
Bala Sundari Temple Kashipur : यह है काशीपुर का मां बाल सुंदरी मंदिर (फोटो सोर्स:srimandir.com)
Bala Sundari Temple Kashipur : उत्तराखंड की हसीन वादियों में बसा काशीपुर केवल एक शहर नहीं, बल्कि चमत्कारों की धरती है। यहां स्थित मां बाल सुंदरी देवी मंदिर (जिसे चैती मंदिर भी कहा जाता है) आस्था का वो केंद्र है, जिसका संबंध सीधे सतयुग से लेकर मुगल काल तक जुड़ा है। आइए जानते हैं इस अद्भुत शक्तिपीठ की वो अनसुनी कहानियाँ, जो आज भी भक्तों को हैरान कर देती हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने शिव जी के मोह को भंग करने के लिए माता सती के शरीर के अंग काटे थे, तब यहां मां की बाईं भुजा गिरी थी। इसी कारण इसे 52 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। दिलचस्प बात यह है कि यहाँ माँ की कोई पारंपरिक मूर्ति नहीं है, बल्कि एक प्राकृतिक शिला (चट्टान) पर उनकी भुजा की आकृति उभरी हुई है, जिसकी भक्त सदियों से पूजा कर रहे हैं।
इतिहास गवाह है कि मुगल शासक औरंगजेब मंदिरों को नुकसान पहुंचाने के लिए जाना जाता था, लेकिन इस दरबारे-खास में उसे भी झुकना पड़ा। कहा जाता है कि जब उसकी बहन जहांआरा गंभीर रूप से बीमार पड़ी और दुनिया के तमाम हकीम हार गए, तब मां बाल सुंदरी ने एक छोटी कन्या के रूप में जहांआरा को दर्शन दिए। मां ने आदेश दिया कि यदि मंदिर का जीर्णोद्धार कराया जाए, तो वह स्वस्थ हो जाएगी। औरंगजेब ने तुरंत मंदिर का निर्माण कराया, जिसकी गवाही आज भी मंदिर के ऊपर बने तीन गुंबद देते हैं जो मस्जिद जैसी वास्तुकला की याद दिलाते हैं।
मंदिर परिसर में एक प्राचीन कदम का पेड़ है जो बाहर से हरा-भरा दिखता है, लेकिन अंदर से पूरी तरह खोखला है। इसके पीछे एक रोचक किस्सा है: सालों पहले एक महात्मा की चुनौती पर यहां के पांडा (पुजारी) ने अपनी शक्ति से इस पेड़ को सुखा दिया था और फिर जल छिड़क कर इसे दोबारा जीवित कर दिया। तब से यह पेड़ अपनी अनूठी स्थिति में खड़ा है।
मेले का अपना ही जलवा: सुल्ताना डाकू से फूलन देवी तक की आमद
यहां लगने वाला चैती मेला पूरे उत्तर भारत में मशहूर है। पुराने समय में यहाँ घोड़ों का 'नखासा बाजार' सजता था।
दिलचस्प फैक्ट: कहा जाता है कि मशहूर डाकू सुल्ताना और फूलन देवी भी यहां गुप्त रूप से बेहतरीन नस्ल के घोड़े खरीदने आते थे।
मशहूर लाठियां: एक दौर था जब लोग साल भर इस मेले का इंतजार बरेली और झारखंड की मजबूत लाठियां खरीदने के लिए करते थे।
चैती मैदान परिसर में ही मोतेश्वर महादेव का मंदिर है। महाभारत कालीन इस शिवलिंग की मोटाई इतनी अधिक है कि इनका नाम ही मोतेश्वर पड़ गया। स्कंद पुराण के अनुसार, यह भगवान शिव का 12वां उप-ज्योतिर्लिंग है। मान्यता है कि हरिद्वार से पैदल कांवड़ लाकर यहां जल चढ़ाने वाले को सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
बुक्सा जनजाति की कुलदेवी: मां बाल सुंदरी बुक्सा समुदाय की आराध्य हैं। गदरपुर और रामनगर जैसे इलाकों से यह समुदाय आज भी यहां विशेष चिरागी पूजा के लिए आता है।
गोविषाण से काशीपुर: चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी अपनी डायरी में इस जगह का जिक्र गोविषाण के नाम से किया था, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है।
प्रशासनिक व्यवस्था: साल 2018 से इस ऐतिहासिक मेले का जिम्मा स्थानीय प्रशासन संभाल रहा है, जिससे इसकी भव्यता और बढ़ गई है।
अगली बार जब आप उत्तराखंड जाएं, तो काशीपुर के इस चमत्कारी दरबार में हाजिरी लगाना न भूलें। कहते हैं यहां मां के बाल रूप के दर्शन मात्र से बिगड़े काम बन जाते हैं।
अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहां दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। हम इसकी पूर्ण सटीकता या सफलता की गारंटी नहीं देते हैं। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें।
Updated on:
24 Mar 2026 11:57 am
Published on:
24 Mar 2026 11:57 am
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