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Dilip Ray Passed Away: कैमरा थम गया, लेकिन अमर हो गईं तस्वीरें, छत्तीसगढ़ी सिनेमा के वरिष्ठ डीओपी दिलीप राय का निधन

Dilip Ray Death: छत्तीसगढ़ी सिनेमा को अपने कैमरे की नजर से नई पहचान दिलाने वाले वरिष्ठ सिनेमैटोग्राफर (डीओपी) दिलीप राय का 72 वर्ष की आयु में निधन हो गया।
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Dilip Ray Obituary

नहीं रहे डीओपी दिलीप राय (फोटो सोर्स- पत्रिका)

रायपुर@ताबीर हुसैन। Dilip Ray Passed Away: छत्तीसगढ़ी सिनेमा को अपनी कैमरे की नजर से पहचान दिलाने वाले वरिष्ठ सिनेमैटोग्राफर (डीओपी) दिलीप राय का 72 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वे पिछले कुछ समय से अस्वस्थ थे और भुवनेश्वर में उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से छत्तीसगढ़ी फिल्म जगत ने एक ऐसे तकनीकी स्तंभ को खो दिया है, जिसने पर्दे के पीछे रहकर कई यादगार फिल्मों को अमर बना दिया।

कई चर्चित छत्तीसगढ़ी फिल्मों को अपने कैमरे से दी पहचान

दिलीप राय ने अपने लंबे करियर में 80 से अधिक उड़िया, करीब 15 बंगाली फिल्मों और कई छत्तीसगढ़ी फिल्मों का छायांकन किया। छत्तीसगढ़ी सिनेमा में उनका योगदान विशेष रूप से माया देदे मायारू, तोर मया के मारे, माया देदे माया लेले और माया देदे मायारू-2 जैसी फिल्मों के जरिए हमेशा याद किया जाएगा। उनकी कैमरे की भाषा ने छत्तीसगढ़ी फिल्मों को अलग पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

फिल्म निर्देशक भूपेंद्र साहू बताते हैं कि जब छत्तीसगढ़ी फिल्मों का शुरुआती दौर था और अनुभवी तकनीशियनों की भारी कमी थी, तब दिलीप राय (Dilip Ray Passed Away) सबसे बड़े संबल बनकर सामने आए। उन्होंने केवल कैमरा नहीं संभाला, बल्कि लाइटिंग, तकनीकी व्यवस्था और कलाकारों के चयन तक में मार्गदर्शन दिया। उनकी बदौलत पहली फिल्मों का निर्माण अपेक्षाकृत सहज हो सका।

पूरी शूटिंग के दौरान कैमरा खुद ही संचालित करते थे

भूपेंद्र साहू के अनुसार, दिलीप राय अपने काम के प्रति पूरी तरह समर्पित थे। उम्र बढ़ने के बाद भी पूरी शूटिंग के दौरान कैमरा खुद ही संचालित करते थे। उनके साथ सहायक मौजूद रहते थे, लेकिन कैमरा शायद ही कभी किसी और के हाथ में जाता था। उन्हें न विशेष सुविधाओं की चाह थी और न ही किसी तरह की मांग। सादगी, अनुशासन और काम के प्रति उनका समर्पण ही उनकी सबसे बड़ी पहचान था।

दिलीप राय का (Dilip Ray Passed Away) व्यक्तित्व जितना बड़ा कलाकार का था, उतना ही बड़ा इंसान का भी था। वे सहज, विनम्र और मिलनसार थे। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ी फिल्म जगत में उन्हें केवल एक डीओपी नहीं, बल्कि एक मार्गदर्शक और साथी के रूप में याद किया जाएगा।

उनके जाने से छत्तीसगढ़ी सिनेमा ने अपने शुरुआती स्वर्णिम दौर के एक महत्वपूर्ण शिल्पकार को खो दिया है। कैमरे के पीछे रहकर उन्होंने जो दृश्य रचे, वे आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा बने रहेंगे।