
पंचायत चुनाव पर सुनवाई फिर टली, हाई कोर्ट में तीसरी बार नहीं हुई सुनवाई (फोटो सोर्स : भाषा WhatsApp News Group)
UP Panchayat Polls Hearing Deferred Again: उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव को समय पर कराए जाने की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक बार फिर सुनवाई टल गई। यह लगातार तीसरी बार है जब इस अहम मामले पर सुनवाई नहीं हो सकी है, जिससे प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर अनिश्चितता और बढ़ गई है।
गुरुवार को इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की डिवीजन बेंच के समक्ष होनी थी, लेकिन किन्हीं कारणों से सुनवाई नहीं हो पाई। इससे पहले भी 25 मार्च और 8 अप्रैल को तय तारीखों पर सुनवाई टल चुकी है।
लगातार सुनवाई टलने से पंचायत चुनाव को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इस बात को लेकर चिंतित हैं कि चुनाव समय पर हो पाएंगे या नहीं। राजनीतिक दलों और स्थानीय प्रतिनिधियों के बीच भी इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है।
इस मामले में 17 मार्च को हुई पिछली सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा था। कोर्ट ने पूछा था कि क्या निर्धारित समय सीमा के भीतर पंचायत चुनाव कराना संभव है या नहीं। कोर्ट ने आयोग से यह भी स्पष्ट करने को कहा था कि ग्राम पंचायत चुनाव 2026 को लेकर क्या तैयारियां की गई हैं और चुनाव कार्यक्रम को लेकर स्थिति क्या है।
इस मामले में याचिकाकर्ता अधिवक्ता इम्तियाज हुसैन ने कोर्ट में दलील दी कि संविधान के अनुच्छेद 243-ई के अनुसार किसी भी पंचायत का कार्यकाल उसकी पहली बैठक की तारीख से अधिकतम पांच वर्ष तक ही हो सकता है। इससे अधिक समय तक पंचायत का कार्यकाल बढ़ाना संविधान के प्रावधानों के खिलाफ है। उन्होंने कोर्ट से मांग की कि जिला पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने से पहले चुनाव प्रक्रिया के लिए एक स्पष्ट और समयबद्ध कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाए।
वहीं, राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से यह दलील दी गई कि पंचायत चुनाव की अधिसूचना जारी करना राज्य सरकार का अधिकार क्षेत्र है। यूपी पंचायत राज अधिनियम 1947 की धारा 12-बीबी के अनुसार, प्रधान के सामान्य चुनाव या उपचुनाव की तिथि तय करने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होती है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अधिसूचना राज्य निर्वाचन आयोग के परामर्श से जारी की जाती है, लेकिन अंतिम निर्णय सरकार के स्तर पर लिया जाता है।
इस मामले में संवैधानिक प्रावधानों को लेकर भी बहस हो रही है। अनुच्छेद 243-ई पंचायतों के कार्यकाल को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश देता है, जिसमें कहा गया है कि पांच साल की अवधि पूरी होने से पहले ही चुनाव प्रक्रिया पूरी कर ली जानी चाहिए। यदि समय पर चुनाव नहीं कराए जाते, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी असर डाल सकता है।
पंचायत चुनाव को लेकर हो रही देरी ने राजनीतिक हलकों में भी हलचल बढ़ा दी है। विपक्षी दल सरकार पर चुनाव टालने का आरोप लगा रहे हैं, जबकि सत्तारूढ़ पक्ष का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया पूरी पारदर्शिता और तैयारी के साथ कराई जाएगी।
पंचायत चुनाव में देरी का सीधा असर ग्रामीण क्षेत्रों पर पड़ता है। पंचायतें स्थानीय विकास कार्यों की जिम्मेदारी निभाती हैं और उनके बिना कई योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं। ऐसे में समय पर चुनाव कराना बेहद जरूरी माना जा रहा है।
अब सभी की नजरें हाई कोर्ट की अगली सुनवाई की तारीख पर टिकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि अगली सुनवाई में इस मामले पर स्पष्ट दिशा मिल सकती है और चुनाव कार्यक्रम को लेकर स्थिति साफ हो सकेगी।
Updated on:
17 Apr 2026, 12:31 AM IST
Published on:
17 Apr 2026, 12:31 AM IST
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