
gansu mahto photo
रवि सिन्हा की स्पेशल रिपोर्ट...
(रांची): झारखंड की राजधानी रांची से करीब 30 किलोमीटर दूर प्रकृति की गोद में बसे ओरमांझी प्रखंड के सदमा गांव निवासी 41 वर्षीय गंसू महतो महज 50 से 100 रुपए की दिहाड़ी के लिए 20 किलोमीटर दूर काम करने जाते थे। उन्होंने मेहनत की बदौलत बंजर भूमि को उपजाऊ भूमि में परिवर्तित कर तीन-चार वर्षों में ही अपनी तकदीर बदल डाली। गंसू महतो की सफलता की कहानी आज कई लोगों के लिए प्रेरणा बन गई है। रांची ही नहीं पूरे राज्यभर में उनकी गिनती प्रगतिशील किसानों के तौर पर होती है।
इतनी कम दिहाडी पर किया करते थे मजदूरी
ओरमांझी प्रखंड के सदमा गांव के गंसू महतो का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसे भी दिन देखे हैं, जब उन्हें प्रतिदिन 50 रुपए की दिहाड़ी मजदूरी करने के लिए कई किलोमीटर दूर तक साइकिल से काम पर जाना पड़ता था। कई वर्ष आर्थिक कठिनाई से जूझने के बाद उन्होंने अपनी खेत में ही पसीना बहाने का निर्णय किया।
पीछले साल की 50 लाख की कमाई
छत्तीसगढ़ के दुर्ग से खेती की बारीकियां सीखकर लौटने के बाद गंसू अपने गांव वापस लौटे और महज ढ़ाई से तीन सालों में ही अपनी बंजर भूमि को उपजाऊ बनाकर आमदनी में कई गुणा बढ़ोत्तरी कर ली। गंसू महतो ने पिछले साल 35 लाख रुपए का जरबेरा के फूल और 15 लाख रुपए से अधिक की सब्जियां बेंची। प्रारंभ में उन्होंने महज दो-ढ़ाई एकड़ में खेती प्रारंभ की, लेकिन आमदनी होने के बाद उन्होंने आसपास के ग्रामीणों से जमीन खरीद ली और आज उनके पास नौ एकड़ से अधिक खेती योग्य भूमि है। गंसू महतो न सिर्फ अपनी जमीन पर खेती कर रहे है, बल्कि दूर-दूर से किसान उनके पास खेती को लेकर प्रशिक्षण लेने भी पहुंचे।
इस नवीन तकनीक का कर रहे प्रयोग
उन्होंने अपनी मेहनत और तकनीक के जरिए खेती की नई परिभाषा गढ़ी है। उन्होंने बताया कि उनकी खेती की एक विशेष बात यह भी होती है कि वे किसी प्रकार के कीटनाशक या खाद का इस्तेमाल नहीं करते है। सिर्फ पौधों को समय पर पानी उपलब्ध कराना ही उनका काम है। वहीं पानी की बचत के लिए भी स्पीलंटर तकनीक का प्रयोग किया गया है, इसके लिए प्रशासन की ओर से किसानों को 90 प्रतिशत तक सब्सिडी भी दी जाती है। शेष राशि किसानों को लगानी पड़ती है। इस तकनीक से पानी की काफी बचत होती है। सिर्फ पौधे में ही आवश्यकता के अनुरुप पानी पहुंचता है, इससे अनावश्यक खत-पतवार और घास भी नहीं पनपती है, जिससे पौधे को संरक्षित करने में लगने वाला श्रम भी बच जाता है।
परिवार सालों से जुटा है खेती में
गंसु महतो की खेती की एक विशेषता यह भी है कि इन्हें करीब नौ एकड़ भूमि पर खेती कार्य के लिए प्रतिदिन किसी को मजदूरी पर रखने की जरुरत नहीं होती है, बल्कि वे खुद अपनी पत्नी, बच्चों व दो अन्य भाईयों समेत 10 लोगों के साथ खेती के कार्य को पूरा करते है। गंसु महतो का परिवार कई पीढियों से खेती किसानी से जुड़ा रहा है ,इसलिए परिवार के अन्य सदस्यों का भी इसमें पूरा सहयोग मिलता है। गंसू महतो आज इलाके में खेती किसानी के पर्याय बन चुके हैं। बंजर भूमि को जिस तरह से उन्होंने सोना उगाने लायक बनाया है निश्चित तौर पर इससे बदलाव की कहानी लिखी जा रही है।
Published on:
15 Jun 2018, 1:38 PM IST
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