
दवाओं की एमआरपी में बड़ा खेल (फोटो सोर्स- AI)
रायपुर@पीलूराम साहू। Medicine Price Manipulation: केवल एंटी कैंसर ही नहीं, बल्कि जीवनरक्षक और आम दवाओं में भी दवा विक्रेता 10 से 20 गुना तक मोटी कमाई कर रहे हैं। केंद्र सरकार केवल शेड्यूल दवाओं की कीमतें नियंत्रित करती है, जबकि नॉन शेड्यूल दवाओं पर ऐसा कोई नियंत्रण नहीं है। यही कारण है कि दवा कंपनियां बड़े अस्पतालों और मेडिकल स्टोर संचालकों के इशारों पर मनमानी कीमत प्रिंट कर रही हैं। इसका सीधा नुकसान आम मरीजों को हो रहा है और भारी छूट मिलने के दावे के बावजूद लोगों की जेब खाली हो रही है।
दवाओं के मुनाफे का मार्जिन अधिकतम 30 फीसदी तक सीमित रखने की सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद प्रदेश का ड्रग विभाग मेडिकल स्टोर्स और अस्पतालों की जांच कर रहा है। शुरुआती पड़ताल में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। परचेस ऑर्डर और सेल रेट के मिलान में पाया गया कि कई दवाओं पर 50 गुना तक मुनाफा कमाया जा रहा है।
प्रदेश के श्री धन्वंतरी मेडिकल स्टोर्स में दवाओं पर 72 फीसदी छूट के बावजूद ये काफी महंगी पड़ रही हैं। गैस की दवा पेंटाप्राजोल 57 रुपए, दर्द की डायक्लोफेनेक 56 रुपए और एंटी-एलर्जिक मोंटेलुकास्ट 70 रुपए में मिल रही है। यही दवाइयां रेडक्रॉस मेडिकल स्टोर में क्रमशः 15, 20 और 25 रुपए में उपलब्ध हैं। असल में जेनेरिक दवाओं पर जानबूझकर अत्यधिक एमआरपी प्रिंट कराई जा रही है, ताकि 72 प्रतिशत डिस्काउंट दिखाने के बाद भी मोटा मुनाफा कमाया जा सके।
रायपुर के कई मेडिकल स्टोर संचालक जेनेरिक और ब्रांडेड दवाएं एक साथ बेच रहे हैं। आम ग्राहक तो दूर, पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी दोनों का अंतर नहीं समझ पाता। बिल को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि जेनेरिक पर 72 प्रतिशत और ब्रांडेड पर महज 10 प्रतिशत छूट दी जाती है। आमतौर पर लोग ज्यादा छूट वाली दवा को ही सस्ता समझकर खरीद लेते हैं, जबकि असल खेल एमआरपी का होता है।
दवा का नाम - सरकारी सप्लाई दर - बाजार बिक्री दर
डॉ. विवेक चौधरी, डीन व सीनियर कैंसर रोग विशेषज्ञ नेहरू मेडिकल कॉलेज के मुताबिक, इसमें कोई संदेह नहीं है कि कैंसर समेत अन्य दवाइयों का प्रिंट मूल्य काफी अधिक होता है। ज्यादा मुनाफा के लिए मनमर्जी से एमआरपी की छूट नहीं दी जानी चाहिए। शेड्यूल दवाओं पर केंद्र सरकार प्राइज कंट्रोल करती है, लेकिन नॉन शेड्यूल दवाओं पर भी मनमानी नहीं होनी चाहिए।
डॉ. एसपी धनेरिया, सीनियर फार्माकोलॉजिस्ट व रिटायर्ड डीन एम्स के मुताबिक, जेनेरिक व ब्रांडेड दवाएं समान असर करती हैं। हालांकि कई डॉक्टर मरीजों को बरगलाते हैं कि जेनेरिक असर नहीं करतीं। दोनों दवाओं में समान कंटेंट होते हैं इसलिए उनकी क्वालिटी पर संदेह करना सही नहीं है। जेनेरिक दवाएं प्रचार-प्रसार व विज्ञापन पर खर्च नहीं करतीं इसलिए सस्ती होती है।
Updated on:
17 Oct 2026 08:16 am
Published on:
17 Oct 2026 08:16 am
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