
Government Land Registry: अवैध प्लाटिंग (photo source- Patrika)
Government Land: छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ में एडवर्ड चिल्ड्रन पार्क, घास भूमि, छोटे झाड़ के जंगल और कथित शासकीय भूमि की खरीद-फरोख्त से जुड़ा मामला अब गंभीर प्रशासनिक जांच के दायरे में आ गया है। लंबे समय से चर्चा में रहे इस प्रकरण में लगातार सामने आए दस्तावेजी तथ्यों और शिकायतों के बाद प्रशासन को सख्त कदम उठाने पड़े हैं। संभाग आयुक्त स्तर से जानकारी तलब किए जाने के बाद अब उच्चस्तरीय जांच शुरू हो चुकी है और विवादित भूमि पर चल रहे सभी निर्माण कार्यों को तत्काल प्रभाव से रोक दिया गया है।
इस पूरे मामले की शुरुआत कथित अवैध प्लाटिंग के खुलासे से हुई। जांच में सामने आया कि लगभग 85 हजार वर्गफीट भूमि को 22 अलग-अलग हिस्सों में विभाजित कर विक्रय किया गया। इसके बाद नगर एवं ग्राम निवेश विभाग से जुड़े दस्तावेजों में यह तथ्य सामने आया कि संबंधित भूमि की प्लाटिंग को विभागीय स्वीकृति प्राप्त नहीं थी। जैसे-जैसे दस्तावेज सामने आते गए, मामला और गंभीर होता चला गया।
राजस्व अभिलेखों, नजूल रिकॉर्ड, मेंटेनेंस खसरा, वर्ष 1974 की रजिस्ट्री और वर्ष 1948 की निजी संपत्ति सूची जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों ने इस पूरे प्रकरण पर नए सवाल खड़े कर दिए। इन दस्तावेजों के आधार पर भूमि के स्वामित्व और उपयोग की वास्तविक स्थिति को लेकर कई विरोधाभास सामने आए हैं।
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि जिन खसरों को विभिन्न सरकारी अभिलेखों में सड़क, सार्वजनिक रास्ता, घास भूमि, छोटे झाड़ का जंगल अथवा शासकीय भूमि के रूप में दर्ज बताया गया है, उन्हीं क्षेत्रों से जुड़े हिस्सों पर निजी स्वामित्व और रजिस्ट्री के दावे किए जा रहे हैं।
यही तथ्य पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बनाता है। यदि जांच में यह साबित होता है कि सार्वजनिक उपयोग या शासकीय प्रकृति की भूमि का निजी संपत्ति के रूप में विक्रय किया गया, तो यह एक बड़ा प्रशासनिक और कानूनी प्रश्न खड़ा करेगा।
मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू वर्ष 1948 में रियासतों के विलय के समय तैयार की गई निजी संपत्तियों की सूची से जुड़ा है। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार इस सूची में एडवर्ड पार्क का नाम दर्ज नहीं मिला है। इस तथ्य ने भूमि के मूल स्वामित्व को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सवाल उठ रहे हैं कि यदि उक्त भूमि निजी संपत्ति नहीं थी, तो बाद में उसके निजी स्वामित्व के दावे और रजिस्ट्री किस आधार पर की गईं। यही बिंदु अब जांच का प्रमुख विषय बन गया है।
लगातार सामने आ रहे तथ्यों और शिकायतों के बाद संभाग आयुक्त ने मामले को गंभीरता से लेते हुए विस्तृत जांच के निर्देश दिए। इसके बाद कलेक्टर द्वारा सात सदस्यीय जांच समिति का गठन किया गया, जिसे पूरे प्रकरण की जांच कर तथ्यात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। समिति भूमि से जुड़े सभी रिकॉर्ड, राजस्व दस्तावेज, रजिस्ट्री, स्वामित्व संबंधी अभिलेख और विभागीय अनुमतियों की जांच करेगी। साथ ही संबंधित अधिकारियों और पक्षकारों से भी जानकारी जुटाई जाएगी।
जांच समिति के गठन के कुछ ही दिनों बाद नगर पालिका ने विवादित भूमि पर चल रहे निर्माण कार्यों को यथास्थिति में रखने का आदेश जारी कर दिया। इस आदेश का अर्थ है कि जांच पूरी होने तक वहां किसी भी प्रकार का नया निर्माण, विकास कार्य या संरचनात्मक बदलाव नहीं किया जा सकेगा। प्रशासन का मानना है कि जांच पूरी होने से पहले निर्माण जारी रहने पर स्थिति और जटिल हो सकती है, इसलिए फिलहाल यथास्थिति बनाए रखना आवश्यक है।
अब यह मामला केवल अवैध प्लाटिंग तक सीमित नहीं रह गया है। जांच समिति इस बात की भी पड़ताल करेगी कि यदि भूमि सार्वजनिक उपयोग, पार्क, घास भूमि या शासकीय श्रेणी की थी तो उसका विभाजन, नामांतरण, रजिस्ट्री और विक्रय किन परिस्थितियों में हुआ। इसके अलावा यह भी देखा जाएगा कि संबंधित प्रक्रियाओं में कहीं नियमों का उल्लंघन, दस्तावेजी त्रुटि या प्रशासनिक लापरवाही तो नहीं हुई। यदि किसी स्तर पर अनियमितता पाई जाती है तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की संभावना भी बन सकती है।
खैरागढ़ में यह मामला अब केवल भूमि विवाद भर नहीं रह गया है, बल्कि सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही का विषय बन चुका है। करोड़ों रुपये मूल्य की इस भूमि से जुड़े सवालों का जवाब अब जांच समिति की रिपोर्ट से मिलने की उम्मीद है।
स्थानीय लोगों की नजर इस बात पर टिकी है कि जांच निष्पक्ष रूप से पूरी होती है या नहीं और यदि अनियमितताएं सामने आती हैं तो जिम्मेदार लोगों पर क्या कार्रवाई की जाती है। फिलहाल इतना तय है कि दस्तावेजों के आधार पर सामने आए लगातार खुलासों के बाद शुरू हुई यह जांच अब निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुकी है और इसकी रिपोर्ट आने के बाद कई बड़े खुलासे सामने आ सकते हैं।
Published on:
12 Jun 2026 08:35 pm
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