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Drug Supply Dispute: पैरासिटामोल से एंटीबायोटिक तक विवाद! छत्तीसगढ़ में 190 करोड़ की दवा खरीद जांच के घेरे में

Medicine Procurement: छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कार्पोरेशन (CGMSC) की 190 करोड़ रुपये की दवा खरीदी विवादों में है। अमानक पैरासिटामोल के चार बैच मिलने के बाद 9एम इंडिया को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया।
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Drug Supply Dispute

छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कार्पोरेशन का फैसला (photo source- Patrika)

Drug Supply Dispute: छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कार्पोरेशन (CGMSC) की करीब 190 करोड़ रुपये की दवा खरीदी एक बार फिर सवालों के घेरे में है। मामला पैरासिटामोल 500 एमजी के उन चार बैचों से जुड़ा है, जिन्हें लैब जांच में अमानक (Not of Standard Quality) घोषित किए जाने के बाद कार्रवाई शुरू की गई थी। हालांकि, बाद में आपूर्तिकर्ता कंपनी 9एम इंडिया के जवाब को स्वीकार करते हुए प्रस्तावित दंडात्मक कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाई गई। इस फैसले पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

Chhattisgarh Health Department: कारण बताओ नोटिस के बाद भी नहीं हुई कार्रवाई

CGMSC ने अमानक घोषित पैरासिटामोल के चार बैचों को लेकर 9एम इंडिया को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। नोटिस में कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने और उसकी सुरक्षा निधि (FDR) जब्त करने का प्रस्ताव रखा गया था। लेकिन उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, कंपनी का जवाब मिलने के बाद निगम ने प्रस्तावित कार्रवाई को आगे नहीं बढ़ाया। आरोप है कि इस फैसले से कंपनी ब्लैकलिस्टिंग, अनुबंध के तहत लगने वाली आर्थिक पेनाल्टी और पूरी खेप बदलने की वित्तीय जिम्मेदारी से बच गई।

कंपनी के जवाब में विरोधाभास

इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू कंपनी के जवाब में सामने आया विरोधाभास है। कंपनी ने अपने लिखित जवाब में एक ओर दावा किया कि संबंधित दवाएं पूरी तरह गुणवत्ता मानकों के अनुरूप थीं और जांच रिपोर्ट विश्वसनीय नहीं है क्योंकि उसमें निर्माता का नाम और बैच नंबर स्पष्ट नहीं हैं। वहीं दूसरी ओर कंपनी ने यह भी स्वीकार किया कि शिकायत वाले बैचों को बदलकर नई खेप की आपूर्ति की गई। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि दवा पूरी तरह मानक के अनुरूप थी तो फिर विवादित बैचों को बदलने की जरूरत क्यों पड़ी? यही प्रश्न पूरे मामले को संदेह के घेरे में खड़ा करता है।

रिकॉर्ड में दर्ज थे बैच नंबर

दस्तावेजों के अनुसार, CGMSC द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस में संबंधित बैच नंबर और निर्माता का स्पष्ट उल्लेख किया गया था। कार्पोरेशन की प्रक्रिया के तहत दवाओं के सैंपल परीक्षण के लिए प्रयोगशालाओं को निर्माता का नाम छिपाकर भेजे जाते हैं, ताकि जांच निष्पक्ष हो सके। इसके बावजूद कंपनी ने दावा किया कि नोटिस में जिन बैचों का उल्लेख है, वे उसके नहीं हैं। हालांकि बाद में उन्हीं बैचों को बदलकर दोबारा आपूर्ति किए जाने के रिकॉर्ड भी सामने आए हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब रिकॉर्ड में बैच नंबर और निर्माता स्पष्ट थे तो कंपनी का दावा किस आधार पर स्वीकार किया गया।

अन्य दवाओं पर भी उठे सवाल

मामला केवल पैरासिटामोल तक सीमित नहीं रहा। बाद में मल्टी विटामिन कैप्सूल, डाइसाइक्लोमाइन टैबलेट और एंटीबायोटिक इंजेक्शन के कुछ संदिग्ध बैचों का वितरण भी रोकना पड़ा। इससे सरकारी अस्पतालों में सप्लाई होने वाली दवाओं की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।

अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल

जिस अवधि में यह निर्णय लिया गया, उस दौरान CGMSC के प्रबंध संचालक रीतेश अग्रवाल, जीएम (टेक्निकल) पंकज उपाध्याय और एफएसओ प्रेमेश्वर देवांगन संबंधित प्रक्रिया से जुड़े अधिकारी थे। ऐसे में इस पूरे प्रकरण में उनके निर्णय और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

Government Procurement: नियम क्या कहते हैं?

CGMSC की निविदा शर्तों के अनुसार यदि किसी दवा का बैच लैब जांच में "Not of Standard Quality (NSQ)" पाया जाता है, तो

  • संबंधित बैच को 60 दिनों के भीतर पूरी मात्रा में बदलना अनिवार्य है।
  • कंपनी पर 20 प्रतिशत तक आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।
  • यदि किसी दवा के तीन बैच अमानक पाए जाते हैं, तो संबंधित दवा की आपूर्ति के लिए कंपनी को तीन वर्ष तक ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है।
  • साथ ही कंपनी की सुरक्षा निधि (FDR) जब्त करने का भी प्रावधान है।

अब उठ रहे हैं ये बड़े सवाल

इस पूरे मामले के बाद कई महत्वपूर्ण सवाल सामने आ रहे हैं—

  • यदि कंपनी के अनुसार दवा मानक के अनुरूप थी, तो बैच बदलने की जरूरत क्यों पड़ी?
  • जब CGMSC के रिकॉर्ड में निर्माता और बैच नंबर दर्ज थे, तो कंपनी के इनकार को किस आधार पर स्वीकार किया गया?
  • प्रस्तावित ब्लैकलिस्टिंग और आर्थिक दंड की कार्रवाई आखिर क्यों रोक दी गई?
  • क्या पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाएगी?

करीब 190 करोड़ रुपये की दवा खरीदी से जुड़े इस मामले ने सरकारी खरीद प्रक्रिया, गुणवत्ता नियंत्रण और प्रशासनिक निर्णयों की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब निगाहें इस बात पर हैं कि सरकार और संबंधित एजेंसियां इस मामले में आगे क्या कदम उठाती हैं।