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रतलाम। रंग का पर्व होली का त्योहार 20-21 मार्च को उत्साह व उल्लास के साथ मनाया जाएगा। उमंग के इस पर्व में 20 मार्च की रात को होलिका दहन व 21 मार्च को रंगपर्व होगा। होलिकात्सव को लेकर अनेक प्राचिन परंपराओं का निर्वाहन आज भी किया जा रहा है। बात मध्यप्रदेश की करें तो इस राज्य के मालवा में रतलाम जिले में सैकड़ों वर्षो से एक अनूठी परंपरा का पालन आज भी होलिका दहन के साथ किया जाता है। इस परंपरा के बारे में कहा जाता है कि इससे पूरे वर्ष घर में बरकत रहती है। क्या है ये परंपरा व क्या है इसका नियम, यहां पढे़ं पूरी खबर..
रतलाम के प्रसिद्ध ज्योतिषी वीरेंद्र रावल ने बताया कि जिंदगी को रंगों से सराबोर कर देने वाले इस त्यौहार का धार्मिक महत्व तो है ही, इस दिन सामाजिक संदेश भी दिया जाता रहा है। इस दिन से जुड़ी एक लोक परंपरा में रतलाम में अन्न का महत्व बताया गया है। होली के लिए लकडि़यां एकत्रित कर जब ध्वज के इर्दगिर्द रख दी जाती हैं तो शाम को ही इसकी पूजा शुरु कर दी जाती है। होली की पूजा में परंपरागत रूप से गुझिया-पपडिया का भोग लगाया जाता है पर इस पूजा में नेवैद्य के रूप में गेहूं-चना अर्पित करने का ज्यादा महत्व है। होलिका पूजन में जलती होली में गेहूं की बालियां अर्पित की जाती हैं। ऐसा माना जाता है कि गेहूं-चना का यह भोग सीधे भगवान तक ही जाता है।
कृषि आधारित है ये परंपरा
वैसे यह परंपरा हमारी कृषि आधारित सामाजिक और धार्मिक क्रियाकलापों को प्रतिध्वनित करती है। होली के समय खेतों में गेहूं और चना लहलहाते रहते हैं। इस नई फसल को जलती होली को अर्पित करने से घर में हमेशा बरकत बनी रहती है, ऐसा कहा जाता है। रविवार को शाम को जहां होलिका पूजन होगा, देर रात को होली दहन होगा वहीं दिन में पूर्णिमा का पुण्य लाभ भी लिया जा सकेगा। होलाष्टक समापित के साथ ही इस दिन स्नान-दान पूर्णिमा भी है। पास की किसी पवित्र नदी में जाकर स्नान कर जरूरतमंदों को दान-दक्षिणा देने से पुण्य की प्राप्ति होती है।
Published on:
17 Mar 2019 10:02 am
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