
##Andhvishwas भटकते हुए काट रहे जिन्दगी, मौत भी लावारिस : पुर्नवास के लिए नहीं हो रहे ठोस प्रयास
केस 1 : मानसिक रूप से कमजोर करीब 65 वर्षीय वृद्ध बीमार हालत में रेलवे स्टेशन के पास पड़ा मिला। बाद में उसे आरके जिला अस्पताल में उपचार के दौरान दम तोड़ दिया। 30 दिसम्बर 13 को पुलिस ने नगरपरिषद के सहयोग से अंतिम संस्कार करवा दिया। बेसुध होने से पहले विक्षिप्तता का इलाज करने के लिए कोई आगे नहीं आया।
केस 2 : राजसमंद से भीलवाड़ा फोरलेन पर मेला ग्राउंड कुंवारिया के पास फरवरी 2018 में विक्षिप्त का शव पड़ा मिला। बाद में उसके शव को जिला अस्पताल के मुर्दाघर में रखव दिया, मगर शिनाख्त नहीं हो पाई। बाद में पुलिस ने नगरीय निकाय की मदद से अंतिम संस्कार करवाया। कई वर्षों से विक्षिप्त हाइवे व आस पास के गांवों में घूम रहा था, मगर प्रशासन ने भी उपचार के प्रयास नहीं किए।
राजसमंद. मानसिक विक्षिप्तता के चलते कई लोग न सिर्फ अपनों से, बल्कि समाज से ही बेगाने होकर लावारिस सी जिन्दगी जीने को मजबूर हैं। दर दर भटकते हुए मांग कर पेट भरने वाले कई विक्षिप्त की अनियमित खान- पान के चलते अकाल मौत तक हो रही है और पहचान के अभाव में उनका अंतिम संस्कार भी लावारिस की तरह ही हो रहा है। इनके प्रति न तो सरकार गंभीर है और न ही समाजसेवा का दंभ भरने वाले स्वयंसेवी संगठन और प्रशासन द्वारा भी इलाज व पुर्नवास के लिए अब तक कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए।
जी रहे याचक सी जिन्दगी
ज्यादातर विक्षिप्त लोग उपचार के अभाव में शहर-देहात में याचक सी जिन्दगी जीने को मजबूर है। परिजन व समाज से वे इस कदर कट गए कि प्रतिदिन मांग कर पेट भर रहे हैं। राजसमंद शहर की मुख्य सडक़ से लेकर हाइवे आठ, भीलवाड़ा फोरलेन के साथ श्रीनाथजी मंदिर, श्री द्वारकाधीश मंदिर, चारभुजानाथ मंदिर के साथ विभिन्न मंदिर मस्जिद क्षेत्र में अक्सर भागदौड़ करते दिख ही जाते हैं। इन जगहों पर अक्सर पुलिस, प्रशासनिक अफसरों, समाज व स्वयंसेवी संगठनों के प्रतिनिधियों की आवाजाही रहने के बावजूद किसी ने ध्यान नहीं दिया।
पेंशन का प्रावधान, केयरटेकर का नहीं
सामाजिक अधिकारिता विभाग के अंतर्गत विक्षिप्त व्यक्ति के लिए पेंशन देने का प्रावधान जरूर है, मगर उसके नियमित इलाज, रहने, खाने-पीने के प्रबंध संबंधी कोई व्यवस्था नहीं है। अस्पताल में उपचार के लिए भी उसके साथ परामर्शक या केयरटेकर जरूरी है। क्योंकि ज्यादातर विक्षिप्ति लोगों के साथ उनके परिजन नहीं है। समाज कल्याण विभाग के टीआर आमेटा ने बताया कि पेंशन के अलावा विक्षिप्तों को रखने, खाने-पीने के लिए विभाग की कोई योजना या सुविधा नहीं है।
जीते जी पहचान के प्रयास नहीं
शहर व ग्रामीण क्षेत्र में भटकते विक्षिप्त की जीते जी पहचान करने, परिजनों को पे्ररित कर उनके इलाज के लिए न तो पुलिस द्वारा कोई कार्रवाई की गई और न ही प्रशासन द्वारा प्रयास किए गए। लावारिस मृत्यु के बाद उसकी पहचान के लिए पुलिस भागदौड़ करती है, मगर तब शिनाख्त करना मुश्किल हो जाता है।
विक्षिप्त बच्चों के लिए यह सुविधा
न्यायविद् डॉ. बसंतीलाल बाबेल ने बताया कि 18 वर्ष तक के बच्चों के लिए किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम 2015 में कई प्रावधान है। इसके तहत विक्षिप्त बच्चों को किशोर न्याय बोर्ड व बाल कल्याण समिति अध्यक्ष के समक्ष पेश किया जाता है। फिर उन्हें बाल गृह, सम्पे्रषण गृह, विशेष गृह व आश्रय स्थल पर भेजा जा सकता है, जहां उपचार व रहने, खाने के सारे प्रबंध है। इसी तरह इससे बड़ी उम्र के लोगों के लिए भी समाज कल्याण, प्रशासन का दायित्व है कि वे अनजान विक्षिप्त का उपचार कराए। साथ ही उसके रहने, खाने-पीने के प्रबंध करें।
कस्टोडियल केयर की सुविधा
जिन विक्षिप्त लोगों के परिजन नहीं है या उनकी पहचान नहीं है। उनके लिए कस्टोडियल केयर की जयपुर व जोधपुर में सुविधा है। ऐसे विक्षिप्त को पकडक़र ले जाना पुलिस का कार्य है। फिर पहचान होने पर उनके परिजनों से भी संपर्क किया जाता है।
डॉ. शिशुपालसिंह, मनो चिकित्सक आरके जिला अस्पताल राजसमंद
Published on:
14 Aug 2018 12:46 pm
