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मां को मुखाग्रि देने से एकलौते बेटे ने किया इनकार, तब चार बेटियां कांधे में जननी को लेकर पहुंची श्मशान

पुत्र के द्वारा मां के अंतिम संस्कार से इनकार के बाद आखिरकार चार बहनों ने मिलकर मां की अर्थी को कांधा देकर मुक्तिधाम पहुंचाया और मुखाग्नि देकर बेटे का फर्ज निभाया।

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मां को मुखाग्रि देने से एकलौते बेटे ने किया इनकार, तब चार बेटियां कांधे में जननी को लेकर पहुंची श्मशान

राजनांदगांव/खैरागढ़. पुत्र के द्वारा मां के अंतिम संस्कार से इनकार के बाद आखिरकार चार बहनों ने मिलकर मां की अर्थी को कांधा देकर मुक्तिधाम पहुंचाया और मुखाग्नि देकर बेटे का फर्ज निभाया। यह हृदय विदारक घटना शहर के दाउचौरा स्थित देवंागन मोहल्ले की है।

चार बेटियों ने मिलकर दी मुखाग्रि
पुत्र के मुंह मोडऩे के कारण 75 वर्षीय झुनियाबाई देवंागन पिछले तीन-चार साल से अपने चार बेटियों के यहां घूम-घूमकर रह रही थी। झुनियाबाई अहिवारा ब्लाक के सेमरिया की रहने वाली थी, जिसकी पांच संतानों में एक बेटा और चार बेटियां हैं।

गुरुवार को अंतिम सांस लेने के दौरान वह अपनी मंझली पुत्री रूखमणी के यहां खैरागढ़ में थी। पिछले डेढ़ माह से बीमार झुनियाबाई का इलाज और देखरेख भी बेटियां ही कर रही थी। गुरुवार को सुबह मौत के बाद उसके पुत्र छन्नू को सूचना भेजी गई, लेकिन उसने अंतिम संस्कार करना तो दूर आने से भी मना कर दिया। खैरागढ़ पहुंची चारों बहनों ने इस दौरान खुद ही मां का अंतिम संस्कार करने निर्णय लिया।

समाज में चारों ओर चर्चा
बेटियों ने मां के शव को कांधा दिया और मुक्तिधाम जाकर अंतिम संस्कार किया। अब पूरा कार्यक्रम भी चारों बहने ही मिलकर करेंगी। देवांगन समाज में पहली बार इस तरह की घटना से समाज भी हतप्रभ है और बहनों की प्रशंसा हो रही है। बेटियों ने मां को अंतिम सद्गति दी, उसे लेकर सर्वत्र चर्चा है।

किसी ने नहीं ली जिम्मेदारी
रूख्मणी के घर से मां की शवयात्रा निकली, तो चारों बहनों ने कांधा देकर दाउचौरा मुक्तिधाम पहुंचाया और दाह संस्कार की प्रक्रिया पूरी की। इस दौरान बड़ी संख्या में समाज सहित ग्रामीण जुटे। अंतिम संस्कार में अन्य रिश्तेदार भी पहुंचे थे, लेकिन अंतिम संस्कार सहित पूरी प्रक्रिया की किसी ने भी जिम्मेदारी नहीं ली।

चार साल से पुत्र ने मोड़ लिया है मुंंह
सेमरिया अहिवारा की रहने वाली झुनियाबाई पिछले चार साल से अपने बेटियों चंपा, चमेली, रूख्मणी और सुमित्रा के यहां माह, दो माह रह-रहकर जीवन काट रही थी। चंपा और चमेली गंडई के पास परपोड़ी में, सुमित्रा दुर्ग के बघेरा और रूख्मणी खैरागढ़ में रहती है। डेढ़ माह से झुनियाबाई बीमार स्थिति में खैरागढ़ में अपनी पुत्री रूख्मणी के यहां थी। वह चल फिर नहीं सकने के कारण बिस्तर पर थी। बेटियों ने मां को श्मशान पहुंचाकर सदियों पुराने मिथक को तोड़ दिया।