
पद्मश्री स्वामी भारती बंधु (फोटो सोर्स- पत्रिका)
Kabir Jayanti 2026: 29 जून को देशभर में संत कबीर दास जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जा रही है। छत्तीसगढ़ में कबीरपंथ के अनुयायियों की एक बड़ी तादाद है और उनके मुख्य राष्ट्रीय गढ़ दामाखेड़ा (स्थापना 1903) में इस मौके पर विशेष उल्लास है। कबीर की बेबाक वाणी को अपनी विशिष्ट गायकी से देश-विदेश तक पहुंचाने वाले छत्तीसगढ़ के गौरव और पद्मश्री से सम्मानित स्वामी भारती बंधु ने 'पत्रिका' से कबीर दर्शन, नई पीढ़ी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और आज के दौर में मानवता के सामने खड़ी चुनौतियों पर बेबाकी से अपने विचार साझा किए।
सवाल: आपने किस उम्र से गायन शुरू किया और इस उम्र में भी आपकी आवाज 25 साल के युवा जैसी कैसे बनी रहती है?
जवाब: मैंने महज सात साल की उम्र से गाना शुरू किया था। आज उम्र के इस पड़ाव पर भी जब मैं मंच पर गाता हूं और शरीर नहीं थकता, तो उसका एक ही राज है- रियाज। मैं आज भी उतनी ही श्रद्धा से रोज रियाज करता हूं। गला भी साधना पड़ता है और शरीर भी। संगीत केवल कला नहीं, एक कठिन साधना है।
सवाल: आपके दादाजी और पिताजी के दौर के संगीत माहौल और आज के दौर में आपको क्या बुनियादी बदलाव नजर आता है?
जवाब: बदलाव बहुत बड़ा आया है। पहले मेरे पिताजी के दौर में भक्ति संगीत केवल मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित था। लेकिन हमने तय किया कि कबीर की वाणी सिर्फ मंदिरों तक ही क्यों रहे? वह तो पूरे समाज के लिए है। इसलिए जहाँ से भी बुलावा आता है, वहाँ जाकर कबीर का संदेश सुनाते हैं। कबीर किसी एक वर्ग के नहीं, पूरी मानवता के संत हैं।
सवाल: छत्तीसगढ़ की 'बोरे-बासी' वाली सादगी और सहज जीवनशैली में कबीर का दर्शन कितना घुला-मिला नजर आता है?
जवाब: बिल्कुल दिखाई देता है। कबीर साहब ने हमेशा सादगी, संतोष और सरल जीवन का संदेश दिया है। वे कहते हैं- "देख पराई चुपड़ी मत ललचावे जी। रूखी-सूखी खाय के, ठंडा पानी पी।।" यानी जो है, उसमें आनंद से जीना सीखिए। दूसरों के सुख को देखकर लालच मत कीजिए। यही जीवन का सबसे बड़ा सुख है।
सवाल: दामाखेड़ा और कबीर जयंती से जुड़ा आपका कोई ऐसा संस्मरण, जिसने आपके भीतर के कलाकार को एक नया जन्म दिया हो?
जवाब: बसंत जागर के दौरान वरिष्ठ रंगकर्मियों और विद्वानों से मिलने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ में कबीर की समृद्ध परंपरा है, बस उसे संजोने की जरूरत है। उनकी यह बात मेरे जीवन का टर्निंग प्वाइंट बन गई। इसके बाद मैंने गांव-गांव जाकर पुराने निर्गुण गायक, बुजुर्ग कलाकारों और संतों से मुलाकात की। उनसे कबीर की वाणी सीखी, उसके अर्थ समझे और पुरानी गायकी को संकलित किया। आज भी 40-50 साल पुराने दुर्लभ दस्तावेज संभालकर रखे हैं, जिन्हें मैं अपनी सबसे बड़ी पूंजी मानता हूं।
सवाल: छत्तीसगढ़ी कबीर गायन में सूफी अंदाज और कव्वाली का यह अनूठा 'फ्यूजन' करने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?
