
Partition 1947: बंटवारे 1947 में छूटा घर-बार(photo-patrika)
India Partition 1947 @ताबीर हुसैन: 15 अगस्त 1947 भारत के लिए आजादी का दिन था, लेकिन इसी दिन देश के विभाजन ने करोड़ों लोगों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी। लाखों परिवारों को अपना घर, जमीन-जायदाद और अपनों को छोड़कर नई शुरुआत करनी पड़ी। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर रिलीज हो रही फिल्म ‘बंटवारा 1947’ जहां विभाजन की त्रासदी को पर्दे पर दिखा रही है, वहीं रायपुर में आज भी ऐसे कई परिवार हैं, जिन्होंने इस दर्द को जीकर संघर्ष और सफलता की नई कहानी लिखी।
पाकिस्तान के सिंध प्रांत से सब कुछ गंवाकर रायपुर पहुंचे नचरानी, ग्वालानी और छुगानी परिवार केवल शरणार्थी नहीं बने, बल्कि अपनी मेहनत, ईमानदारी और संघर्ष से छत्तीसगढ़ के उद्योग, साहित्य, समाज सेवा और बुनियादी ढांचे में अमिट योगदान दिया। इनकी कहानी बताती है कि सरहदें जमीन बांट सकती हैं, लेकिन इंसान के हौसले नहीं।
नचरानी परिवार की कहानी विभाजन के दर्द और साहस का जीवंत उदाहरण है। परिवार के सदस्य अनिल नचरानी बताते हैं कि विभाजन के दौरान सिंध में उनके दादाजी का निधन हो गया था। ऐसे कठिन समय में उनकी दादी ने चार-पांच छोटे बच्चों को साथ लेकर कराची से स्टीमर के जरिए मुंबई का सफर तय किया।
देवलाली शरणार्थी शिविर में कई मुश्किलें झेलने के बाद परिवार रायपुर पहुंचा और माना कैंप में नई जिंदगी शुरू की। शुरुआत कपड़ों के छोटे व्यापार से हुई, लेकिन स्वर्गीय मोहनलाल नचरानी की मेहनत और ईमानदारी ने इस छोटे कारोबार को आगे बढ़ाकर छत्तीसगढ़ की स्टील इंडस्ट्री की मजबूत पहचान बना दिया। आज नचरानी परिवार का सफर शून्य से सफलता तक पहुंचने की प्रेरक मिसाल माना जाता है।
ग्वालानी परिवार की कहानी भी विभाजन की पीड़ा और साहस से भरी हुई है। शिव ग्वालानी बताते हैं कि दंगों और हिंसा के डर के बीच उनके पिता स्वर्गीय साजनमल ग्वालानी अपने परिवार के साथ बेटियों को कंबलों में छिपाकर वाघा बॉर्डर पार कर भारत पहुंचे। रायपुर आने के बाद बलौदाबाजार के पलारी गांव में एक जमींदार ने परिवार को शरण और जमीन दी। परिवार ने साइकिल पंचर की दुकान, छोटे होटल और कपड़े के व्यवसाय से नई शुरुआत की।
आगे चलकर शिव ग्वालानी ने वकालत की पढ़ाई की और व्यवसाय में सफलता हासिल की। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘मास्टर ऑफ एवरीथिंग’ में विभाजन की पीड़ा को शब्द दिए। उनकी इस रचना से प्रभावित होकर जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला भी उनसे मिलने पहुंचे थे। आज परिवार की नई पीढ़ी डॉक्टर, वैज्ञानिक और चार्टर्ड अकाउंटेंट बनकर देश-विदेश में अपनी पहचान बना रही है।
छुगानी परिवार की कहानी भी प्रेरणा से कम नहीं है। सतीश छुगानी बताते हैं कि विभाजन के समय उनके पिता स्वर्गीय कन्हैयालाल छुगानी केवल 15 महीने के थे। उनके दादा स्वर्गीय मंगतराम छुगानी, जो सिंध के प्रतिष्ठित व्यापारी थे, सब कुछ छोड़कर पहले भोपाल और फिर रायपुर पहुंचे। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद कन्हैयालाल छुगानी ने 1968 में तत्कालीन जीईसी (वर्तमान एनआईटी रायपुर) से इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर परिवार के पहले इंजीनियर बनने का गौरव हासिल किया।
बाद में उन्होंने खेती और सामाजिक कार्यों को भी अपनाया तथा सरपंच के रूप में सेवाएं दीं। उनके योगदान से रायपुर के कई प्रमुख निर्माण कार्यों को नई पहचान मिली। मेकाहारा अस्पताल, घड़ी चौक, शहीद स्मारक, जगन्नाथ मंदिर, आरएसएस मुख्यालय और राम मंदिर जैसे महत्वपूर्ण निर्माणों में उनकी ईंटों और योगदान की अहम भूमिका रही।
इन तीनों परिवारों की कहानियां यह साबित करती हैं कि विभाजन ने भले ही उनसे उनका घर और संपत्ति छीन ली, लेकिन उनके आत्मविश्वास और मेहनत को कभी नहीं तोड़ पाया। शरणार्थी शिविरों से निकलकर उन्होंने न केवल अपने परिवारों का भविष्य संवारा, बल्कि छत्तीसगढ़ के औद्योगिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और बुनियादी विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज विभाजन त्रासदी दिवस पर ये परिवार सिर्फ इतिहास की याद नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए संघर्ष, आत्मविश्वास और राष्ट्र निर्माण की जीवंत प्रेरणा हैं।
Updated on:
14 Aug 2026 09:36 am
Published on:
14 Aug 2026 09:36 am
