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Bhagavad Gita: कुरुक्षेत्र में अर्जुन क्यों पड़ गए थे शोक में? गीता का श्लोक देता है मन संभालने का संदेश

Gita Shlok on Stress Management: कुरुक्षेत्र में युद्ध शुरू होने से पहले अर्जुन अचानक क्यों टूट गए थे? गीता का यह प्रसंग बताता है कि गहरे भावनात्मक तनाव, मोह और मानसिक भ्रम से इंसान कैसे जूझता है और उससे बाहर आने का रास्ता क्या हो सकता है।

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भारत

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Manoj Vashisth

Jun 08, 2026

Gita Shlok on Stress Management

Bhagavad Gita: अपनों को सामने देखकर क्यों टूट गए थे अर्जुन? गीता का यह प्रसंग आज भी प्रासंगिक (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)

Bhagavad Gita: महाभारत युद्ध शुरू होने से ठीक पहले अर्जुन की मानसिक स्थिति अचानक बदल गई थी। रणभूमि में अपने ही संबंधियों को देखकर वे गहरे शोक और भ्रम में पड़ गए थे। महाभारत का युद्ध सिर्फ दो सेनाओं की लड़ाई नहीं था, बल्कि वह इंसान के मन में चलने वाले सबसे बड़े अंतर्द्वंद्व की कहानी थी। सोचिए, एक ऐसा योद्धा जिसके गांडीव की टंकार से दुश्मन कांप उठते थे, जो अधर्मियों को कुचलने के लिए रथ पर सवार हुआ था, वह युद्ध की शुरुआत से ठीक पहले अचानक भीतर से टूट जाता है। श्रीमद्भगवद्गीता के पहले अध्याय का 27वां श्लोक इसी ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक मोड़ को बयां करता है, जहां वीरता पर अचानक गहरा अवसाद हावी हो जाता है।

कुरुक्षेत्र के मैदान में जब कांप उठी वीरता

गीता के श्लोक 'तान्समीक्ष्य स कौन्तेय: सर्वान्बन्धूनवस्थितान्…' के अनुसार, जब कुंती पुत्र अर्जुन ने रणभूमि के दोनों ओर केवल अपने ही सगे-संबंधियों, पिताओं, पितामहों और गुरुओं को खड़े देखा, तो वे अत्यधिक करुणा और गहरे शोक से भर गए।

तान्समीक्ष्य स कौन्तेय: सर्वान्बन्धूनवस्थितान् || 27||
कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् |

संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि जो अर्जुन कुछ ही मिनट पहले कौरवों के पापों की सजा देने के लिए क्रोध से उबल रहे थे, अपनों को सामने देखकर उनका दिल बैठ गया। इस महाविनाश की कल्पना मात्र से उनका पराक्रम घटने लगा। यहीं पर संजय ने अर्जुन को 'कौन्तेय' (कुंती पुत्र) कहकर संबोधित किया है, जो यह दर्शाता है कि उस क्षण अर्जुन अपनी माता की तरह अत्यंत कोमल हृदय और भावुक हो गए थे।

अर्जुन का वो 'पैनिक अटैक' और आज का कॉर्पोरेट स्ट्रेस

मनोवैज्ञानिकों और आध्यात्मिक गुरुओं की मानें तो कुरुक्षेत्र में अर्जुन की जो स्थिति थी, उसे आज की आधुनिक भाषा में 'एक्यूट एंग्जायटी' (तीव्र चिंता) या पैनिक अटैक कहा जाता है।

तनाव के वो लक्षण जो आज भी दिखते हैं:

गीता के अगले ही श्लोकों में वर्णन आता है कि अर्जुन के हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा था, उनकी त्वचा में जलन हो रही थी और उनका मन भ्रमित हो रहा था। आज कॉर्पोरेट जगत में काम करने वाले युवाओं या बड़ी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों में ठीक यही लक्षण परफॉर्मेंस प्रेशर और अपनों को खोने के डर के रूप में देखे जाते हैं।

क्यों खास है गीता का यह मोड़?

अटैचमेंट (मोह) ही दुख का कारण: जब तक अर्जुन 'अधर्म के खिलाफ' लड़ रहे थे, वे पूरी ऊर्जा में थे। जैसे ही बात मेरे अपने पर आई, वे कमजोर पड़ गए। यही मोह इंसान को कर्तव्य पथ से भटकाता है।

सवालों के घेरे में मन: अर्जुन का भ्रमित होना यह दिखाता है कि जब इंसान के सामने कोई बड़ी चुनौती आती है, तो सबसे पहले उसका आत्मविश्वास डगमगाता है।

आज के समय में इस प्रसंग की प्रासंगिकता

आज दुनिया भर के बड़े मैनेजमेंट संस्थानों में भगवद्गीता को लीडरशिप और स्ट्रेस मैनेजमेंट के लिए पढ़ाया जा रहा है। अर्जुन की यह स्थिति हमें सिखाती है कि:

भावुकता में फैसले न लें: अर्जुन युद्ध छोड़ना चाहते थे क्योंकि वे भावुक थे, लेकिन भगवान कृष्ण ने उन्हें सिखाया कि भावनाएं जब कर्तव्य के आड़े आएं, तो बुद्धि का इस्तेमाल करना चाहिए।

मेंटॉर (गुरु) की जरूरत: डिप्रेशन या भ्रम की स्थिति में खुद को कमरे में बंद करने के बजाय अर्जुन की तरह अपने कृष्ण (किसी गुरु, मित्र या काउंसलर) से बात साझा करनी चाहिए।

अस्वीकरण (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी केवल सामान्य सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए है। यहाँ दी गई ज्योतिष, वास्तु या धार्मिक जानकारी मान्यताओं और विभिन्न स्रोतों पर आधारित है। हम इसकी पूर्ण सटीकता या सफलता की गारंटी नहीं देते हैं। किसी भी उपाय, सलाह या विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के प्रमाणित विशेषज्ञ या विद्वान से परामर्श अवश्य लें।

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