जवाब: मुझे लगा कि कबीर केवल विद्वानों तक सीमित नहीं रहने चाहिए। आम आदमी भी उन्हें समझ सके। इसलिए हमने कबीर के पदों के साथ लोक, सूफी, शास्त्रीय संगीत और शायरी का संतुलित प्रयोग किया। हर रचना पर विद्वानों से चर्चा की, बार-बार सुधार किया। इसी तरह धीरे-धीरे 'भारती बंधु शैली' विकसित हुई, जिसे आज रिक्शा चलाने वाले से लेकर हवाई जहाज में सफर करने वाला व्यक्ति भी अपनापन महसूस करता है।
सवाल: कबीरपंथ के गढ़ छत्तीसगढ़ में जब आप कबीरपंथियों के बीच गाते हैं, तो उस आध्यात्मिक और अलौकिक अनुभव को आप कैसे बयां करेंगे?
जवाब: जब किसी श्रोता की आंखों में आँसू आ जाएं या वह आनंद में झूम उठे, वही कलाकार की सबसे बड़ी सफलता होती है। आज दुनिया में जिस तरह हिंसा, नफरत और अशांति बढ़ रही है, ऐसे समय में मुझे लगता है कि विश्व शांति और मानव कल्याण के लिए कबीर की वाणी पहले से कहीं ज्यादा जरूरी है।
सवाल: आपने देश ही नहीं, विदेशों में भी कबीर की वाणी सुनाई है। वहाँ के लोगों का अनुभव कैसा रहा?
जवाब: बहुत ही अच्छा अनुभव रहा। मॉरीशस, अफ्रीका, रूस सहित कई देशों में लंबे समय तक कार्यक्रम किए। भाषा अलग थी, संस्कृति अलग थी, लेकिन कबीर का संदेश सबके दिल तक पहुँचा। यही कबीर की सबसे बड़ी ताकत है कि वे किसी एक धर्म, भाषा या देश तक सीमित नहीं हैं। उनकी वाणी पूरी मानवता के लिए है।
सवाल: कबीर बहुत बेबाक थे। आज के दौर में, जहां लोग बहुत जल्दी आहत हो जाते हैं, मंच से कबीर की उस बेबाकी को गाना कितना चुनौतीपूर्ण होता है? क्या कभी विरोध का सामना करना पड़ा?
जवाब: बिल्कुल चुनौतीपूर्ण है। आज भी कई बार लोग सवाल उठाते हैं और विरोध भी करते हैं। लेकिन मुझे बुरा नहीं लगता। इन सबकी दवा सत्य और तर्क हैं। मेरा मानना है कि यदि आपकी बात सच्ची है और आपके पास तर्क है, तो हर सवाल का जवाब दिया जा सकता है। विरोध से कभी डरना नहीं चाहिए।
सवाल: आज क्या समाज में वही मानवता दिखाई देती है जिसकी बात कबीर करते थे?
जवाब: प्रयास हो रहे हैं और होने भी चाहिए। मैं एक उदाहरण देता हूं। हाल ही में मैंने देखा कि कुछ बच्चे नीट (NEET) परीक्षा देने गए थे। वहां रहने की व्यवस्था नहीं थी। आसपास की मस्जिद ने अपने दरवाजे खोल दिए। बच्चों और उनके परिवारों को ठहराया, भोजन कराया। यही तो मानवता है। अच्छे काम की खुलकर सराहना होनी चाहिए। अगर हर व्यक्ति एक कदम आगे बढ़ाए, तो समाज में नफरत की जगह प्रेम बढ़ेगा।
सवाल: अगर आज कबीर साहब इस डिजिटल दुनिया को देखते, तो उनका पहला दोहा क्या होता और आज के इंसान के लिए उनका सबसे जरूरी संदेश क्या है?
जवाब: डिजिटल आज के समय की जरूरत है। मैं इसका विरोध नहीं करता। लेकिन डिजिटल केवल जानकारी दे सकता है, ज्ञान नहीं। ज्ञान के लिए सद्गुरु की शरण में जाना ही पड़ेगा। कबीर साहब कहते हैं- "कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ति न होय। भक्ति करे कोई सूरमा, जाति-बरन कुल खोय।।" आज सोशल मीडिया पर जानकारी बहुत है, लेकिन आत्मिक शांति नहीं है। सच्चा ज्ञान पाने के लिए किसी संत, महात्मा या सद्गुरु की शरण में जाना ही होगा।
सवाल: आज के एआई (AI) के दौर में, क्या तकनीक कभी उस 'रूहानियत' और 'अहसास' की जगह ले सकती है जो एक कलाकार मंच पर जीता है?
