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अजब-गजब—यहां देवियां करती हैं मुर्गे व घोड़े पर सवारी

आपने अब तक देवी की सवारी अधिकतर शेर पर देखी होगी। लेकिन प्रतापगढ़ जिले के मंदिरों में देवी मां की सवारी कोई घोड़े पर है तो कोई मुर्गे पर। नवरात्र में देवी के मंदिरों में लगातार भीड़ उमड़ रही है।

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Rajesh Dixit

Apr 01, 2017

आपने अब तक देवी की सवारी अधिकतर शेर पर देखी होगी। लेकिन प्रतापगढ़ जिले के मंदिरों में देवी मां की सवारी कोई घोड़े पर है तो कोई मुर्गे पर। नवरात्र में देवी के मंदिरों में लगातार भीड़ उमड़ रही है।
जिला मुख्यालय से करीब पच्चीस किलोमीटर दूर मेरियाखेडी में कामेश्वरी माता मुर्गे पर सवारी करती है, तो प्रतापगढ़ में बाणमाता की सवारी घोड़ा है।
आइए आपको दोनों देवियों के बारे में विस्तार से बताते हैं।


मुुर्गे पर सवार कामेश्वरी माता
मेरियाखेड़ी गांव के निकट प्रमुख शक्तिपीठ कामेश्वरी माता मंदिर कई वर्षों पुराना है। यहां कामाता के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर ग्राम पंचायत मुख्यालय से लगभग चार किलोमीटर दूर व जिला मुख्यालय से लगभग 27 किलोमीटर दूर पहाड़ी में है। जहां प्राचीन गुफा मे मंदिर है। इसमें माता की मूॢत विराजित है। यहां नवरात्र में विभिन्न आयोजन होते हैं। साथ ही अष्टमी को हवन का आयोजन किया जाता है। अखंड दीपक लगाया जाता है। कामाता की प्रतिमा मुर्गे पर सवार है। कामाता मंदिर के पास शिवजी की प्रतिमा भी है। जहां बारिश के दिनों में प्राकृतिक जलाभिषेक होता रहता है। इस दौरान यहां मध्यप्रदेश समेत आस पास गांवों के कई श्रद्घालु पहुंचते है। हरियाली अमावस्या को मेला लगता है।

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घोड़ेे पर सवार माता
बाणेश्वरी माता

यूं तो माता शेर पर सवार होती है, लेकिन प्रतापगढ़ के किला परिसर स्थित बाणेश्वरी माता घोड़े पर सवार है। इतना ही नहीं माता के हाथों में धनुष और बाण भी हैं। इसी कारण माता का नाम बाणेश्वरी माता है। सिसोदिया वंश की कुलदेवी होने के साथ ही यहां मंदिर और माता के प्रति लोगों की आस्था भी है। किला परिसर में इस मंदिर का निर्माण १९५५ में तत्कालीन राजमाता ने कराया था। अपने पूर्वजों के साथ चित्तौडग़ढ़ और देवगढ़ से लाई गई माता की प्रतिमा के मूल स्वरूप में ही नई प्रतिमा बनवाकर यहां स्थापित कराई थी, जो घोड़े पर सवार है। माता के कुल ६ हाथ है। इनमें क्रमश: एक हाथ में धनुष, एक हाथ में बाण, एक में खड्ग, एक में ढाल, एक हाथ में घोड़े की लगाम और एक हाथ में राक्षस का मुंड है।
मंदिर पुजारी मोहनलला त्रिवेदी बताते हैं कि यहां स्थापित माता का मूल स्थान चित्तौडग़ढ़ किला स्थित मंदिर में हैं। जहां से राजवंश के परिवार बड़ीसादड़ी और देवगढ़ आए। साथ में कुलदेवी की प्रतिमा भी लाए थे। प्रतापगढ़़ की स्थापना के बाद यहां मंदिर में माता की प्रतिमा स्थापित कराई गई। सन् १९५५ में यहां नया मंदिर बनाया और माता प्रतिमा के मूल स्वरूप में ही प्रतिमा बनवाकर स्थापित कराई गई। यहां दोनों नवरात्र में अनुष्ठान, पूजा, अभिषेक के आयोजन होते हैं। नवरात्र में अखंड दीपक के साथ दुर्गापाठ के आयोजन होते हैं।

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