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Chamki Bukhar: चमकी बुखार से छत्तीसगढ़ में दहशत, रायपुर के बाजारों से लीची गायब

Chamki Bukhar: चमकी बुखार के लिए लीची को जिम्मेदार बताए जाने की चर्चा के बाद रायपुर में लीची की आवक लगभग बंद हो चुकी है।

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chamki bukhar lychee

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रायपुर. चमकी बुखार (Chamki Bukhar) के लिए लीची (lychees) को जिम्मेदार बताए जाने की चर्चा के बाद छत्तीसगढ़ में इसके व्यापार पर असर देखा जा रहा है। राजधानी रायपुर में थोक और चिल्हर बाजारों में लीची की आवक लगभग बंद हो चुकी है।

लीची की वजह से चमकी बुखार (Chamki Fever) यानी एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम (Acute Encephalitis Syndrome) होने की बात सोशल मीडिया में फैलने के बाद लोगों में डर बना हुआ है। शहर के थोक और चिल्हर फल कारोबारियों का कहना है कि डिमांड में कमी आने की वजह से बाजार में अब लीची देखने को नहीं मिल रहा है।

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एक महीने पहले बाजार में लीची प्रति किलो 150 से 200 रुपए में बिक रहा था। थोक फल बाजार लालपुर के कारोबारियों ने बताया कि लीची की सप्लाई बिहार और झारखंड से ट्रेन मार्ग के जरिए होती है। रायपुर में लीची का कोई बड़ा थोक कारोबारी नहीं है।

बाहर से आने वाला लीची यहां चिल्हर कारोबारियों के बीच बिकता है। चिल्हर कारोबारियों ने बताया कि एक महीने पहले प्रतिदिन लगभग 15 से 20 कार्टून लीची की सप्लाई होती थी, जो अब बंद हो चुकी है। ठेले वाले भी लीची बेचने से पीछे हट रहे हैं।

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कुपोषण पर नियंत्रण किया
छत्तीसगढ़ के लीची उत्पादन करने वाले इलाकों में किसी संक्रमण के न पनपने के पीछे एक बड़ी वजह यह भी है कि राज्य में कुपोषण से निपटने के लिए लगातार गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। गौरतलब है कि बिहार के मुजफ्फरपुर में बच्चों के कुपोषण को इन्सेफेलाइटिस (AES) के संक्रमण की बड़ी वजह माना जा रहा है।

हाल के वर्षों में छत्तीसगढ़ में गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की संख्या में तेजी से कमी आई है। गौरतलब है कि जशपुर में कुपोषण की दर 43 फीसदी थी, जो अब घटकर 27 फीसदी पर आ गई है। स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जशपुर में संस्थागत प्रसव में भी जशपुर ने कीर्तिमान बनाया है यहाँ संस्थागत प्रसव 58 फीसदी था, जो आज बढ़कर 97 फीसदी हो गया है।

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उधर जशपुर के किसान लीची से मालामाल
छत्तीसगढ़ के जशपुर में किसान लीची की शाही नस्ल की खेती सर्वाधिक करते हैं। जशपुर के किसान समर्थ जैन जो लाखों की नौकरी छोड़कर खेती कर रहे हैं, बताते हैं कि जशपुर के अलावा सूरजपुर और आसपास के जिलों के किसान लीची को उगाने में पेस्टीसाइट और इंसेक्टिसाइट का इस्तेमाल न के बराबर करते हैं। समूचे जशपुर में लीची की जैविक खेती की जा रही है।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा , जशपुर, बलरामपुर, सूरजपुर, रायगढ़, कोरबा, नारायणपुर और कोरिया में शाही लीची की खेती हो रही है। अकेले जशपुर जिले में करीब 1 हजार हेक्टेयर में किसान लीची उत्पादन में लगे हैं। इससे करीब 4 से 5 करोड़ रुपए तक का उत्पादन होता है। जिले में लीची के लगभग 150 से अधिक बड़े किसान हैं। जो एक हेक्टेयर से लेकर 7 हेक्टेयर तक का बागान लगाए हुए हैं। सीजन में इन्हें 8 से 10 लाख की आमदनी होती है।

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डिमांड खत्म हो चुकी है
लालपुर थोक फल बाजार के अध्यक्ष विजय चौधरी ने बताया कि थोक बाजार में लीची की आवक नहीं है। बिहार, झारखंड से आने के बाद यह चिल्हर कारोबारियों के बीच बंट जाता है। अभी बाजार में डिमांड लगभग खत्म हो चुकी है।

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