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नक्सल संगठन को झटका! महिला माओवादी टेटकी ने किया सरेंडर, 15 साल की उम्र में बनी थी नक्सली

Naxal Surrender: बस्तर के मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले में रावघाट एरिया कमेटी की सदस्य महिला माओवादी उर्मिला उर्फ टेटकी ने 13 साल बाद आत्मसमर्पण किया।

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नक्सल संगठन को झटका (photo source- Patrika)

Naxal Surrender: बस्तर संभाग में नक्सल मोर्चे पर एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया है, जहां लंबे समय से सक्रिय रही महिला माओवादी उर्मिला उर्फ टेटकी (28) ने मुख्यधारा में लौटने का फैसला लिया है। रावघाट एरिया कमेटी की सदस्य रही उर्मिला ने मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिला मुख्यालय पहुंचकर आत्मसमर्पण कर दिया। गुरुवार को पुलिस अधिकारियों की मौजूदगी में उसका विधिवत आत्मसमर्पण कराया जाएगा।

Naxal Surrender: 13 साल तक नक्सली संगठन में रही सक्रिय

उर्मिला मूल रूप से मानपुर ब्लॉक के मुंजाल गांव की रहने वाली है। उसने करीब 13 वर्षों तक सशस्त्र माओवादी संगठन के साथ रहकर काम किया। कम उम्र में ही वह नक्सल गतिविधियों में शामिल हो गई थी और धीरे-धीरे संगठन के भीतर उसकी भूमिका मजबूत होती गई। उसका आत्मसमर्पण इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि उसे मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले का आखिरी सक्रिय माओवादी कैडर बताया जा रहा है।

15 साल की उम्र में हुई थी भर्ती

उर्मिला ने पुलिस को बताया कि जब वह मात्र 15 साल की थी, तब डीवीसीएम स्तर के माओवादी जंगू उसे अपने साथ बस्तर के कोयलीबेड़ा क्षेत्र में ले गया था। वहीं उसे संगठन में शामिल किया गया और धीरे-धीरे उसे विभिन्न गतिविधियों में लगाया गया। कम उम्र में ही हथियारबंद जीवन की शुरुआत ने उसकी पूरी जिंदगी की दिशा बदल दी।

हालिया गतिविधियों का खुलासा

पूछताछ में उर्मिला ने कई अहम जानकारियां भी साझा की हैं। उसने बताया कि करीब डेढ़ महीने पहले उसकी मुलाकात डीवीसीएम स्तर के हार्डकोर माओवादी चंदर और एसीएम रुपी से कांकेर के जंगलों में हुई थी। बाद में हुई एक मुठभेड़ में रुपी मारी गई, जबकि चंदर अब भी अपने करीब एक दर्जन साथियों के साथ बस्तर क्षेत्र में सक्रिय बताया जा रहा है। इन जानकारियों को सुरक्षा एजेंसियां बेहद महत्वपूर्ण मान रही हैं।

बिना हथियार के तय किया सफर

उर्मिला का आत्मसमर्पण का फैसला भी आसान नहीं था। वह कुछ दिनों पहले बिना किसी हथियार के ही बस्तर के जंगलों से निकलकर मोहला की ओर रवाना हुई। उसने पैदल सफर करते हुए मानपुर के जंगलों तक पहुंच बनाई। यह सफर जोखिम भरा था, क्योंकि किसी भी समय उसे संगठन के अन्य सदस्यों या सुरक्षा बलों से खतरा हो सकता था। इसके बावजूद उसने हिम्मत दिखाई और आखिरकार अपने गृह जिले में पहुंचकर आत्मसमर्पण का रास्ता चुना।

Naxal Surrender: मुख्यधारा में लौटने की पहल

उर्मिला ने साफ किया कि वह अपने गृह क्षेत्र में ही आत्मसमर्पण करना चाहती थी, ताकि वह समाज की मुख्यधारा में लौट सके और सामान्य जीवन जी सके। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि सरकार की पुनर्वास नीति और लगातार चलाए जा रहे जागरूकता अभियान का असर अब देखने को मिल रहा है। कई माओवादी अब हिंसा का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण कर रहे हैं।

सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ी सफलता

उर्मिला का आत्मसमर्पण सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। इससे न सिर्फ नक्सल संगठन को झटका लगा है, बल्कि इलाके में शांति बहाली की दिशा में भी यह एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है।