
बैलगाड़ी में सवार होकर मायरा भरने पहुंचे, पत्रिका फोटो
Mayra ceremony Rajasthan: आज के दौर में चाहे शादी-ब्याह हो या अन्य मांगलिक आयोजन, अधिकांश समारोह पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिकता की चकाचौंध में ढलते नजर आते हैं। इसके चलते पुराने रीति-रिवाज, सामाजिक रस्में और सांस्कृतिक परंपराएं धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही हैं।
इन परंपराओं को बचाए रखना आज किसी चुनौती से कम नहीं है। ऐसे समय में राजसमंद के उपनगर धोइंदा के एक व्यक्ति ने बैलगाड़ी में मायरा भरकर एक अनूठी पहल की, जो लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनने के साथ ही परंपराओं से जुड़े रहने का प्रेरक संदेश भी बन गई।
धोइंदा निवासी मुकेश कुमावत (पुत्र जयराम कुमावत) ने अपनी धर्म बहन रूक्मणी देवी कुमावत के यहां विवाह अवसर पर बैलगाड़ी में मायरा भरने का निर्णय लिया। मंगलवार को इस आयोजन के तहत परिवारजन, रिश्तेदार, परिचित और समाज के सैकड़ों लोग धोइंदा बस स्टैंड पर एकत्रित हुए। यहां रंग-बिरंगी फर्रियों, गुब्बारों और आकर्षक सजावट से सुसज्जित बैलगाड़ी तैयार की गई थी। मांगलिक अवसर को देखते हुए बैलों को भी रंगीन धारियों, रिबन और मोरपंख से सजाया गया, जिससे पूरा दृश्य अत्यंत मनोहारी लग रहा था।
परिजनों ने मायरे का साजो-सामान बैलगाड़ी में सजाया और यात्रा शुरू की। मारवाड़ी वेशभूषा में सजे मुकेश कुमावत अपनी पत्नी मायादेवी के साथ बैलगाड़ी में सवार होकर स्वयं उसे हांक रहे थे। आगे डीजे पर ‘चाल चाल म्हारी नानीबाई कलश बंधावो…’, ‘भर दे मायरो सांवरियो…’, ‘वीरा म्हारा भात भरण ने आज्यो रे…’ जैसे पारंपरिक गीतों की धुन पर स्त्री-पुरुष नृत्य कर रहे थे। पीछे सुसज्जित बैलगाड़ी और उसके साथ सैकड़ों लोगों की भीड़ पूरे माहौल को उत्सवमय बना रही थी। रास्ते भर श्रद्धालु प्रभु के जयकारे लगाते रहे, वहीं महिलाएं मंगल गीत गाती रहीं।
थाली और मादल की गूंज से वातावरण भक्तिमय और उल्लासपूर्ण हो उठा। जगह-जगह आतिशबाजी की गई और कई स्थानों पर मायरे का स्वागत भी हुआ। इस अनूठे दृश्य को देखने के लिए मार्ग में बड़ी संख्या में लोग उमड़े, जिन्होंने इस पारंपरिक झलक को देखकर विशेष आनंद और भावनात्मक जुड़ाव महसूस किया। हर्षोल्लास के साथ निकला यह मायरा गणेश चौक, कैलाश चौराहा और तेजाजी चौक होते हुए स्कूल मैदान के पास स्थित धर्म बहन के घर पहुंचा, जहां विभिन्न सामाजिक रस्में विधिवत निभाई गईं। इस अवसर पर जनप्रतिनिधि, प्रबुद्धजन तथा विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे।
मुकेश कुमावत समाज को जमीनी परंपराओं से जोड़ने और नई पीढ़ी को उनसे परिचित कराने के उद्देश्य से पूर्व में भी ऐसी पहल कर चुके हैं। गत वर्ष उन्होंने राजनगर में रहने वाली माली समाज की अपनी धर्म बहन के यहां भी इसी तरह बैलगाड़ी में मायरा भरा था। उल्लेखनीय है कि मुकेश की सगी बहन या बेटी नहीं है, इसलिए उन्होंने अपनी धर्म बहनों के मायरे पूरे सम्मान और परंपरा के साथ भरे हैं।
राजसमंद के जाने-माने आलू व्यापारी मुकेश कुमावत के पास विदेशी लग्जरी कार है, लेकिन उनके मन में पारंपरिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विरासत के प्रति गहरा सम्मान है। वे न केवल स्वयं इन परंपराओं से जुड़े रहते हैं, बल्कि उनके संरक्षण के लिए निरंतर प्रयासरत भी हैं। क्षेत्र में ‘आलू बाबा’ के नाम से प्रसिद्ध मुकेश का कहना है कि परंपराएं हमें आत्मिक शांति, सुकून और आनंद देती हैं, इसलिए इन्हें बचाना हम सभी की जिम्मेदारी है।
रास्ते में बैलगाड़ी में मायरा जाता देख लोगों ने इस पहल की खुलकर सराहना की। कई स्थानों पर इस विषय को लेकर चर्चा भी होती रही। लोगों ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि यदि ऐसी परंपराओं को समय रहते नहीं सहेजा गया, तो आने वाली पीढ़ी इन्हें केवल किताबों में ही देख पाएगी।
Published on:
22 Apr 2026 09:52 am
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