरम की एक और बड़ी समस्या बेरोजगारी भी है। एक आर्थिक गणना करने वाली वेबसाइट के मुताबिक तेजी से होता विकास पर्याप्त नौकरियां और रोजी-रोटी का जुगाड़ नहीं कर पाया है। गरीबी भी यहां एक परेशानी है। 2011-12 में करीब 20 फीसदी जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रही थी। राज्य में गरीबी के दो प्रमुख कारण अल्प-विकसित कृषि और अकुशल मजदूर हैं। यहां के आदिवासी पारंपरिक और अवैज्ञानिक आदिम तरह की खेती की तकनीक "झूम" कृषि करते हैं। झूम कृषि में पहले वृक्षों-वनस्पतियों को काटकर उन्हें जला दिया जाता है और साफ की गई भूमि को पुराने उपकरणों से जुताई करके बीज बो दिए जाते हैं। पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर कृषि में उत्पादन बहुत कम होता है।
शरणार्थी मुद्दा
ब्रू शरणार्थियों का मुद्दा मौजूदा सरकार के लिए मुसीबत बन सकता है। फरवरी के दूसरे सप्ताह से उत्तरी त्रिपुरा जिले के छह राहत शिविरों से 32 हजार ब्रू शरणार्थियों के भौतिक प्रत्यावासन (वापस भेजना) के फैसले को कानूनी कारणों के चलते मूर्त रूप नहीं दिया जा सका। जिन अधिकारियों ने बीते साल त्रिपुरा के शिविरों में सत्यापन किया, उन्होंने इनमें मिजोरम के 5,413 परिवारों के 32 हजार 857 लोगों की पहचान करते हुए इनके भौतिक प्रत्यावासन के लिए कहा था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावित प्रत्यावासन प्रक्रिया को रोकने के आदेश दे दिए थे। 1997 से ब्रू लोग मिजोरम से बाहर बने शिविरों में रह रहे हैं और इसकी वजह ब्रू उग्रवादियों द्वारा वन अधिकारी की हत्या करने के बाद से पैदा हुआ सांप्रदायिक तनाव था।
मिजोरम का राजनीतिक इतिहास
एक पर्वतीय प्रदेश मिजोरम शुरुआत में असम का हिस्सा था। 1972 में यह केंद्र शासित बना। 1986 में भारत सरकार औऱ मिजो नेशनल फ्रंट के बीच हुए ऐतिहासिक समझौते के चलते 20 फरवरी 1987 को इसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिया गया। तब मिजोरम देश का 23वां राज्य बना और इसी साल यहां के पहले चुनाव संपन्न हुए। 40 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में एकसदनीय राज्य विधायिका है। हालांकि 1998 और 2003 का चुनाव मिजो नेशनल फ्रंट ने जीता, लेकिन कांग्रेस 2008 से कांग्रेस यहां पर सत्ता में है और तब से ही मुख्यमंत्री लल थनहवला हैं, जिन्होंने 2008 और 2013 दोनों ही चुनाव जीते। कांग्रेसी नेता 79 वर्षीय लल थनहवला पांच बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं। 2014 में कांग्रेस ने यहां की इकलौती लोकसभा सीट भी जीती थी।
चुनावी इतिहास और प्रमुख राजनेता
2013 के आखिरी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने यहां की 40 में से 34 सीटें जीतीं जबकि एमएनएफ ने केवल पांच। राज्य के सबसे प्रमुख राजनेता निश्चित रूप से ही लल थनहवला ही हैं। हालांकि बीते नवंबर में कोलकाता में जमीन को लेकर वो विवादों में घिर गए थे।
चुनाव को जबर्दस्त ढंग से प्रभावित करने वाले एक कांग्रेसी नेता लैलरोबिआका हैं, जिन्हें लेकर उस वक्त विवाद खड़ा हो गया था जब पता चला कि केवल पांच साल में उनकी संपत्ति 2,406 फीसदी बढ़ गई। इसके अलावा विपक्ष के प्रमुख नेता एमएनएफ के वैनलालजाव्मा हैं। हालांकि 2018 में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारतीय जनता पार्टी जो यहां से अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुकी है, यहां पर कैसा प्रदर्शन करती है।
Updated on:
06 Oct 2018 03:12 pm
Published on:
06 Oct 2018 01:55 pm
