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Bhagavad Gita: पानी में बहती नाव की तरह आपकी जिंदगी डुबो सकती है ‘मन की यह एक आदत’

Bhagavad Gita on Mind Control: भगवद्गीता के एक महत्वपूर्ण श्लोक में श्रीकृष्ण बताते हैं कि इंद्रियों के पीछे भागता मन कैसे बुद्धि और विवेक को नष्ट कर देता है। जानिए आधुनिक जीवन में इस संदेश का क्या महत्व है।

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भारत

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Manoj Vashisth

Jun 18, 2026

Bhagavad Gita life management tips

Bhagavad Gita life management tips : गीता के अनुसार मन को कैसे नियंत्रित करें (फोटो सोर्स : AI@chatgpt)

Bhagavad Gita Shlok: आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सब कुछ हासिल करना चाहते हैं पैसा, शोहरत, कामयाबी। लेकिन इन सबके बीच हम कुछ खो रहे हैं, और वो है हमारा खुद का मन। सुबह आंख खुलने से लेकर रात को सोने तक, हमारा दिमाग लगातार कहीं न कहीं भटक रहा है। कभी सोशल मीडिया के नोटिफिकेशन, कभी ओटीटी का चस्का, तो कभी स्वाद और विलासिता की अंधी दौड़। क्या आप जानते हैं कि गीता (Bhagavad Gita) में हजारों साल पहले ही यह चेतावनी दे दी गई थी कि मन का यह भटकाव सीधे विनाश के रास्ते पर ले जात सकता है?

श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के 67वें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं:

"इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि।।"

Bhagavad Gita: Chapter 2, Verse 67

इसका सीधा और सटीक मतलब यह है कि जैसे पानी में तैरती एक नाव को तेज हवा का झोंका उसकी तय दिशा से भटकाकर दूर बहा ले जाता है, ठीक उसी तरह हमारी पांचों ज्ञानेंद्रियों (आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा) में से अगर कोई एक भी बेलगाम हो जाए, तो वह इंसान की बुद्धि और विवेक को हर लेती है।

भगवद्गीता में इंद्रियों की गुलामी पर चेतावनी

सूक्ति सुधाकर के एक बेहद मशहूर संदर्भ से समझें तो प्रकृति ने हमें बार-बार आगाह किया है कि इंद्रियों की गुलामी कितनी खतरनाक हो सकती है। जरा इन उदाहरणों पर गौर कीजिए:

हिरण: इसे मीठा संगीत बेहद पसंद होता है। शिकारी इसी कमजोरी का फायदा उठाकर मधुर धुन बजाता है और हिरण को अपने जाल में फंसाकर मार देता है।

भंवरा: खुशबू का ऐसा दीवाना कि कमल के फूल का रस चूसते-चूसते शाम को उसी में कैद हो जाता है और अपनी जान गंवा बैठता है।

मछली: स्वाद के चक्कर में मछुआरे के कांटे में फंसे मांस के टुकड़े को निगलती है और तड़प-तड़प कर मर जाती है।

पतंगा: रोशनी के प्रति ऐसा आकर्षण कि जलती आग में कूदकर खुद को भस्म कर लेता है।

अब जरा ठंडे दिमाग से सोचिए : इन बेजुबान जानवरों के पास तो सिर्फ एक-एक कमजोरी थी, फिर भी ये मौत के मुंह में समा गए। हम इंसानों के पास तो ये पांचों इंद्रियां हैं और हम हर पल इन पांचों के गुलाम बने हुए हैं। ऐसे में हमारा पतन निश्चित क्यों नहीं होगा? कठोपनिषद् में भी कहा गया है कि ईश्वर ने हमारी इंद्रियों को बाहर की तरफ देखने के लिए बनाया है, इसलिए ये स्वाभाविक रूप से बाहरी दुनिया की तरफ भागती हैं। इन्हें अंदर मोड़ना ही असली अनुशासन है।

गीता के अनुसार बुद्धि और विवेक को कैसे बचाएं

श्रीकृष्ण का यह श्लोक सिर्फ डराने के लिए नहीं, बल्कि हमें जगाने के लिए है। अगर आप भी अपनी लाइफ की नाव को डूबने से बचाना चाहते हैं, तो इन तीन व्यावहारिक बातों को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं:

डिजिटल फास्टिंग (इंद्रिय संयम): दिन में कम से कम 1 घंटा ऐसा तय करें जब आप फोन, लैपटॉप और टीवी से पूरी तरह दूर रहें। अपनी आंखों और कानों को बाहरी शोर से आराम दें।

माइंडफुलनेस (सजगता): जब भी आपका मन किसी स्वाद, दृश्य या वासना की तरफ तेजी से भागे, तो खुद को एक सेकंड के लिए रोकें और पूछें क्या यह मेरी मंजिल के लिए सही है?

बुद्धि को बनाएं पतवार: हवा (इंद्रियों) का काम है बहना, लेकिन कुशल नाविक वही है जो अपनी पतवार (बुद्धि) को मजबूत रखता है। अपने विवेक को इतना मजबूत कर लीजिए कि कोई भी बाहरी भटकाव आपको आपके लक्ष्य से डिगा न सके।

याद रखिए, महाभारत का युद्ध सिर्फ कुरुक्षेत्र में नहीं हुआ था; वह हर दिन, हर पल हमारे भीतर चल रहा है। जीत उसी की होगी जिसका मन उसके वश में होगा, न कि वो जो मन के इशारों पर नाच रहा होगा।