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लाल आतंक: 2008 के विधानसभा चुनाव के पहले और बाद में मारे गए सबसे ज्यादा जवान और जनता

छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा का दौर रुकने का नाम नहीं ले रहा है अब तक सुरक्षित और शांतिपूर्ण मतदान को लेकर केंद्र और राज्य सरकार की तमाम कोशिशें नाकाम साबित हुई है ।

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CG Election 2018

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रायपुर. छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा का दौर रुकने का नाम नहीं ले रहा है अब तक सुरक्षित और शांतिपूर्ण मतदान को लेकर केंद्र और राज्य सरकार की तमाम कोशिशें नाकाम साबित हुई है । हमने टटोलने की कोशिश करी कि छत्तीसगढ़ के अस्तित्व में आने के बाद चुनावों के दौरान माओवादी चुनावों के दौरान किस तरह से वारदातें कर रहे है। सुरक्षा बल क्या चुनावी वर्ष में साफ्ट मोड में आ जाते हैं? यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि कम मत फीसद से कैसे निपटा जाए? इन्ही सवालों के जवाब को तलाशती हुई एक रिपोर्ट...

छत्तीसगढ़ के बस्तर में महज एक सप्ताह के भीतर दो अलग अलग माओवादी वारदात में 6 जवानों और एक मीडियाकर्मी की मौत हुई है। शहीद जवानों में चार सीआरपीएफ और दो छत्तीसगढ़ पुलिस के हैं, वहीँ मीडियाकर्मी दूरदर्शन का था। चुनावी साल में अलग अलग हुई माओवादी वारदात में राज्य में अब तक 45 आम नागरिकों और 49 जवानों की मौत हो चुकी है।

प्रथम चरण के चुनाव में अब जबकि महज 11 दिन का समय शेष है यह सवाल बार बार उठ रहा है कि क्या मौजूदा हालत में बस्तर में चुनाव कराना सुरक्षा बलों के लिए आसान होगा? क्या आम मतदाता बेख़ौफ़ मतदान कर सकेंगे जब उन्हें अँगुलियों पर चुनावी स्याही लगने से भी डर लग रहा हो? इन सवालों का जवाब हमें मंगलवार को घटी घटना के बाद दंतेवाड़ा के एसपी अभिषेक पल्लव के उन आंसुओं से मिलता है जो एक टीवी चैनल से बात करते हुए छलक पड़े। सच यह है सुरक्षा बल और पुलिस डटकर मुकाबला करने के बावजूद इन चुनावों के दौरान गहरे मनोवैज्ञानिक दबाव में हैं।

तीन चुनावी वर्षों में 427 मौतें
माओवादी मामलों के विशेषज्ञ कैप्टन आलोक बंसल कहते हैं यह निस्संदेह मुश्किल है। हम उन जवानों को अबूझमाड़ के जंगलों में भेज रहे हैं जिनको इस किस्म के जंगलात में काम करने का पहले से कोई अनुभव नहीं है। वो कहते हैं कि चुनावों के दौरान स्थानीय पुलिस को ही एरिया डोमिनेशन में लगाना सुरक्षित होगा।

अगर हम इतिहास में झाँक कर देखे तो पता चलता है कि छत्तीसगढ़ में अब तक संपन्न हुए चुनाव में 2008 के चुनाव सबसे खतरनाक साबित हुए थे। उस चुनावी वर्ष में माओवादियों ने समूचे छत्तीसगढ़ में जमकर कहर बरपाया था। अकेले 2008 में राज्य में अलग अलग कुल 620 छोटी बड़ी माओवादी वारदात हुई थी जिनमे 157 नागरिक और 85 जवान मारे गए थे ।

अब दस साल बाद माओवादी वारदातों में कमी जरुर आई है लेकिन सुरक्षा बलों के जवान और आम नागरिकों की मौत का औसत बढ़ा है । माओवादियों ने हर चुनावों की तरह इस बार भी विधानसभा चुनाव के विरोध करने की घोषणा करी है ।

चुनावी वर्ष में कम मारे जाते हैं माओवादी
माओवादियों के लिए चुनाव एक अवसर है जिसमे वो अपनी ताकत की जोर आजमाइश कर सकते हैं। बीएसएफ़ के पूर्व डीजी प्रकाश सिंह कहते हैं ऐसे अवसरों का इस्तेमाल करके वो यह जताने की कोशिश करते हैं कि हम पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुए हैं, हमारा अस्तित्व अभी है। वो कहते हैं कि अगर माओवादी वारदात न करें तो उन्हें पूछने वाला कोई न होगा। यह बात चौंका देने वाली मगर सच है कि चुनावी वर्षों की तुलना में उस वक्त माओवादियों ज्यादा मारे जाते है जब सरकार राज चल रहा होता है। यही 2008 के बाद हुआ यही 2003 के बाद और अब यही 2013 के बाद होता नजर आ रहा है । मतलब साफ़ है कि चुनावी वर्षों में सुरक्षा बल भी फूंक फूंक कर कदम उठा रहे होते हैं ।

कम मतदान प्रतिशत से कैसे हो मुकाबला
माओवादी जिलों में कम मत प्रतिशत एक महत्वपूर्ण विषय है। ग्रामीणों आदिवासियों की शिकायत रही है कि अगर वो मतदान करते हैं तो उनकी अंगुली में स्याही देखकर माओवादी उन्हें सजा देते हैं । अगर वो वोटिंग नहीं करते हैं तो सुरक्षा बल उनके साथ जबरदस्ती करते हैं । गौरतलब है कि 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजापुर में 44.96 और कोंटा में 48.36 और दंतेवाड़ा में 61.93 फीसदी मतदान हुआ था इसकी वजह केवल माओवादी दहशत ही थी ।

इस बार माओवाद प्रभावित जिलों के अधिकारियों ने आम नागरिकों की सुरक्षा का हलावा देकर आयोग से मांग कर थी कि माओवाद प्रभावित इलाकों में आम नागरिकों को अमिट स्याही न लगाने की छूट दी जाए लेकिन केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने ऐसी किसी छूट से इनकार कर दिया है। अब जबकि माओवादी क्षेत्रों में एक के बाद एक वारदातें हो रही है यह साफ़ नजर आने लगा है कि इस बार भी बहुत ज्यादा वोट नहीं पडऩे वाले हैं। वोटिंग ज्यादा हो उसके लिए जनता में आत्मविश्वास होना जरुरी है जो कि लगातार हो रही वारदातों की वजह से नदारद है।

पूर्व डीजी बीएसएफ प्रकाश सिंह ने कहा - जनता और नेताओं को माओवादियों की आदत पड़ चुकी है, जनता जानती है कि वो हर चुनाव में वोट न डालने की धमकी देंगे। नेता जानते हैं कि उन्हें जनता से वोट कैसे लेना है अब यह दोनो मिलकर काम करेंगे तो सारे खतरे नाकाम हो जाएंगे।

सुरक्षा विशेषज्ञ कैप्टेन आलोक बंसल ने कहा - माओवादियों को पता है कि जनता जब मतदान करने लगेगी उनका खौफ ख़त्म हो जाएगा। इसलिए वह ऐसी वारदातें कर रहे हैं। वारदातें करने का मतलब केवल सुरक्षा तंत्र को ही नहीं जनता को भी भयभीत करने की एक कोशिश है।