जवाब: AI सहयोग कर सकता है, लेकिन मंच पर गाते हुए कलाकार की भावनाएं, आंखों के आँसू और श्रोताओं से जुड़ाव कभी नहीं दे सकता। तकनीक की अपनी सीमा है, भावनाओं की नहीं। कबीर साहब ने कहा है- "आग लगे आकाश में, झर-झर गिरे अंगार। संत न होते जगत में, जल जाता संसार।।" यही संतों की वाणी और मानवीय संवेदना संसार को बचाए रखती है।
सवाल: आपके जीवन की ऐसी कौन-सी घटना रही, जिसने आपको अंदर से पूरी तरह झकझोर दिया?
जवाब: हमारे परिवार में पीढ़ियों से भक्ति संगीत की परंपरा रही है। हम लोगों ने कबीर गायकी को नए प्रयोगों के साथ जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया। संघर्ष के दौरान कई घटनाएँ हुईं। एक बार चंडीगढ़ से लौटते समय फ्लाइट रद्द हो गई। फिर सड़क मार्ग से लौटते समय ड्राइवर को मिर्गी का दौरा पड़ गया। संयोग से हमने गाड़ी संभाल ली और बड़ी दुर्घटना टल गई। ऐसे अनगिनत संघर्षों ने सिखाया कि बिना संघर्ष सफलता की कीमत नहीं समझ आती।
सवाल: पद्मश्री मिलने के बाद भी आपकी सादगी वैसी ही है। सफलता और ग्लैमर के पीछे भागती युवा पीढ़ी को आप 'जड़ों से जुड़े रहने' का क्या मंत्र देंगे?
जवाब: कामयाबी पाने के लिए दो चीजें सबसे जरूरी हैं- नम्रता और सब्र। आज कई युवा थोड़ी-सी सफलता मिलते ही बदल जाते हैं। उनका व्यवहार बदल जाता है, बात करने का तरीका बदल जाता है और कई बार वे सामने वाले का सम्मान करना भी भूल जाते हैं। अपनी जड़ों और बड़ों के सम्मान को कभी नहीं छोड़ना चाहिए।
सवाल: अगर आज कबीर साहब सामने आ जाएं, तो उनसे क्या वरदान मांगेंगे?
जवाब: बस यही कि उन्होंने जिस मार्ग पर मुझे चलाया है, जीवन के अंतिम क्षण तक उसी मार्ग पर बनाए रखें। और जब इस संसार से विदा होऊं, तब मेरी जुबान पर केवल सद्गुरु और ईश्वर का नाम हो।
सवाल: गायन के अलावा खाली समय में क्या करना पसंद करते हैं?
जवाब: परिवार के साथ समय बिताना, हंसी-मजाक करना और बिल्कुल सामान्य जीवन जीना मुझे सबसे अच्छा लगता है।
सवाल: छत्तीसगढ़ की कौन-सी जगह आपको सबसे ज्यादा पसंद है?
जवाब: बस्तर। इसके पीछे एक भावनात्मक कारण भी है। मेरे पूर्वज बस्तर के थे। मेरे पिताजी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। आजादी के बाद वे रायपुर आकर बस गए, लेकिन बस्तर से मेरा भावनात्मक रिश्ता आज भी बना हुआ है।
सवाल: कबीर जयंती पर युवाओं के लिए आपका संदेश?
जवाब: सबसे पहले पूरे विश्व को कबीर जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं। आज दुनिया को सबसे ज्यादा जरूरत मोहब्बत, इंसानियत और भाईचारे की है।
मैं इसी भावना के साथ कुछ पंक्तियां कहना चाहूंगा-
"कोई भी रस्म मोहब्बत का निभाकर देखो,
राह में दीप मोहब्बत का जलाकर देखो।
कितना सुख मिलता है, मालूम नहीं तुमको,
अपने दुश्मन को भी कभी गले लगाकर देखो।"
साहित्यकार गिरीश पंकज की ये पंक्तियां आज के समाज के लिए सबसे बड़ा संदेश हैं-
"गिरती है दीवार धीरे-धीरे,
जोर लगाओ यार धीरे-धीरे।
मिलने-जुलने में कसर न छोड़ना तुम,
हो जाएगा प्यार धीरे-धीरे।"
यही कबीर का संदेश है, यही मानवता का मार्ग है और यही आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।
Updated on:
29 Jun 2026 04:24 pm
Published on:
29 Jun 2026 04:12 pm
बड़ी खबरें
View Allरायपुर
छत्तीसगढ़
ट्रेंडिंग
